पांचाल देश के किसी नगर में एक राजा राज करता था। एक दिन जब राजा अपने सिंहासन पर विराजमान था, एक चारण आया और उसने राजा का जयजयकार किया। राजा ने कहा, ‘मेरी राजसभा में सबकुछ है। मुझे प्रशंसा नहीं चाहिए। कोई कमी हो तो बताओ।’
चारण ने राजसभा पर दृष्टि डाली और कहा, ‘आपकी राजसभा बड़ी सुन्दर है, पर इसमें एक चित्रशाला का अभाव खटकता है।’
राजा ने उसी समय आदेश दिया कि एक चित्रशाला बनाई जाए। चित्रशाला बनाने का काम आरंभ हुआ और कुछ ही समय में अद्वितीय चित्रशाला बनकर तैयार हो गई।
तब समारोह किया गया। चित्रशाला के मध्य में इंद्रध्वज की स्थापना की गई। बहुत-सी ध्वजाओं के कारण वह इन्द्रध्वज बड़ा मोहक लग रहा था। समारोह समाप्त होने पर साज-सज्जा की सारी सामग्री एक ओर पटक दी गई। इंद्रध्वज को भी उस ढेर में डाल दिया गया। जिस सामग्री ने चित्रशाला की शोभा में चार चांद लगाये थे, उस पर धूल-मिट्टी पड़ने से वह विरूप हो गई। एक दिन राजा की निगाह अकस्मात उस इंद्रध्वज तथा अन्य सामग्री पर पडी। पूछने पर लोगों ने राजा को बताया कि ये सब वही चीजें हैं, जिनसे चित्रशाला को पहले दिन सजाया गया था।
यह सुनते ही राजा का चिन्तन नई दिशा में चल पड़ा। उसने मन-ही-मन कहा, संसार में सुन्दरता कुछ नहीं है। उसकी शोभा पर- वस्तुओं से है। सुन्दर वस्त्रों और आभूषणों से है। सारी चमक-चमक उधार ली हुई है। ऐसी मोहकता किस काम की! वह मुझे नहीं चाहिए। आखिर पराये पूतों से किसका घर बसा है? मुझे वह सौंदर्य चाहिए, जो अपना है। वह सौंदर्य अपने भीतर है। मझे आत्म-लीन होकर वास्तविक सौंदर्य प्राप्त करना चाहिए।
सारे राज-वैभव से विमुख होकर राजा आत्म-साधना के पथ पर चल पड़ा। अपने कठोर संयम और तप से केवल-ज्ञान की उपलब्धि की और मोक्ष-पद पर आसीन हुआ।







