
हमारे देश के अलावा दुनिया भर के अन्य देश प्रति वर्ष किसी अंतरराष्ट्रीय आयोजन में भाग लेने अपने किसी प्रतिनिधियों को भेजकर प्रदूषण पर चिंता व्यक्त करने के अलावा जमीनी स्तर पर कुछ भी करते दिखाई नहीं देते हैं हम केवल अपनी धरती ही नहीं अंतरिक्ष तक को भी प्रदूषित करते चले जा रहे हैं। अभी पिछले ही दिनों दिल्ली एवं उसके आसपास के क्षेत्रों में छाए धुएं से होने वाले प्रदूषण के कारण वहां के स्कूल कालेजो तक को बंद करना पडा था। पूरे देश भर में बढ़ते प्रदूषण के आंकड़े भयावह स्थिति को दर्शाते हैं देश में जगह- जगह हरियाली बनाए रखने के उद्देश्य से समान वर्षा जल संचयन के लिए राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी एनजीटी के आदेश को क्रियान्वित करने के उद्देश्य से अभी तक किये गए तमामो उपाय अनुपयोगी ही साबित हुए हैं।
विश्व भर में इस बात को स्वीकार किया जा चुका है कि भारतीय जीवनशैली ही प्राकृतिक विनाश से होने वाले भयावह माहौल से हमें बाहर निकाल सकती है, लेकिन वर्त्तमान समय में हम भारतीय लोग ही स्वमं भौतिकता वादी आचरण अपना कर एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में विनाश की दिशा पकड़ चुके हैं। प्रति वर्ष करोड़ों पौधारोपण के बावजूद हमारे यहाँ वृक्षों की संख्या लगातार घटती चली जा रही है, नदियों की गहराई बढ़ने एवं सफाई करने जैसी योजनाएं नाजायज तरीके से धनउपार्जन का प्रमुख माध्यम बन गये है और हम देशी एवं विदेशी ‘विशेषज्ञों’ को मोटी रकम देकर इस स्थिति से निपटने के लिए उनसे उपाय बताने की अपेक्षा से उन्हें इसका दायित्व सौंपकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते है।
देश की राजधानी एवं उसके आसपास के क्षेत्रों में होने वाले प्रदूषण का मुख कारण हरियाणा और पंजाब के किसानों द्वारा धान की फसल के अवशेष यानी पराली जलाने को कारण बताया गया। दूसरी तरफ गन्ने की फसल कटने के बाद उस खेत से अधिक उपज प्राप्त करने के नीयत से उसके ठूंठों को जलाने का प्रचलन है। जब भी कोई चीज जलेगा उससे धुआं अवश्य उठेगा और आकाश में नमी होने से वायु प्रवाह न होने के कारण वह आसपास के क्षेत्र में ही छाया रहेगा जो जोकि साँस लेने में कठिनाई पैदा करेगा साथ ही साथ दाम जैसी कई बीमारियों का कारण बनेगा।

खेतों में अन्न उत्पन्न करना हमारी मूलभुत आवश्यकता में से एक है। जिस कारण अन्न उत्पादन करना हम बंद नहीं कर सकते हैं। पहले अन्न के पौधों को हम भूसे के रूप में पशुओं के आहार के रूप में या छप्पर रखने के लिए इस्तेमाल करते थे एवं इसी प्रकार के अन्य घरेलू काम में भी इसका उपयोग हम करते आ रहे थे। यांत्रिक कृषि के कारण पशु आहार के रूप में उनकी उपयोगिता आज वर्त्तमान समय में कम ही है।
ऐसे में उसे जलाने के अलावा अन्य विकल्प ही क्या बचता है? इस प्रकार की समस्या की विकरालता को देखते हुए देश के कुछएक किसानों द्वारा खेती के परंपरागत तरीकों को अपनाकर उन्होंने एक उदाहरण स्वरुप हमारे सामने पेश किया है इसका अनुसरण कर अपनाना संभवत: बहुत ही उपयुक्त समाधान होगा क्योंकि अब
ट्रेक्टरों से खेती जोतने का काम लिए जाने के कारण बैलों के बछड़ों का उपयोग न रह जाने के कारण उसे छुट्टा छोड़ देते हैं जिससे ये छुट्टा पशु खेत में खड़ी फसलों को चर डालते हैं या फिर आस पास के शहरों के सड़कों पर घूमते हुए दुर्घटनाओं का कारण बनते रहते हैं।
ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए किये जाने वाले सरकारी उपाय अनुपयोगी ही सिद्ध हुए हैं। यदि देश के किसान परंपरागत कृषि को बढ़ावा देते हुए बिना रासायनिक उर्वरोकों के इस्तेमाल किये ही अन्न उत्पादन करने की प्राचीन पद्धति को संरक्षित रखने के लिए प्रयास रत रहे तो सबसे अच्छा ही होगा, हरित क्रांति के नाम पर अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों, हानिकारक कीटनाशकों, हाइब्रिड बीजों, अत्याधिक भूजल उपयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति कम होने से उत्पादन में अंतर अवश्य पड़ेगा इसके साथ ही साथ भूजल का स्तर एवं मानव स्वास्थ्य में निरंतर गिरावट दिनों दिन बढ़ाती चली जाने के अलावा कृषि पर आने वाली बढ़ती लागत, बाजार पर निर्भरता और आधुनिकता के नाम पर सरकारी कृषि नीतियों के कारण देश के किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं।







