चुनावी विज्ञापन कम हुआ, बड़ी वेबसाइट्स का कंटेंट बिक गया!

0
156
नवेद शिकोह
“भाड़ में जाये इलेक्शन ! कोई हारे या कोई जीते, हमसे क्या मतलब।”
कल तक चुनावी माहौल में चहक रहे मेरे मित्र का एकाएकी रुख बदल गया। चुनाव कैसा चल रहा है ! मेरे इस सवाल के जवाब में मित्र ने उपरोक्त उखड़ा हुआ जवाब दिया तो मैं दंग रह गया। अरे यार, कल तक तो बहुत उत्साहित थे। पत्रकार हो..अखबार चलाते हो..चुनावी माहौल में सक्रिय थे इसलिए मैंने चुनाव के बारे में पूछ लिया।
फिर कुछ ठंडे होकर “झमझम टाइम्स” के मालिक मित्र संजय चौबे ने जवाब दिया- पांच साल बाद आने वाली सहालग चौपट हो  गई। लोकसभा चुनाव में कोई भी पार्टी एक रूपये का भी चुनावी इश्तहार नहीं दे रही है। हमेशा हर चुनाव में छोटे-छोटे एक एक अखबार को पार्टियां विज्ञापन देती थीं। सुना है बहन जी ने अखिलेश को विज्ञापन जारी करने की इजाजत नहीं दी। कांग्रेस और भाजपा को पता नहीं क्या हो गया ! माना पार्टियां जानती हैं कि हमारे जैसे हजारों के चिथड़़े (फाइल कापी अखबार) कोई नहीं पढ़ता , लेकिन फिर भी हम लोगों को पार्टियां उस बजट में इश्तहार दे देती थी जिस बजट में पब्लिक को खुश करके उनसे वोट लेने के लिए गांव-गांव दारू के पव्वे बांटे जाते थे।
ये दर्द भरी दास्तां सुनकर मैंने चौबे को विज्ञापन गायब होने की अस्ल वजह बताई –
देखो ऐसा है अब विज्ञापन का दौर खत्म हो गया है,या यूं कहो कि विज्ञापन की सूरत बदल गई है। देश के कुल अखबरों के दो-तीन फीसद बड़े/ब्रांडअखबारों-चैनलों को भी नाममात्र के चंद विज्ञापन ही दिये जायेंगे।
दरअसल अब बड़े अखबारों और चैनलों से ज्यादा इनकी वेबसाइट के साथ पार्टियों की कंटेंट पर डील हो गई है। प्रचार का सारा बजट बड़ी वेब मीडिया निगल गई है। ये वेबसाइट्स ही पार्टियों के पक्ष और विरोध में माहौल बना रही हैं।
ये डील बहुत साइलेंट हुई है। चुनाव आयोग को अखबारों/चैनलों के विज्ञापनों के खर्च के हिसाब की भी टेंशन होती है। कंटेंट यानी पक्ष/विरोध की खबरों की डील प्रिट/इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को चुनाव से एक महीने पहले माला-माल कर चुकी है। बड़े मीडिया ग्रुपस का वेब सेक्शन ही सोशल मीडिया पर भी कब्जा किये है। ये सोशल मीडिया में घुसपैठ करके सोशल मीडिया में माहौल बनाता है।
पब्लिक समझती है कि सोशल मीडिया तो पब्लिक का वास्तविक रूख है। इस साजिश को और भी पुख्ता करने के लिये  नामी-गिरामी मीडिया समूह करोड़ों की पंहुच वाली अपनी वेबसाइट्स पर पब्लिक ओपीनियन के नाम पर आउट सोर्सेज से पार्टियों के मुताबिक खबरे/सर्वेक्षण/विश्लेषण को करोड़ों लोगों तक पंहुचा देते हैं। वेबसाइट्स की ये सामग्री सोशल मीडिया का हिस्सा बनकर आम जनता के बीच आम जनता के रूझान की सूरत में पेश होती है।
देश के Top Ten चैनल और अखबार की जितनी टीआरपी/रीडरशिप होती है उससे सौ गुना दायरा इनकी वेबसाइट्स का होता है।
मीडिया और सोशल मीडिया का टू इन वन काम करने वाली देश की सबसे बड़ी बीस-तीन वेबसाइट्स राजनीति दलों के लिए करोड़ों-अरबों की कीमत पर काम कर रही हैं। इस फार्मूले से  चुनाव आयोग को इश्तहार के खर्च का हिसाब देने का कोई झंझट नहीं। पेड न्यूज के रूप में भी कोई खबर नहीं पकड़ी जा सकती। क्योंकि इन वेबसाइट्स पर आधी से ज्यादा प्रायोजित खबरें/विश्लेषण आउटसोर्सिंग पर एक्सपर्टस से लिखवाये जाते हैं। और कहने को ये पब्लिक ओपीनियन है।
सुन कर चौबे जी चकरा कर गिर गये।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here