लखनऊ, 03 अप्रैल। दो अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस के रूप में मनाया जाता है। ऑटिज्म एक ऐसी बीमारी है, जिससे शिकार बच्चे अपने आप में ही खोए रहते हैं। वे सामाजिक रूप से अलग-थलग रहते हैं। किसी से घुलते मिलते नहीं हैं। यहां तक कि वे दूसरों से बात करने से भी हिचकते हैं। बच्चों में इन लक्षणों को आरंभिक अवस्था में भी भांप कर उपचार शुरू कर दिया जाए, तो इस रोग को पूरी तरह काबू में किया जा सकता है। भारत में लगभग दस लाख बच्चे ऑटिज्म प्रभावित हैं।
लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) स्थित पीडिएट्रिक साइकायट्रिस्ट डॉ. अमित आर्या ने बताया कि ऑटिज्म के शुरुआती लक्षण 1 से 3 साल के बच्चों में नजर आ जाते हैं। इसका उपचार जितनी जल्दी शुरू हो जाए, उतना ही अच्छा होता है। ऑटिज्म के लिए आनुवांशिक और पर्यावरण संबंधी कई कारण जिम्मेदार होते हैं। डॉ. अमित आर्या ने बताया कि शोर शराबे के शौकीन लोग अक्सर सड़क के आसपास अपना घर बनाते हैं। ऐसे लोगों को सावधान हो जाने की जरूरत है, क्योंकि ऐसी जगहों पर रहने वालों के बच्चों में ऑटिज्म होने का खतरा दो गुना तक बढ़ सकता है। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है।
ऑटिज्म को कई वैज्ञानिक बीमारी नहीं मानते। इससे पीड़ित बच्चों का विकास थोड़ा धीरे हो जाता है। सामान्य तौर पर ऐसे बच्चों को उदासीन माना जाता है, लेकिन कुछ मामलों में ये लोग अद्भुत प्रतिभा वाले होते हैं। माना जाता है कि सेंट्रल नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचने से यह दिक्कत पैदा होती है। कई बार गर्भावस्था के दौरान खानपान सही नहीं होने से भी बच्चे को ऑटिज्म का खतरा हो सकता है।
केजीएमयू के पीडिएट्रिक विभाग के डॉ. निशांत वर्मा ने कहा कि आधुनिक जीवनशैली की वजह से परिवारों में एकजुटता का भाव काफी कम हो गया है और बच्चों में असुरक्षा का एहसास बढ़ रहा है। बीआरडी महानगर अस्पताल के डॉ. मनीष ने बताया कि एक बच्चे को अपने माता-पिता का समय और परिवार के बुजुर्गों का ध्यान और प्यार चाहिए होता है। इससे वह सुरक्षित और आत्मनिर्भर महसूस करता है। बच्चों को जितना हो सके टीवी, मोबाइल और टैब से दूर रखना चाहिए। इसकी जगह बच्चों में खिलौने, किताबें और घर में कुछ रोचक खेल खेलने की आदत डालनी चाहिए। मोबाइल और दूसरे गैजट्स बच्चों में एक तरह का वर्चुअल ऑटिज्म पैदा कर रहे हैं।







