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    जब जनरल डायर ने चार सौ से अधिक लोगों को मौत के घाट उतरवा दिया, तो गाँधी जी ने लिया यह फैसला

    ShagunBy ShagunSeptember 28, 2020 Gandhi Jayanti No Comments6 Mins Read
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    ज़रा याद करों कुर्बानी: गाँधी जयंती 2 अक्टूबर विशेष: जब स्वत्रंतता के पुजारी बने संत महात्मा गांधी

    आज हम बच्चे -बच्चे की जुबान पर महात्मा गांधी का नाम सुन सकते हैं। उनका का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को हमारे देश के गुजरात राज्य के पोरबंदर रियासत में हुआ था उनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था।

    महात्मा गांधी जिन्हें लोग प्यार से बापू भी कहते थे, वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं में से थे। वे हमेशा सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते रहे। वे केवल नेता ही नहीं बल्कि एक निष्काम कर्मयोगी, एवं सच्चे अर्थों में एक युगपुरुष हुआ करते थे।

    गांधी जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन सादगी के साथ एक ब्रह्मचारियों की तरह गुज़ारा। वैसे उनका परिवार एक अमीर ख़ानदान से हुआ करता था। मोहनदास करमचंद गांधी के पिता, करमचंद गुजरात के पोरबंदर रियासत के राजा के दरबार के दीवान हुआ करते थे। उनकी माता एक धार्मिक पृवत्ति की महिला थीं, जो अक्सर ही पूजा-पाठ के लिए मंदिर जाया करती थीं और समय समय पर पड़ने वाले तीज तैयोहारो पर उपवास भी रहती थीं। उनकी मां ने उन्हें बचपन्न से ही हिंदू परंपराओं और नैतिकताओं से परिपूर्ण पाठ पढ़ा कर मोहनदास को हमेशा शाकाहारी बने रहने की हिदायत भी दी। मां से बालक मोहनदास को धार्मिक सहिष्णुता, हमेशा साधारण रहन-सहन एवं अहिंसा की सीख मिली थी।

    उस समय गांधी जी महात्मा कहलाने से बहुत दूर थे। पोरबंदर को छोड़ कर बाहर वे पहली बार अपनी पढ़ाई के लिए राजकोट चले आये।

    मोहनदास के पिता अपने परिवार को भी उनके साथ रहने के लिए पोरबंदर से राजकोट लेकर आ गये क्योंकि यहां बच्चे मोहनदास की अच्छी शिक्षा-दीक्षा देने का पूरा इंतज़ाम था और मोहनदास ने यहाँ अंग्रेज़ी की शिक्षा ग्रहण किया।

    मात्र 13 वर्ष की आयु में मोहनदास गांधी जी का विवाह कस्तूरबा से हो गया और वे कस्तूरबा के साथ राजकोट में ही रहने लगे। कस्तूरबा राजकोट की रहने वाली थीं। इस समय मोहनदास सन1883 में एक बाग़ी नौजवान हुआ करते थे।

    परिवार की परंपरा के विरुद्ध उन्होंने चोरी करने, शराब पीने और मांसाहार करने जैसे कई तामसिक कार्यों को करना शुरू कर दिया था, लेकिन अचानक उनका ह्रदय परिवर्तन हुआ और फिर ऐसे समस्त कार्य उनके नजर में पाप लगने लगे और अंततः वे इसके लिये प्रायश्चित कर हमेशा- हमेशा के लिये इन कर्मो को त्याग दिया।

    गांधी जी गुजरात के भावनगर कॉलेज में पढ़ाई जरूर कर रहे थे लेकिन वे वहां ख़ुश नहीं थे, तभी उन्हें लंदन के मशहूर इनर टेम्पल में क़ानून की पढ़ाई करने जाने का प्रस्ताव मिला।

    परिवार के बुज़ुर्गों सदस्यों ने मोहनदास को बहुत समझाया कि विदेश पढ़ने न जाये लेकिन, बड़ों के ऐतराज़ को दरकिनार करते हुये गांधी पढ़ने के लिए लंदन चले गए।

    भारत से लंदन पहुंच कर मोहनदास गांधी पूरी तरह पश्चिमी रंग-ढंग में ढल गये। लंदन में उस वक़्त चल रहे शाकाहारी आंदोलन में उन्हें अपने लिए भाईचारे की सहानुभूति हुई और वे उससे जुड़ गये लेकिन बाद में उन्हें बचपन में मिली हिंदू मान्यताओं की सीख की ओर पुनः लौटने की प्रेरणा मिली और वे दोबारा अपनी जड़ों की तरफ़ लौटने लगे। थियोसॉफ़िकल सोसाइटी की प्रेरणा से उन्होंने विश्व बंधुत्व का अपना एक सिद्धांत बनाया जिस में सभी इंसानों और धर्मों को मानने वालों को बराबरी का दर्ज़ा देने का सपना था।

