ग़ज़ल: मैं आँखों में चराग़ों को जलाए रख तो सकती हूँ

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तुम्हारी ज़ात से ये दिल कभी बरहम नहीं होता
अकीदत का तो ये दिन चार का मौसम नहीं होता

तुझे अब खोजने जाएँ तो जाएँ भी कहाँ कह दे
कि अपने हाथ में, घर का तेरे परचम नहीं होता

तलब तेरी, हवस तेरी, तेरी ही जुस्तजू है अब
तेरे जैसा कोई भी और तो हमदम नहीं होता

मैं आँखों में चराग़ों को जलाए रख तो सकती हूँ
मगर इस आग से भी ग़म तो जलकर कम नहीं होता

तुझे पत्थर में भी देखा, तुझे दरया में भी देखा
दिया ये तेरी चाहत का, कभी मद्धम नहीं होता

हमें तेरी तलब ने अब कहीं का भी नहीं रक्खा
प दामन ही तेरा अश्कों से मेरे नम नहीं होता

तुझे रुसवाइयों से यार अपनी डर नहीं लगता?
अकीदतमंद के आगे, ज़रा भी ख़म नहीं होता

  • आशा शैली

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