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    Home»विदेश»Global NEWS

    लोकल-वोकल और ग्लोबल फार्मूले में यूपी के अखबारी जीविका वालों को बंधी आस

    By May 13, 2020 Global NEWS No Comments3 Mins Read
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    नवेद शिकोह

    स्थानीय पेशों में उत्तर प्रदेश अव्वल है। यहां लोकल अखबारों से जुड़े अखबारकर्मियों की बड़ी संख्या है। कोरोना वायरस ने इन पेशेवरों के पेशे को भी शिकार बनाकर बदहाली की गर्त में पंहुचा दिया है। पत्रकार बेरोजगार हो रहे हैं। चिकनकारी और आरीजरदोजी का कारीगर रिक्शा-ठेला खीचने का विकल्प चुन सकता है। किंतु पत्रकार शायद ऐसा विकल्प नहीं अपना पाये।

    एक समय था जब चिकनकारी आरी-ज़रदोजी जैसे हुनर विश्वपटल पर ग्लोबल धाक जमाये थे, अब बदहाली का शिकार हैं। मुरादाबाद की नक्काशी.. बनारस की बनारसी साड़ियां और भदोही का कालीन उद्योग जैसी तमाम यूपी की लोकल हुनरमंदी दुनिया की पसंद बनी थी। पिछले दस-पंद्रह वर्षों से यूपी के इन उद्योगों की सबकी हालत पतली है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में लोकल अखबारों की तादाद सर्वाधिक है। पत्रकारिता के क्षेत्र के लोगों को इतना रोजगार किसी सूबे ने नहीं दिया जितने रोजगार यूपी के लोकल अखबारों ने दिए। हिंदी पट्टी के कई ब्रांड अखबार भी कभी लोकल हुआ करते थे। कॉरपोरेट घरानों ने इन्हें शुरू नहीं किया था। देखते देखते ये राष्ट्रीय ब्रांड अखबार बन गये। आज भारत की पत्रकारिता की शान हैं और लाखों लोगों की रोजी-रोटी का सहारा हैं। देश के डीएवीपी और गैर डीएवीपी अखबारों-पत्रिकाओं की जितनी संख्या है उनमें से लगभग आधे उत्तर प्रदेश के हैं। करीब पांच-सात सौ पत्र-पत्रिकायें तो उ.प्र.सूचना विभाग की विज्ञापन सूची में सूचीबद्ध हैं। इनमें 97% कम संसाधनों से प्रकाशित होने वाले लघु एवं मध्यम वर्ग के पत्र-पत्रिकाएं हैं। यूपी सरकार छोटे/कम संसाधन कै संघर्षशील और गैर कॉरपोरेट अखबारों को विज्ञापन का सहयोग करती है।

    जब 97% लोकल पब्लिकेशन हैं तो ज़ाहिर सी बात है कि बड़ी संख्या में इससे जुड़े लोगों का जीवन-यापन/रोजी-रोटी जुड़ी है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना काल में बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से उबरने के लिए बीस लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की है। आर्थिक सुधारों के लिए आत्मनिर्भरता, स्वरोजगार और लोकल पेशों को इस आर्थिक पैकेज से खाद्य-पानी दिया जायेगा, इस बात की आस बंध गयी है। उत्तर प्रदेश के लोकल पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े प्रकाशकों, पत्रकारों और अखबारकर्मियों को उम्मीद है कि कोरोना काल में उन्हें भी कोई आर्थिक सहायता मिलेगी। लखनऊ के कई पत्रकार छोटे प्रकाशक के तौर पर खुद अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं और तमाम अखबारकर्मियों को रोजगार देने का काबिले तारीफ काम कर रहे है। इधर तमाम छोटे उद्योगों/ठेले वालों/कामगरों/श्रमिको/मजदूरों की बदहाली की तरह छोटे अखबारों की भी बुरी स्थिति है। आय के स्त्रोत बंद हो गये हैं इसलिए पब्लिशर अखबारकर्मियों को उनका मामूली वेतन देने की स्थिति में नहीं है।

    पत्रकारों और प्रकाशकों को प्रधानमंत्री के राहत पैकेज से उम्मीद बंधी है। वरिष्ठ पत्रकार और प्रकाशक मनोज मिश्रा कहते हैं कि समाचार पत्र का प्रकाशन रोजगार की कड़ी का एक अहम् हिस्सा है। सीधे तौर पर एक छोटे दैनिक पेपर मे भी लगभग 20 लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष 30 परिवार की रोजी रोटी जुडी हुई है। केंद्र /प्रदेश सरकार इस पर गंभीरता से विचार करें। उत्तर प्रदेश मे 2000 समाचार पत्र है जो davp हैं और नियमित प्रकाशित होते है। ये पत्र-पत्रिकायें सरकार से सीधे जनता को जोड़े हुए हैं। सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और आम जनका के बीच ये अखबार सेतु की भूमिका अदा कर रहे हैं।

    इस कोरोना महामारी मे भी ब्लॉक /तहसील /जिला /राज्य के पत्रकार 24X7 सर्विस दे रहे हैं। जहां एक तरफ लघु मध्यम उधोगों को पुनः स्थापित करने मे पूरी सजग वहीँ दूसरी तरफ सिर्फ कुछ वित्तीय मदद से ही देश नहीं सिर्फ उत्तर प्रदेश मे लाखों लोग बेरोजगार होने से बच जायेंगे। एक चेन है जिसे समझना पड़ेगा हॉकर्स/फोटोग्राफर्स /कप्यूटर ऑपरेटर /संबाददाता /टेक्निकल स्टॉफ मशीन मैन /प्लेटमेकिंग /बाइंडर /ट्रांसपोर्टर /स्टाल /इलेक्ट्रिक स्टाफ इन सबको देंखेगे तो पता चलेगा।

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