ब्रह्मकमल: जिसे देखने के लिए सालों इन्तजार करना पड़ता है

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  • नीलकमल की सुंदर छटा से वातावरण खिल उठता है
  • ब्रह्मकमल रात में खिलता है. भगवान् ब्रम्हा के नाम पर पड़ा ब्रह्मकमल

विश्व प्रसिद्ध धाम केदारनाथ के उत्तर में स्थित सुरम्य बासुकीताल की सुंदरता देखते ही बनती है। उस पर यहां खिले ब्रह्मकमल व नीलकमल पुष्प ताल के सौन्दर्य पर चार चांद लगा रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण की याद में स्वयं निर्मित बासुकीताल का यहीं सौंदर्य भारी तादात में सैलानियों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।

समुद्रतल से लगभग 16 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित बासुकीताल को पांडवकालीन बताया जाता है। ताल के चारों ओर मखमली बुग्यालों सहित चौरा, डोलार्च, गरूड़पंजा, अतीश, हत्थाजड़ी, कुखड़ी, करवी आदि वनस्पतियां प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं। ताल के निकट हस्तिनी पर्वत के नीचे ढालों पर बुग्याल के मध्य पत्थरों से घिरे गोड़ बाड़े भेड़-बकरियों के लिए बने हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में मरड़े कहा जाता है। यहीं पर खरचा, भारखंड तथा केदार शिखर की तीन उजली हिम चोटियां स्थित हैं। बासुकीताल जाने के लिए सितम्बर माह को उचित बताया गया है।

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स्थानीय जानकार बताते हैं कि बासुकीताल के दर्शन के लिए झुंड बनाकर जाना उचित है, ताकि किसी के खोने का डर न हो। नवम्बर माह से लेकर मार्च तक इस स्थान पर लगभग चार से आठ मीटर बर्फ पड़ी रहती है, जबकि अप्रैल से लेकर सितम्बर तक ताल की सतह पर बर्फ की पारदर्शी चादर देखी जा सकती है, जिसमें यात्री अपना अश्क देखकर आशीर्वाद ग्रहण करते हैं। चौराबाड़ी तथा बासुकीताल के मार्ग और पूर्व में चन्द्रशिला हस्तिनी पर्वत के ढालों पर हरित घास बसबस यात्रियों को अपने ओर आकर्षित करता है, वहीं बीच-बीच में रंगेला, विजय, जय, कुखडी, कौल, कोढ्स, धनू आदि पुष्पों की सुगंधित छटा मंत्रमुग्ध कर देती है।

किवदंती है कि जब पांडवों सहित द्रोपदी परम गति पाने के लिए इस स्थान पर आयी थीं तो द्रोपदी ने ताल में खिले ब्रह्मकमल लाने के लिए महाबली भीम से आग्रह किया था, हालांकि तब यह ताल बहुत गहरा था। भीम ने उत्साहित होकर ब्रह्मकमल तोड़कर द्रोपदी को सौंपा।

लोक कथाओं के अनुसार यात्राकाल में बासुकीताल के इर्द-गिर्द भगवान इन्द्र तीर्थयात्रियों को आशीर्वाद देते थे। बताया जाता है कि जन्माष्टमी के पवित्र दिन इस स्थान पर सहस्त्रों देवी और देवता अदृश्य रूप में अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि जब पाडव वंश गोत्र हत्या के पाप को धोने के लिए इस मार्ग से गुजरे थे तो इस ताल के निकट उन्होंने पूजा-अर्चना की थी और इसी स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण ने अंतिम दर्शन दिये थे। इसीलिए आज भी कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर स्थानीय लोगों के साथ तीर्थयात्री यहां आकर भगवान कृष्ण की याद में इस ताल की पूजा अर्चना कर स्नान करते हैं। मान्यता है कि बासुकीताल के जल को स्पर्श तथा दर्शन करने मात्र से मनुष्य मोक्ष तथा सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

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