friendship day 1 August
उम्र का हर एक पड़ाव अपने में खूबसूरती लिए होता है। बाल्यावस्था भी ठीक इसी तरह अद्भुत है। उम्र के इस दौर में बच्चों का बाहरी दुनिया के आकर्षण में घिराव होने लगता है। शिशु अवस्था के खत्म होने के साथ ही माता-पिता के आवरण से बाहर निकलकर वह बालक नया करीबी ढूंढने की राह पर चल पड़ता है। यह करीबी और कोई नहीं, बल्कि मित्र नाम का ताज होता है, जो जीवन पर्यन्त उसके शीर्ष पर सुशोभित होता है। सोचिए, क्या हो यदि नई पीढ़ी के पास मित्र नाम का रत्न ही न रहेगा, क्या होगा जब बच्चे दोस्ती की एहमियत ही भूल चुके होंगे? बाल्यावस्था धारण किए हमारे देश के बालक अब मित्रता के सुख से वंचित हो रहे हैं। जानना चाहेंगे कैसे??
देश में दबे पांव आई महामारी ने विगत 1.5 वर्षों में अपने पैर पसारकर ऐसे कई अवरोध लगा दिए हैं, जिन पर वर्तमान में किसी का ध्यान नहीं है, अपितु इनके भीषण परिणाम भविष्य में हमें अवश्य देखने को मिलेंगे। शिक्षा का प्राथमिक पड़ाव पार करने के बाद जब बच्चे माध्यमिक स्तर की ओर बढ़ते हैं, इस दौरान उनके सबसे समीप उनके हमउम्र, यानी मित्र होते हैं। कहा जाता है कि उम्र के इस पड़ाव पर अर्जित मित्र लम्बे समय तक हाथ थाम कर साथ चलने वाले होते हैं, आवश्यकता होती है, तो सही व्यक्तित्व को चुनने की। इन सब से परे शायद ही किसी का इस बात पर ध्यान होगा कि अपने लिए एक सही मित्र का चयन करने की उम्र में हमारे बच्चे घरों में कैद हैं। जो थोड़े-बहुत होंगे भी, वे भी समान स्थिति से गुजर रहे हैं। खेल-कूद भी अब खत्म हो चुका है, दोस्तों की टोली बनाकर गलियों में जो हुड़दंग मचा करता था, अब तो उस पर भी विराम लग चुका है, गाड़ियों के शोर के बावजूद अब ये गलियां सुनसान हैं। ऑनलाइन पढ़ाई और सामाजिक दूरी की आग में ये बच्चे झुलसने लगे हैं। दुनिया तो एक बार फिर स्थिति सामान्य होने के बाद पटरी पर दौड़ने लगेगी, लेकिन निश्चित रूप से ये बच्चे इस भीड़ के अकेलेपन में कहीं खो जाएंगे।
इस काल में होने वाली शारीरिक और बौद्धिक प्रगति के साथ ही बच्चों में भावनाओं के कई घनेरे बादल उमड़ते हैं, जिन्हें किसी ऐसे शख्स से साझा करने की व्यथा मन में होती है, जो उसे और उसकी बात को समझे, उस बात विशेष को जग के सामने उजागर न करे और उससे संबंधित समस्या का निवारण दे। यदि अभी-भी यह बात न समझी गई, तो नई पीढ़ी मित्र रत्न से वंचित हो जाएगी, क्योंकि बच्चे इस दूरी के बीच एक-दूसरे के काम आना और मित्र की एहमियत भूल चुके होंगे। अब समय आ गया है कि स्थिति सामान्य होने तक और उसके बाद भी हम उनके सबसे अच्छे मित्र बनकर दिखाएं, उनसे मित्रों की तरह ही अपने मन की व्यथा या विचार साझा करें, जिससे कि वे भी समान रूप से हमें हमदर्द मान सकें। स्थिति सामान्य होने के बाद उन्हें पुराने मित्रों के साथ एक बार फिर घुलने-मिलने का पर्याप्त समय दें, उन्हें बाहर जाकर समय बिताने की अनुमति दें, उन्हें अपने निर्णय स्वयं लेने योग्य बनाएं, उन्हें मित्र की एहमियत समझाएं। इस प्रकार हम कल के युवाओं को मित्रता से पिछड़ने से रोक सकते हैं, और इसी के साथ हम उनके हमउम्र न सही, मित्र तो बन ही सकते हैं। – अतुल मलिकराम








1 Comment
It is perfect time to make some plans for the future and it’s time to be happy. I have read this post and if I could I want to suggest you some interesting things or suggestions. Maybe you can write next articles referring to this article. I wish to read even more things about it!