आज से ‘चिरैया’ नखत……पर यह परंपरा अब नहीं रही?

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लुप्त होती परंपरा:
आज से ‘चिरैया’ नखत लग गया है। चौमासे में ये सारे नखत (नक्षत्र) विशेष तौर पर याद किए जाते हैं। हर नखत के बारिश का एक खास pattern होता है। कहते हैं कि चिरैया में अक्सर पूरा दिन झापस छाया रहता है और रुक रुक कर फुहार भरी बारिश होती रहती है। बरसात के मौसम में गाये जाने वाले लोककाव्य आल्हा में भी इसकी बराबर चर्चा है – “नखत चिरैया के झापस मा, घोड़ा बढ़ा बराबर जाय”।
हमारे बचपन में गाँव की परम्परा थी कि जिस दिन चिरैया लगती उस दिन पशुशाला के प्रवेश द्वार पर दोनों ओर भुट्टे (सेहुण) का पौधा लगाया जाता, एक खपरी (फूटा मटका) और एक पहरुआ (मूसल) रखा जाता। हम बच्चे लोग भुट्टे का पौधा लाने बड़ी दूर दूर तक जाया करते थे। उसकी भी अपनी एक अलग कहानी है।
शायद कोलम्बस की भी वह यात्रा उतनी रोमांचक नहीं रही होगी। पर अब सोचते हैं तो बेहद रोमांचकारी लगता है। परंपराओं के पृष्ठभूमि में जरूर कोई गूढ़ रहस्य छुपा होता है किन्तु इस आयोजन का प्रयोजन नहीं समझ जा सका। संभवतः बरसात के मौसम में होने वाली पशुओं की बीमारी आदि का यह कोई इलाज होगा।
पर यह परंपरा अब नहीं रही। पर शहर की नकल में अब गाँव भी गाँव कहाँ रहा !
– अरुण कुमार तिवारी की वॉल से

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