    क़ानून की पढा़ई पूरी करने के बाद मोहनदास गांधी भारत लौट आए और वक़ालत करने लगे लेकिन एक मुकद्दमा हारने पर एक अंग्रेज़ अधिकारी के घर से उन्हें बाहर निकाल दिया। इस घटना से अपमानित मोहनदास गांधी को दक्षिण अफ्रीका में काम करने का प्रस्ताव मिला, जो उन्होंने फ़ौरन स्वीकार कर लिया और अफ्रीका चले गये।

    दक्षिण अफ्रीका में अप्रवासी भारतीयों से हो रहे सौतेलेपन जैसे व्यवहार एवं भेदभाव के ख़िलाफ़ उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में इंडियन कांग्रेस की स्थापना की। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारियों के लिए इस संघर्ष के दौरान ही गांधी ने स्व-शुद्धिकरण एवं सत्याग्रह जैसे सिद्धांतों को अमल में लाये जो उनके अहिंसा के व्यापक विचार का हिस्सा थे।

    इस दौरान गांधी जी ने ब्रह्मचर्य का प्रण लेकर सफ़ेद धोती पहननी शुरू कर दी, जिसे हिंदू परंपरा में गमी का वस्त्र माना जाता है।

    वर्ष1913 में मोहनदास गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में रह रहे भारतीयों पर लगाए गए तीन पाउंड के टैक्स के ख़िलाफ़ जोरदार आंदोलन करना शुरू किया।

    इस आंदोलन के दौरान पहली बार मोहनदास गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में काम कर रहे भारतीय मज़दूरों, खनन कर्मियों और खेतिहर मज़दूरों को एकजुट किया और उनके अगुआई बने।

    वर्ष 1915 में गांधी जी भारत वापस लौटे और दक्षिण अफ्रीका में अपने आंदोलन की क़ामयाबी के बाद मोहनदास गांधी एक विजेता के रूप में तौर स्वदेश लौटे थे भारत आने के बाद उन्होंने और कस्तूरबा ने तय किया कि वे रेलवे के तीसरे दर्ज़े से सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करने निकल पड़े।

    इस यात्रा के दौरान गांधी जी ने अपने देश की ग़रीबी और लाचारी भरे आबादी को देखा तो उन्हें बहुत आत्मग्लानि हुई संयोगवश इसी दौरान गांधी ने अंग्रेज़ हुकूमत के द्वारा लाये गये काले क़ानून “रौलट एक्ट” के विरोध करने का एलान कर दिया।

    मोहनदास गांधी के कहने पर पूरे देश से हज़ारों की संख्या में लोग इस एक्ट के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर आये और देश के कई जगह हिंसा भड़कने से अमृतसर में जनरल डायर ने 20 हज़ार लोगों की भीड़ पर गोलियां चलवा दी, इस गोली कांड में चार सौ से अधिक लोग मारे गये और 1300 से अधिक लोग ज़ख़्मी भी हुये। इसके बाद उन्हें भारत की आज़ादी का आंदोलन शुरू करने सड़को पर उतरना पड़ा।

    अपनी बढ़ती लोकप्रियता के कारण गांधी जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक प्रमुख चेहरा बन कर वे ब्रिटेन से भारत की आज़ादी के आंदोलन के अगुवाकार बने।

    आजादी के संघर्ष में महात्मा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भारतीय जनता के मध्य लोकप्रिय पार्टी बना दिया, उससे पहले कांग्रेस पार्टी मुठ्ठी भर अमीर लोगों की एक पार्टी हुआ करती थी।

    उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध लोगों को एकत्र कर असहयोग आंदोलन की शुरुआत की। गांधी जी अपील पर सम्पूर्ण भारत की जनता ने ब्रितानी सामानों का बहिष्कार करना शुरू कर दिया था।

    उनके इस आंदोलन के जवाब में ब्रितानी हुकूमत ने गांधी को देशद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया और उन्हें दो वर्षों तक जेल में रखा था।

    स्वतन्त्रता संग्राम के प्रति आन्दोलन रत रहे गांधी जी को दुनिया में विशेषकर भारत की आम जनता उन्हें महात्मा गांधी के नाम से जानती है। हिंदी भाषा में महात्मा का अर्थ महान आत्मा एक सम्मान सूचक शब्द है। वर्ष1915 में राजवैद्य जीवराम कालिदास ने उन्हें महात्मा के नाम से सबसे पहले संबोधित किया था। उस समय से उनके नाम के आगे महात्मा जुड़ गया।

    उनके द्वारा कहे गये कुछ वाक्य:-

    • आपको मानवता में विश्वास नहीं खोना चाहिए। मानवता सागर के समान है; यदि सागर की कुछ बूँदें गन्दी हैं, तो पूरा सागर गंदा नहीं हो जाता।
    • खुद को खोजने का सबसे अच्छा तरीका है, खुद को दूसरों की सेवा में भुला दो। – प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती

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