जी क़े चक्रवर्ती
दुनिया मे केवल एक शब्द ‘आजादी’ एक ऐसा शब्द है जिसके जुबान पर आते ही स्वतः ही हमारे मन एवं दिलों दिमाग मे एक चुस्ती फुर्ती एवं उतेजना जैसे भावों का उपन्न होना, हम मानव प्राणियों के देह मस्तिष्क में अजब सी फुर्ती एवं एक प्रकार का उर्जा संचार होने लगता है और जब अपने देश भारत की आजादी की बात होती है तो न जाने कितने वीर जवान, बूढ़े, बच्चे, महिलाए समाज के प्रत्येक जनमानस को इस आजादी को पाने में अपने प्रियजनों तक को अपनी जान गवा दी। तब कही जाकर हम भारतवासियों को अंग्रेजी शासन की गुलामी से मुक्त हुए और खुले आकाश में चैन की सांस लेने की आजादी मिली।
आजादी की वह तारीख 15 अगस्त सन 1947 का दिन पीढ़ी दर पीढ़ी शायद ही कभी हम आप कोई भी भारतीय भूल पायेगा। इस तारीख से पहले हमारा देश अंग्रेजो के अधीन था। यह दिन हम भारतीयों का राष्ट्रीय त्योहार है लगभग 150 वर्षों के बाद लाखो शहीदों के बलिदानों के बाद हमारे भारत को आजादी प्राप्त हुई।
हम भारतीयों पर अंग्रेजो का शासन था,एक ऐसा क्रूरतम शासक की शासन व्यवस्था जिसकी कल्पना मात्र से ही हमारे समस्त शरीर में सिहरन उत्पन्न हो जाती है और इसकी कोई सपने में भी नही करना चाहेगा। देश का स्वन्त्रन्ता दिवस हम भारतीयों के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है अंग्रेजो से आजादी मिलने के बाद प्रतिवर्ष 15 अगस्त के दिन स्वन्त्रन्ता दिवस के रूप में मनाये जाने का चलन हमारे भारत देश में है, जिसके कारण प्रतिवर्ष अपने देश को आजादी मिलने की ख़ुशी के साथ साथ इन बलिदानियों के त्याग और बलिदान को याद करने का दिन है यानी 15 अगस्त का दिन भारतीय इतिहास का स्वर्णिम दिन है यह भारत के एक नये युग की बेला की शुरुआत थी। जिसके कारण प्रतिवर्ष लाल किले पर तिरंगा फहराने के बाद हमारे देश के प्रधानमन्त्री का भाषण होता है जो देश की आजादी को निरंतर बनाये रखने की प्रतिज्ञा लेते है इस प्रकार स्वन्त्रन्ता दिवस हर भारतीय के लिए एक विशेष दिन होता है।
इस दुनिया मे जब कोई भी जीव, इन्सान जब पैदा होता है तो वह खुली हवा में सांस लेना चाहता है लेकिन किसी दूसरे लोगों द्वारा जबरदस्ती थोपी गयी गुलामी किसी को भी पसंद नही होती है जिसके कारण आजादी के परवानो ने अनेक नारों का सहारा लिया जो धीरे-धीरे सबके लिए आजादी पाने का मकसद बन गया इन्ही नारों में जिसे आभास करते हुए प्रथम बार ‘बाल गंगाधर तिलक’ ने अंग्रेजो से कहा था –“स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है इसे लेकर रहेगे”।आजादी हासिल करने की ऐसी सबके भीतर ऐसी ललक थी कि सुभाष चन्द्र बोस ने कहा की “तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा” और राम प्रसाद बिस्मिल ने तो अंग्रेजो से सीधे-सीधे लोहा लेते हुए यह गाते थे की “सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाजु-ए कातिल में है”
उस वक्त देश भक्ति से ओत-प्रोत प्रत्येक भारतीय का सिर्फ और सिर्फ यही सपना था की हमारे देश को कैसे आजादी मिले चाहे उसके बदले उन्हें अपनी जान तक की कीमत ही क्यों न चुकानी पड़े। जिसके कारण राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने सीधा अंग्रेजो से कहा “अंग्रेजो भारत छोडो” तो दूसरी ओर बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने केवल एक ओजस्ववि नारा दिया जो आजादी के मतवालों के लिए एक मन्त्र बन गया वह है “वन्दे मातरम”और यही नही देश के तरुण युवा जो स्वमं को आजादी के संघर्ष जोड़ते हुए आगे निकल कर सामने आये थे, जिनमे प्रमुख रूप से भगत सिंह ने “इन्कलाब जिंदाबाद” का नारा दिया था।
वहीं पर पहली बार मंगल पांडे ने ही कहा था “मारो फिरंगियों को” तो इसी आजादी को पाने के लिए जहां सभी आजादी के मतवाले एक तिरंगे के नीचे एकत्रित हो जाते थे। जिसे इस तिरंगे की महत्ता को देखते हुए ‘श्याम लाल गुप्ता’ ने कहा था – “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा उचा रहे हमारा” तो भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अंग्रेजो की अंग्रेजी से तंग आकर हिंदी के विकास के लिए एक सम्पूर्ण भारत की कल्पना करते हुए कहा- “हिंदी हिन्दू हिदुस्तान यह वही नारा था जो आजादी के समय भारतीयों के लिए उर्जा का काम किया। आज वर्तमान तक इस नारे में इतनी ओज पूर्ण शक्ति है जिसे सुनकर हम प्रत्येक भारतीयों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
आज वर्तमान समय में हम सभी भारतीयों का यही फर्ज बनता है सभी लोग एक दूसरे के साथ मिलकर रहे और आपसी मतभेदों को भुलाकर देश के दुश्मनों का डट कर सामना करने के लिए सदैव निस्वार्थ भाव से तत्पर रहे तभी हम अपनी इस मिली आजादी की अखंडता को बनाये रखते हुये हम भारत को फिर से विश्वगुरु बनाने में सफल होंगे।







