भूमि बंजर हो रही है लेकिन समझ नहीं पा रहे हैं हम

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सूरज सिंह ‘ माइकल ‘

कभी कभी बड़े बुजुर्गों की बातें जब हम सुनते तो हमे ज्ञात होता है कि उनके जवानी के समय प्रकृति कितनी अनुकूल हुआ करती थी। उस वक़्त तो लोग संयुक्त परिवारों में रहते थे , परिवार इतने बड़े होते थे कि अगर जोड़ा जाये तो 20-25 जन तो निकलेंगे ही । फिर भी वह समृद्ध जीवन व्यतीत करते थे । ना जाने आज क्या हो गया है कि हम एकाकी परिवार में रहते है जिसमें माँ बाप और केवल बच्चे रहते है फिर भी भरण पोषण अच्छा नहीं होता । कुछ तो ऐसा हुआ है कि जलवायु ने करवट ली है । हम कहते है कि फसल अच्छी नहीं हो रही है , पानी की कमी हो रही है , भूमि बंजर हो रही है लेकिन समझ नहीं पा रहे है कि उस जमीन को क्या हो गया जिसमें हमारे बाप दादा आसानी से जीवन यापन करते थे ।

पहले हमारे पुरखों के समय सब एक साथ भोजन करते थे और एक साथ उठते थे , महिलाये अपनी पंगत में , पुरुष अपनी पंगत में बैठते थे । भोजन बर्बाद नहीं किया जाता था । पुरखे कहते थे कि अन्न जितना बर्बाद करेंगे उतना प्रकृति हमसे वसूल लेगी । आज हम वर्तमान में देखते है कि ऊँचे ऊँचे घरो में जिन्हें हाई क्लास फैमिली या सोसाइटी कहते है उन घरों के लोग दो रोटी लेंगे उसमें भी एक या आधी छोड़ देते है , हमने अपना सिद्धांत कार्यशैली बदल दी लेकिन प्रकृति ने नही । वह बगैर वसूले नहीं मानेगी । अब हम उपर्युक्त कारणों की यदि व्याख्या करे तो हमे ज्ञात होगा कि जब स्वामी नाथन और बोरलाग ने यहाँ हरित क्रांति को लागू किया तब त्वरित परिणाम अच्छे आये । उस वक़्त हमारे देश की प्रधानमंत्री थी श्रीमती इन्दिरा जी । हम लोग अनाज से उस वक़्त बहुत पीड़ित थे , देश में अकाल पड़ा था ।

यह देखकर इन्दिरा जी अमेरिका से गेंहू की सहायता के लिए गयी , उस वक़्त अमेरिका के अखबारों में यह हैडलाइन छपी कि “भारत की प्रधानमंत्री भीख मांगने आई है ।” खैर पी एल -480 समझौते से डेढ़ करोड़ टन गेंहू आयात हुआ । कृषि मंत्री थे सुब्रमण्यम उन्होंने मेक्सिकन गेंहू को उगाया और परिणाम देखे । परिणाम बहुत सुखद थे । देश में हरित क्रांति का शुभारम्भ हो गया उत्तरप्रदेश , पंजाब , हरियाणा जैसे समृद्ध राज्यों में । वो इसलिए इन राज्यों में ताकि अगर कुछ नुकसान भी हो तो ये सह जाये । लौट के आते है अब हम साल 2017 में । देश में पानी , बंजर भूमि , फसल की कम उपज आदि कई सारे मुद्दों से हम घिरे है । हमे ये पता होना चाहिए की इन सब के बीज तो हमने वही बो दिए थे जब हरित क्रांति के गेंहू और चावल के बीज बोये गए थे । उन हाइब्रिड बीजों को बहुत पानी , फ़र्टिलाइज़र , कीटनाशक दवाओ की आवश्यकता होती है । इन उर्वरको के प्रयोग से भूमि का उपजाऊपन मर गया , भूमि में संचित जल नष्ट हो गया । आज कृषि घाटे का सौदा है । उसके पीछे कारण है संसाधनों की बर्बादी ।

अभी हाल ही में जम्मू कश्मीर की एक महिला द्वारा जो कि कांग्रेस से है संसद में एक निजी विधेयक पेश किया गया जो कि मंजूर भी हो गया वो ये था कि उस विधेयक में शादी बारातों में जो अनावश्यक भोजन की बर्बादी होती है उसको रोकना था । उस विधयेक में बारातियों की संख्या , भोजन में कितने प्रकार की सब्जियां बनेंगे , कितने लोगो का केवल भोजन बनेगा , पूरी बारात में कितने लोग शामिल होंगे दोनों पक्षों से – ये सब निर्धारित था । ये पास भी हो गया । अब कम से भोजन की बर्बादी पर रोकथाम तो लगेगी ।
हम सब एक बार वापस उसी युग में जाने पर मजबूर होंगे जिसमें पहले हमारे पुरखे थे । हम को ये ज़मीनी स्तर से सोचना पड़ेगा कि अपने संसाधनो को कैसे सुरक्षित रख सके , पर्यावरण को कैसे बचाये ।
एक मैं यहां नारा देना चाहूँगा “पर्यावरण बचाये , आओ एक पेड़ लगाये “

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