भाई दूज: बहन की रक्षा प्रतिज्ञा का पर्व

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दीपावली के साथ शुरू पांच दिवसीय त्योहार का अंतिम पर्व भाई दूज है। जो शुक्रवार को मनाया जायेगा। अलग-अलग संस्कृति में भाई दूज के मान्‍यताएं और मनाने के तरीके अलग हैं। सामान्‍यत: बहनें इस दिन अपने भाई को एक चौका में बैठा कर उसके माथे पर तिलक लगाती हैं। भाई-बहन के बीच के प्रेम का प्रतीक भाई दूज में भाईयों को तिलक लगाने का अधिक महत्व है।

मान्यता है कि इसके बाद भाई के हाथ में पान पत्ता, कसैली, अक्षत आदि देकर उनसे सुरक्षा की कामना की जाती है। मि‍ठाई, फल आदि से भाईयों का मुहं मीठा किया जाता है। जिसके बाद भाईयों की आरती की जाती हैं। एक मान्यता के अनुसार भाई दूज यम-यामिनी नामक भाई-बहन की कथा से प्रेरित है। जिसमें बहन अपने भाई को मृत्यु से बचाती है। दूज के दिन भाईयों का बहनों के घर खाना खाने की विशेष परंपरा है, जिसके लिए अलग-अलग पकवान बहनें बनाती हैं।

मान्यता के अनुसार भाई दूज के दिन दोपहर के बाद ही भाई को तिलक व भोजन कराना चाहिए। इसके अलावा यम पूजन भी दोपहर के बाद किया जाना चाहिए।

भाई दूज का इतिहास: 

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार एक दिन मृत्यु के देवता यमराज अपनी बहन यमी (यमुना) के घर बहुत दिनों के बाद पहुँचे यम को अपने घर देखकर यमुना को खुशी का ठिकाना ना रहा बहन ने भावविभोर होकर भाई की आरती उतारी और तिलक कर उनका स्वागत किया उसके बाद खाने के लिए मिठाई सहित एक माला और विशेष व्यंजन पेश किए। उस दिन यमराज ने खुश होकर घोषणा की थी कि जो भाई अपनी बहन द्वारा तिलक और आरती प्राप्त कर यमुना में स्नान करेंगे उनका जीवन वैभवशाली होगा। यही कारण है कि इस दिन को यम द्वितिया भी कहा जाता है।

भाई दूज की एक कथा भगवान श्रीकृष्ण और उनकी बहन सुभद्रा से भी जुड़ी है जिसके अनुसार, भगवान कृष्ण इस दिन राक्षस राजा नारकासुर का वध करने के बाद अपनी बहन सुभद्रा के घर पहुँचे थे, जहां उनकी बहन ने तिलक, आरती, मिठाई और फूलों के साथ स्वागत किया था। नरकासुर वही दैत्य था जिसने 16000 महिलाओं को बंदी बना रखा था और भगवान कृष्ण ने उन सभी को नरकासुर के चंगुल से आजाद कराया था।

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