खेल तुग़लक के दिमाग का!

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दयानन्द पांडेय
राजनीति में कुछ लोग सेक्यूलर होने का ढोंग चाहे जितना भी कर लें, लेकिन धर्म का राजनीति पर हमेशा से बहुत गहरा प्रभाव रहा है, सर्वदा रहेगा। एक शासक हुआ है तुग़लक। लोग उस को पागल तक कहते हैं। लेकिन सच तो यह है कि वह पागल नहीं था, बहुत बुद्धिमान था। हां, बतौर प्रशासक अक्षम ज़रुर था। अपने अक्षम होने को छुपाने के लिए ही वह दिल्ली से तुग़लकाबाद, तुग़लकाबाद से दिल्ली राजधानी बनाता था और चमड़े के सिक्के चलाता था। सिर उठाते सूबेदारों को काबू करने के लिए वह ऐसा करता था।
लेकिन इस सब के बावजूद वह एक बार धार्मिक झंझट में फंस गया। बाकी जगह तो आप धर्म से दाएं, बाएं कर के लड़ भी सकते हैं लेकिन इस्लाम में तो मज़हब से लड़ना सोचना भी हराम है । लेकिन पागल बताए जाने वाले  तुग़लक ने इस्लाम के इस अफ़ीम से भी बहुत ख़ूबसूरती से लड़ा । हुआ यह कि तुग़लक ने सब को बहुत इत्मीनान से निपटाया लेकिन एक मौलवी ने तुग़लक को जब इस्लाम के फंदे में फंसा लिया तो तुग़लक हैरान रह गया । लेकिन मौलवी ने आहिस्ता-अहिस्ता तुग़लक का विरोध इतना ज़्यादा कर दिया कि तुग़लक का तख्ता पलट होने की संभावना बहुत ज़्यादा बढ़ गई । तुग़लक ने फिर इस मौलवी को निपटाने की एक बड़ी तरकीब निकाली। पड़ोसी राज्य से युद्ध की स्थिति बना दी ।
और जब युद्ध होना लगभग तय हो गया तो तुग़लक एक दिन मौलवी के पास गया। बोला कि हमारे आप के मतभेद अपनी जगह हैं लेकिन मुल्क अपनी जगह है । मुल्क हम दोनों का है । मुल्क रहेगा तो ही हम भी रहेंगे। मुल्क नहीं, तो कुछ नहीं। पहले हम मिल कर पड़ोसी दुश्मन को सबक सिखा दें । फिर आप जैसा चाहेंगे, वैसा ही होगा। मौलवी जब उस की बात से सहमत हो गया तब तुग़लक ने कहा कि मैं चाहता हूं कि इस जंग में आप भी राजा की तरह लड़ें। फ़ौज का नेतृत्व करें । मेरी ही तरह आप भी तुग़लक बन कर लड़ें । एक मोर्चा आप संभालें, दूसरा मोर्चा मैं। मौलवी तुग़लक के झांसे में आ गया। तुग़लक बन कर तुग़लक के कपड़ों में, तुग़लक की सवारी पर फ़ौज का नेतृत्व करते हुए जंग पर चला गया। अब मौलवी लड़ना तो जानता नहीं था, सो लड़ाई में मारा गया।
मारा भले मौलवी गया लेकिन इधर दुश्मन की सेना में बात फ़ैल गई कि तुग़लक मारा गया। एक तीर से दो निशाना । खैर दुश्मन के खेमे में जश्न शुरू हो गया । दुश्मन की सेना बेखबर हो कर जश्न मना ही रही थी कि तुग़लक ने अचानक दुबारा हमला कर दुश्मन पर बहुत आसानी से फ़तह कर लिया। दुश्मन राजा भी मारा गया और मौलवी भी । तुग़लक के लिए  मैदान साफ़ हो गया। फिर भी लोग जाने क्यों तुग़लक को पागल बताते हैं। खैर, तब तुग़लक मज़हब से लड़ने की तरकीब जानता था।
आज लेकिन सेक्यूलरिज्म के घनघोर दौर और दंभ में भी धर्म से लड़ने का लोग हौसला नहीं रखते। सेक्यूलरिज्म के नशे में चूर, राम के अस्तित्व को जो लोग अदालत में हलफनामा दे कर इंकार करते हैं, वही लोग रावण दहन भी करते हैं । जनेऊ पहन कर मंदिर-मंदिर घूमते हैं। भारत में सेक्यूलरिज्म के सब से बड़े पैरोकार और बाप वामपंथी लोग भी इस सब पर ख़ामोशी का चोला पहन लेते हैं। ख़ामोशी की लंबी चादर ओढ़ कर सो जाते हैं।
लेकिन धर्म से लड़ने के लिए धर्म को अफीम बताते नहीं थकते। लेकिन सेक्यूलरिज्म के नाम पर समाज में विभाजन का जहर फ़ैलाने में महारत रखते हैं । लकड़ी की तलवार भांजते लोग लेकिन धर्म से लड़ रहे हैं और पूरी बहादुरी से । यह सेक्यूलर लोग हैं । सच यह है कि यह लोग न तो मंदिर के अफ़ीम से लड़ सकते हैं, न मस्जिद की अफीम से, न गिरजाघर के अफीम से। बल्कि मस्जिद और गिरजाघर की गोद में बैठ कर ही अभी तक सेक्यूलरिज्म की काठ की तलवार भांजते और लड़ते रहे हैं । नफ़रत की दीवार बनाते रहे हैं सेक्यूलरिज्म की आड़ में। अब इन को सत्ता साधने के लिए मंदिर के अफीम की तलब लग गई है। यह तलब अभी नई-नई है। सरोकार नामा से साभार

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