…उस मुल्क की सरहद की निगेहबान हैं आंखें

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जी क़े चक्रवर्ती

भारत देश को आजादी मिले इस 15 अगस्त को इस बार 71 साल पूरे हो रहे हैं। इस आजादी को लेकर पूरे देश में जश्न मनाया जाता है। इन इकहत्तर वर्षो के दौरान हमारे देश ने प्रत्येक क्षेत्र में कई नए कीर्तिमान स्थापित किये हैं। जहां देश ने अनेको राजनीतिक बदलाव देखे, तो विकास की ओर अग्रसर होती योजनाएं एवं कार्यक्रमों के अलावा उसे कई युद्धों से भी दो चार होना पड़ा। भारत ने अपनी परमाणु शक्ति में भी बढ़ोत्तरी करने के अलावा मेट्रो ट्रेन से लेकर कम्प्यूटर तक भारतीय नागरिकों के जीवन का हिस्सा बने। आज हम दुनिया के दिग्गज देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर तरक्की के पथ पर अग्रसर होते चले जा रहे हैं। मगर देश के स्वतंत्र होने से लेकर मौजूदा वक्त तक हम लोगो ने तमामो उतार-चढ़ावों के साथ आजादी को हासिल करने के लिए अनेको बलिदान दिए।

15 अगस्त, वर्ष 1947 का दिन हमारे देश भारत के लिए बहुत ही भाग्यशाली दिन था। वह दिन हम प्रत्येक भारतीयों के लिए सुनहरे अक्षरों में लिखा गया। वर्ष 1947 को भारत ने ब्रिटिश राज्य से आजादी प्राप्त की थी। हमारे देश की स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व महात्मा गांधी जी से लेकर अनेको महान नेताओं के साथ साथ देश के अनेको नागरिकों ने भी भाग लिया था और इस दौरान बहुत से भारतीयों ने अपना जीवन भी बलिदान कर दिया। इसी दिन हिंदुस्तान की 45 करोड़ भारतीयों नागरिकों को विदेशी दासता से मुक्ति मिली थी। उस दिन से प्रत्येक भारतीय स्वतंत्रता दिवस को एक राष्ट्रीय पर्व के रूप में पूरा देश मनाता चला आ रहा है।
वास्तविक रूप से स्वतंत्रता के बिना विशेष कर हमारा मानव जीवन ही व्यर्थ है। पराधीन मनुष्य ना तो स्वमं सुखी रह पाता है और ना ही अपनी इच्छाओं के अनुकूल जीवन व्यतीत कर पाता है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता का विशेष महत्व होता है और वह और भी महत्व पूर्ण हो जाता है यदि सदियों की पराधीनता के बाद स्वतंत्रता मिली हो ऐसी स्वतंत्रता का महत्व और भी बढ़ जाता है।
भारत का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। इस लंबे इतिहास में ऐसे कई विदेशी आक्रांताओं का हमे सामना करना पड़ा। अधिकतर विदेशी आक्रमणकारी यहां रहने के दौरान भारतीय सभ्यता संस्कृति में इस तरह घुल मिल गए मानो वे यही के मूल निवासी हो। विदेशी आक्रमणकारियों के आगमन एवं यहां की सभ्यता संस्कृति में घुल-मिल जाने का सिलसिला मध्यकालीन मुगलों के शासन तक बदस्तूर चलता रहा। 18 वीं सदी में जब अंग्रेजों ने भारत के कुछ हिस्सों पर अधिकार कर लिया था तो सर्व प्रथम हमारे देश वासियों को गुलामी का एहसास हुआ था।
अब तक सभी विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत को अपना देश समझ कर यहां लगातार शासन करते रहे लेकिन अंग्रेजों ने भारत पर अधिकार करने के बाद अपने देश इंग्लैंड को धन्य-धान्य से परिपूर्ण एवं सम्पंन करने के उद्देश्य से इसका पूरा-पूरा शोषण करना प्रराम्भ कर दिया था। 19वीं शताब्दी में जब अंग्रेजों ने मुगलों का शासन समाप्त कर सम्पूर्ण भारत पर अपना अधिकार कर लिया तो उनके शोषण अत्याचारों में भी लगातार वृद्धि होती चली गई और भारतीय जनमानस दासता की बेड़ियों में जकड़ता चला गया। भारत मां गुलामी की जंजीरों में जकड़ी कराह उठी। आजादी का यह संघर्ष 19वीं शताब्दी के मध्य में प्रारंभ हुआ। इस संघर्ष में भारत माँ के असंख्य वीर पुत्र सदा सदा के लिए वलिदान की वेदी में सो गये। अनगिनत निर्दोष भारतीय लोग अंग्रेजों के जुल्म के शिकार हो कर कुछ एक लोगों को मार डालते रहे।
मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले बहुत से वीरो को जेल की सलाखों के पीछे नरकीय जीवन की यातनाएँ सहते हुए व्यतीत करना पड़ा। उनमे से अधिकतर वीरों को काला पानी की सजा भी दी गई। आजादी का यह संघर्ष वर्ष 1947 तक चलता रहा। आजादी के इस संघर्ष के अनगिनत नायकों में मंगल पांडे, महारानी लक्ष्मीबाई, तात्याटोपे, कुंवर सिंह, राम प्रसाद, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, खुदीराम बोस, विनय, बदल, दिनेश, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरु, लाल बहादुर शास्त्री, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, जय प्रकाश नारायण आदि जैसे कुछ एक सेनानियों ने तो हस्ते-हस्ते अपने प्राणों तक की आहुति दे दी।
उस मुल्क की शरहद को कोई छू नही सकता,
उस मुल्क की सरहद की निगेहबान हैं आंखे।

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