लेकिन मेरा भी तो कोई फर्ज था ?

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file photo

एक बार एक आदमी घोड़े पर कहीं जा रहा था। अचानक उसके हाथ का चाबुक गिर गया। उसके साथ और भी कुछ आदमी चल रहे थे। वे चाबुक उठाकर उसे देने के लिए आगे बढ़े कि उस आदमी ने उन्हें रोक दिया। वह स्वयं घोड़े से नीचे उतरा और चाबुक उठाकर फिर घोड़े पर सवार हो गया। एक आदमी ने उसे रोककर कहा, “भाई साहब, यह आपने क्या किया ? चाबुक उठाकर हम आपको दे देते। उसके लिए आपको घोड़े से उतरने की क्या जरूरत थी?”

उस आदमी ने गंभीर होकर कहा, “जब मेरे हाथ-पैर चलते हैं तो मैं किसी का अहसान क्यों लूं?” उस आदमी ने कहा, “इसमें अहसान की क्या बात है? यह तो इंसान का फर्ज है कि वह दूसरों की मदद करे।’
घुड़सवार ने कहा, “आपने तो इसे फर्ज माना, लेकिन मेरा भी तो कोई फर्ज था ?’
“वह क्या ?” उस आदमी ने कौतूहल से पूछा।

घुड़सवार ने उत्तर दिया, “मेरा फर्ज यह था कि मैं भगवान की दी हुई शक्ति का उपयोग करूं। आदमी एक बार दूसरों का सहारा ले लेता है तो फिर दूसरों पर निर्भर करने की आदत पड़ जाने का खतरा रहता इतना कहकर वह अपने रास्ते पर बढ़ गया।

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