लोक गीतों का खजाना नयी पीढ़ी तक है पहुंचाना

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उ.प्र.संगीत नाटक अकादमी अभिलेखागार रिकार्डिंग फेसबुक पर लाइव, अवधी संस्कार और त्योहार गीतों पर डा.योगेश प्रवीन ने रखे विचार 

अवध की धरा में लोक संगीत का अनमोल खजाना बिखरा पड़ा है। इसे सहेेज-संवारकर नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए ऐसे प्रबुद्ध विद्वानों की जरूरत है जो गीत-संगीत की आत्मा को भी आत्मसात करते हुए संरक्षित करे। अवधी गीतों में रिश्तों को रेखांकित करते हुए उन्हें मजबूत करने की परम्परा है।

ये उद्गार अवध की संस्कृति के कला मर्मज्ञ पद्मश्री डा.योगेश प्रवीन ने यहां उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी गोमतीनगर की वाल्मीकि रंगशाला में आज दोपहर अभिलेखागार रिकार्डिंग कराते हुए व्यक्त किये। यहां अवध क्षेत्र के संस्कार गीत एवं त्योहार गीतों पर उनका साक्षात्कार वरिष्ठ पत्रकार आलोक पराड़कर ले रहे थे। यह कार्यक्रम अकादमी फेसबुक पेज पर संस्कृति प्रेमियों के लिए लाइव चल रहा था।

चर्चा के आरम्भ में अकादमी के सचिव ने वक्ताओं और अकादमी फेसबुक पेज पर लाइव चल रहे कार्यक्रम में दर्शकों श्रोताओं का स्वागत करते हुए कहा कि हमें अपनी संस्कृति की जड़ों को संरक्षित करने की आवश्यकता है। यह कार्यक्रम उसी क्रम की एक कड़ी है। इसे संपादित करके यू-ट्यूब में भी डाला जाएगा।

जवाबों में डा.योगेश ने कहा कि लोकगीत हम बना नहीं सकते, पर आज उनको तकनीकी रूप से समृद्ध आज के इस दौर में नई पीढ़ी के लिए संरक्षित अवश्य कर सकते हैं, और यह कार्य हमारा दायित्व भी है। वीरगाथा काल की अवधी आल्हा परम्परा और अमीर खुसरो के गीतों, मलिक मोहम्मद जायसी के बारामासा, गोस्वामी तुलसीदास के मानस और नवाबी काल में खासकर वाजिद अली शाह के काल में रची, विकसित हुई गीत संगीत परम्पराओं के संग उन्होंने यहां साझा गंगा-जमुनी संस्कृति का उल्लेख अनेक लोक परम्पराओं और लोकगीतों की पंक्तियों के उदाहरणों के साथ किया।

उन्होंने कहा कि अनेक संस्कार गीतों में ऐसा मार्मिक वर्णन मिलता है कि पूरा बिम्ब श्रोता के सामने जीवंत उपस्थित सा हो जाता है। अवधी भाषा में एक कमनीयता है जो अन्य भाषाओं में नहीं। अवध एक ऐसी जगह रही है जो हर तरह के रचनाकारों को पुराने जमाने से लेकर पुरानी फिल्मों के दौर तक आकर्षित करती रही है। तवायफों और मिरासिनों के गीतों और गायन शैली की बानगी रखते हुए उन्होंने बताया कि उनके गीतों में थोड़ा बहुत फर्क रहन-सहन से आया मगर अब उनकी परम्पराएं लगभग लुप्त हो गई हैं।

उन्होंने बताया कि अवधी जन्म, विवाह आदि के संस्कार गीतों में नायक राम और नायिका सीता हैं। झूला और कजरी गीतों में जरूर श्रीकृष्ण और राधा का उल्लेख मिलता है। अवधी कजरी की धुन और ठेका भी अलग है। इसी तरह लुप्तप्राय अवधी जगमोहना सबसे लम्बा अवधी गीत है। इसमें श्रीकृष्ण के घर पैदा हुए प्रद्युम्न को लेकर रचा प्रसंग लगभग सवा घण्टे तक गाया जाता है। जगमोहना का नाम रुक्मिणी के दुपट्टे जगमोहन से लिया गया है।

उन्होंने कहा कि अवधी भाषा के लोक गीतों, रीतों, संस्कारों ने सभी को इतना प्रभावित किया कि यह गीत रामपुर, हैदराबाद, दिल्ली और नवाबी दरबार तक पहुंचे और गाए जाते रहे। शास्त्रीय बंदिशें भी अवधी में हैं और लोकनाट्य नौटंकी से लेकर फिल्मों तक में इनको खूब प्रयोग किया गया।

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