खूबसूरत रंगों से भरी होली हमारा वह त्योहार है जिसका महिमा सदैव अपरम्पार रही है। इसका स्वरूप, पृष्ठभूमि, मनाने का तरीका- सबकुछ विलक्षण है। इस तरफ परंपरा है, एक ओर आनंद है और एक तरफ महत्व है। भारत में त्योहार अनेक हैं, उनकी महत्ता भी कम नहीं है लेकिन होली इस मामले में अलग है कि इसकी आध्यात्मिकता भी सर्वोच्च है, व्याहारिकता भी सर्वोच्च है व महत्व भी सर्वोच्च है। अन्य किसी त्योहार में मस्ती भी हो और संदेश भी हो, ऐसा तो दिखाई नहीं देता।

एक दिन पहले होलिका दहन के समय इसका महत्व सभी लोग देखते, सुनते और ग्रहण करते हैं। बुराई पर अच्छाई की जीत है तो नई फसल का आगमन भी है और फिर पर्यावरण की शुद्धता भी है और अगले दिन धूम-धड़ाका, मौज-मस्ती और विशेष पकवानों का आनन्द है। यह आनन्द सिर्फ हंसी-ठिठोली का नहीं है बल्कि आपस में समरसता और साहचर्य को बढ़ावा देने वाला भी है। इसीलिए यह दुश्मनों के गले मिलने वाला दिन भी माना जाता है।
होलिका दहन उन सभी बुराइयों को भस्म करता है जो समाज को दूषित करती हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ऐसे पवित्र तथा व्यापक दृष्टिकोण वाले सन्देश को अपनाने की आज समाज को सबसे ज्यादा जरूरत है। एक तरफ हिंसा है तो दूसरी ओर लूट की प्रवृत्ति जिसमें स्वार्थ और सिर्फ स्वार्थ ही सर्वोपरि है।
इन बुराइयों का नाश अभी न किया गया तो आने वाला समय और मुश्किलों भरा निश्चित रूप से होगा। त्योहार मनाने की सार्थकता उसका सन्देश अपनाने में होती है। यदि ऐसा न करें तब तो उसे मनाना औपचारिकता से ज्यादा कुछ नहीं होगा। ऐसे में जरूरी यह है कि होली के मूल भाव को ग्रहण किया जाय। उसे किसी निषिद्ध कार्य को करने का बहाना न बनाया जाय बल्कि उसका आयोजन इस तरह किया जाय जो समाज के छोटे-बड़े सभी सदस्यों को मौज-मस्ती के साथ सर्व कल्याण का सन्देश दे सके।







