जानिए महर्षि बाल्मीकि जी को ब्रह्मा जी ने दर्शन देकर क्या कहा ?

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राम मिलिहें मरा मरा में

हमारे देश मे कल यानिकि 30 अक्टूबर को सरदार बल्लभ भाई पटेल की जयंती और आज 31 अक्टूबर बाल्मीकि जयंती के रूप में मनाई गयी। प्रति वर्ष आश्विन माह की पूर्णिमा को महर्षि वाल्मीकि की जन्मदिन मनाये जाने का प्रचलन है। हमारे धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि वाल्मीकि जी ने रामायण काव्य की रचना की थी, लेकिन इसके बाद रामायण की रचना तुलसी दास ने “राम चरित्र मानस” के नाम से की, लेकिन हमारे समाज में तुलसी कृत रामायण अधिक प्रचलित हुआ। धर्म पुराणों में वर्णित वाल्‍मीकि पहले रत्नाकर नाम से एक डाकू हुआ करते थे, नारद मुनि की बात सुनकर उनके जीवन में एक ऐसा परिवर्तन आया कि उनका हृदय परिवर्तन हो जाने से वे सभी तरह के अनैतिक कार्यों को छोड़ प्रभु राम के मार्ग को चुना। इसके पश्चात वे संसार मे महर्षि वाल्मीकि के नाम से विख्यात हुये।

पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार बाल्मीकि इनके पिता सृष्टि के रचियता परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्र हुआ करते थे। जिस समय रत्नाकर बाल्यावस्था थे उस समय एक भीलनी द्वारा उनको चुरा लिया गया था। इसलिये इनका लालन-पालन भील समाज के परिवार में हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि भील सम्प्रदाय के लोग राहगीरों को लूटने का काम किया करते थे। इसलिये वाल्मीकि ने उन भीलों द्वारा किया जाने वाला कर्म और काम-धंधे को अपनाया।

पुराणों की मान्यताओं के अनुसार, एक बार नारद मुनि जंगल के रास्ते से होकर गुजर रहे थे कि तभी डाकू रत्नाकर ने उन्हें घेर लिया और उन्हें बंदी बना लिया तब नारद मुनि ने डाकू रत्नाकर से एक प्रश्न किया कि कि क्या तुम्हारे घरवाले भी तुम्हारे द्वारा किये जाने वाले प्रत्येक बुरे कर्मों के फल के भागीदार होंगे, क्योंकि तुम राहगीरों को लूट कर जो धनर्जित करते हो उससे अपने घर के लोगों का भरण पोषण करते हो यह सुन कर डाकू रत्नाकर ने अपने घरवालों के पास जाकर नारद मुनि द्वारा पूछे गये प्रश्न को उनके सामने दोहराया इस प्रश्न के उत्तर में परिवार के लोगों ने उसके पाप के भागीदार बनने से इनकार कर दिया। डाकू रत्नाकर का उनके परिवार वालों के इस उत्तर से ह्रदय को झटका लगा जिससे उसका ह्रदय परिवर्तन हो गया।

तब उसने अपने द्वारा किये गये पाप कर्मों के लिए प्रयाश्चित करने का निश्चय कर अपने जैविक पिता नारद मुनि से इससे मुक्ति का रास्ता पूछा।

नारद मुनि ने रत्नाकर को राम नाम का जाप करने की सलाह देकर वहां से चले गये लेकिन रत्नाकर के मुंह से राम की जगह मरा मरा शब्द ही निकल रहा था। इस तरह वे एक बार पुनः नारद मुनि के मुलाकात की और इसके लिये उपाय पूछ तो नारद मुनि ने उन्हें मरा मरा शब्द ही दोहराने के लिये कहा और कहा कि तुम्हें इसी से राम मिल जाएंगे। ‘मरा-मरा’ का जाप करते करते कब रत्नाकर डाकू तपस्या में लीन हो गये उन्हें पता ही नहीं चला और स्वतः ही उनके मुहँ से राम-राम निकलने लगा, जिसका उन्हें स्वमं इस बात का भान नहीं रहा। उनके तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें वर देते हुये कहा कि आज से तुम्हे संसार के लोग ‘बाल्मीकि मुनि’ के नाम से पहचानें जाओगे और उन्हें रामायण की रचना करने को कह कर वहां से अंतर्ध्यान हो गये। – प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती 

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