.दुबई के फाइव स्टार होटल में श्री देवी की सामान्य मौत पर सदमा जायज़ है
.लेकिन गाँव की छोकरी को जिन्दा जलाने पर हमारी आँखे भी नहीं पसीजती
नवेद शिकोह
लखनऊ, 26 फरवरी। सोशल मीडिया देश-दुनिया का बड़ा प्लेटफार्म बन गया है। ये आम इंसान की ताकत है। इस पर देश-दुनिया का नजरिया और उसका रूख जाहिर हो जाता है। सोर्स सिफारिश, धर्म-जाति, क्षेत्र और लिंग वाद किसी की प्रतिभा, काबिलियत और अभिव्यक्ति की आजादी में रूकावट डाल सकता है। लेकिन सोशल मीडिया के रिवाज के बाद अब किसी का टैलेंट किल नहीं हो सकता। इस प्लेटफार्म पर ना कोई सरकार आपकी बात/टैलेंट/जागरूकता /योग्यता /क्रांति /सच/खबर/अभिव्यक्ति… पर पहरे बैठा सकती है ना आप धन अभाव का बहाना बना सकते हैं।
आज सुबह से सोशल मीडिया के चप्पे-चप्पे पर महान अदाकारा श्री देवी जी की मृत्यु पर शोक का मातम छाया है। मुझे भी सदमा है। वो देश की महान अदाकारा थीं। उनकी कितनी ही फिल्में हमारा दौर बनकर हमारी जिंदगी में देखी जा चुकी हैं। लेकिन इस ग़म से ज्यादा गमगीन हमें तब भी होना चाहिए है जब हमारे समाज में एक आम और गरीब इंसान जुल्म का शिकार होकर मौत के मुंह मे झोक दिया जाता है। सैक्स की हवस में या धर्म और जाति की नफरत की आग में गरीबों को जिन्दा जला दिया जाता है।
हम आम इंसानों की अजीब फितरत है कि हम जुल्म और ज्यादती का शिकार निर्दोष आम और गरीब इंसान को जिन्दा जला देने पर गम-ओ-गुस्से को सोशल मीडिया पर उतना व्यक्त नहीं करते जितना अमीर सेलिब्रिटी की साधारण मौत पर मातम करते है।
हमारे समाज में बढ़ती हैवानियत जब हमारा नंबर लगाकर हमें मारेगी तो आम इंसान ही इसके खिलाफ खड़ा हो सकता है खास इंसान तो आम इंसान की मौत या हत्या को आम घटना ही मानता है।







