पीओके-गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों ने कहा हमें भारत के संविधान पर पूरा भरोसा है

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छिन्न-भिन्न हुई राष्ट्र की धरती जिम्मेदार कौन?


वायरल इशू: जी के चक्रवर्ती

अभी हाल ही में देश के जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्‍छेद-370 (Article-370) हटाए जाने के बाद से पाकिस्‍तान के बौखलाने की वजह से वह और भी अधिक उन्मादी हो कर धीरे-धीरे अपना आपा खोता चला जा रहा है। UNSC ( संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) में हुई राष्ट्र मंडल देशों की बैठक में पाकिस्तान के पक्ष में केवल एक देश वह भी चीन खड़ा रहा जबकि भारत के साथ अमेरिका एवं रूस के साथ ही साथ दुनिया के चौदह देशों ने भारत का पक्ष लिया केवल एक देश को छोड़ कर पाकिस्‍तान को इस मुद्दे पर दुनिया के किसी भी देश से समर्थन प्राप्त नहीं हुआ अब तो पीओके के लोगों ने भी अपने आप को भारत में शामिल होने की मांग उठानी शुरू कर दी है। पीओके के क्षेत्र गिलगित -बाल्टिस्तान के लोगों का कहना है कि उन्हें भारत के संविधान पर पूरा भरोसा है एवं वे भारत के साथ जुड़ना चाहते हैं। जबकि गिलगित-बाल्‍टिस्‍तान के लोगों ने भारतीय संविधान में अपने प्रतिनिधित्व की भी मांग उठाने लगे है।
गिलगित -बाल्टिस्तान से ऐसी मांग उठने के कारण अब पाकिस्तान सरकार मुश्किल में पड़ गई है। जबकि कश्मीर के इन हिस्‍सों पर पाकिस्तान ने अपना कब्‍जा कर रखा है। गिलगित -बाल्टिस्तान के लोगों की भारत की संसद में अनुच्‍छेद-370 (Article-370) को लेकर चर्चाओं पर अपनी पैनी नजर रखे हुये हैं।
कश्मीर के इस हिस्से को लेकर हमारी देश की पूर्व सरकारों की नीतियों में एक अजीब तरह की उदासीनता स्पष्ट झलकती है। इसी बात के परिणामस्वरूप पाकिस्तान अभी तक गिलगित और बाल्टिस्तान को अपने पांचवें राज्य के तौर पर देखता रहा और इसे मान्यता देने की तैयारी में लगा हुआ है। अभी हाल ही में पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान के स्वरूप को बदलने का प्रयास करते हुए पाकिस्तानी हुकूमत ने अभी हाल ही में अपने एक आदेश के माध्यम से गिलगित-बाल्टिस्तान में स्थानीय परिषदों के ज्यादातर अधिकार उनसे छीन लिए जिससे इन इलाकों पर पूरी तरह अपना कब्जा करने के असफल प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।
भारत ने पाकिस्तान की इस कारगुजारी पर अपनी कड़ी आपत्ति जताई है। जम्मू-कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है और पाकिस्तान को गिलगित-बाल्टिस्तान समेत अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर के किसी भी हिस्से की स्थिति से छेड़छाड़ करने का अधिकार नहीं है। पाकिस्तान के इस कदम का गिलगित-बाल्टिस्तान में भी जबरदस्त विरोध हुआ है। वहां के लोगों को यह बात समझ में आ गई है कि पाकिस्तान सरकार केवल उनका इस्तेमाल कर रही है। वहां बाहरी लोगों को बसाया गया, जिससे स्थानीय लोग अपने ही घर में बेगाने हो गए हैं।
गिलगित बाल्टिस्तान में काराकोरम राजमार्ग पर 20,000 से अधिक पाषाण-कला एवं पेट्रोग्लिफ के नमूने हैं। इनमें से अधिकांश नमूने हुन्ज़ा एवं शातियाल के बीच दस प्रमुख स्थलों में स्थित हैं। ये नमूने इस मार्ग से निकलने वाले आक्रमणकारियों, व्यापारियों एवं तीर्थयात्रियों एवं स्थानीय निवासियों द्वारा तराशे गये थे। इसके प्राचीनतम ज्ञात काल लगभग 5000 से 1000 वर्ष ई.पू. के हैं। इनमें साधारण पशुओं, मानवों की त्रिभुजाकार आकृतियां बनी हुई हैं। इनमें आखेट के दृश्य हैं, जहां पशुऒं का आकार मनुष्यों से बहुत बड़ा दिखाया गया है। इन नक्काशियों को पाषाण-उपकरणों द्वारा तराश कर एक मोटी प्लेटिनियम की पर्त से ढंक दिया गया था। पुरातत्त्ववेत्ता कार्ल जेटमार ने इस क्षेत्र के इतिहासकारों की जानकारीयां पाकिस्तान के उत्तरी क्षेत्रों से कई शिलालेखों से एकत्रित कर अपनी पुस्तक रॉक कार्विंग्स एण्ड इन्स्क्रिप्शन्स इन द नॉर्दर्न एरियाज़ ऑफ पाकिस्तान में एवं बाद में छपी पुस्तक बिटवीन “गांधार एण्ड द सिल्क रोड्स”- “रॉक कार्विंग्स अलॉन्ग द काराकोरम हाइवे” में इसका उल्लेख किया गया हैं।
पाकिस्तान ही नही वल्कि चीन भी इस जगह पर अपना कब्जा करने के मंसूबे को अपने मन मे पाले हुए है जिस वजह से वह इस मसले पर प्रत्यक्षत: चुप्पी साधे हुए है। इस बात का एक और प्रमाण उसके इस बात से स्पष्ट है कि सीपीईसी के जम्मू-कश्मीर के विवादित क्षेत्र से गुजरने से जम्मू-कश्मीर के प्रति देश के नजरिये में कोई अंतर नहीं आएगा। उसका मानना है कि दोनों देशों को बातचीत से इसका हल खोजना चाहिए। लेकिन चीन का दूसरा पक्ष यह है कि भारत में सत्ता परिवर्तन के बाद वह फूंक-फूंककर कदम रख रहा है। वह नहीं चाहता कि भारत कोई अवरोध उत्पन्न  करे। वैसे भी, मौजूदा भाजपा सरकार ने न केवल सीपीईसी में शामिल होने से स्पष्ट इनकार कर दिया है।
पूर्ववर्ती भारतीय सरकारों के साथ दिक्कत यह रही कि वे 1962 के दु:स्वप्न से आज तक उबर नहीं सकीं। चीन को भी इसकी आदत सी पड़ गई थी जिसके कारण सीपीईसी का मार्ग तय करते वक्त उसने यह भी चिंता नहीं की कि इसके रास्ते में जम्मू-कश्मीर का विवादित इलाका आ रहा है। पर डोकलाम प्रकरण ने उसे पसोपेश में डाल दिया है।
भारत ने क्या खोया-भुस्वर्ग का वह हिस्सा:
जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने वर्ष 1948 में जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय किया था, उस वक्त उनकी रियासत का क्षेत्रफल 2,22,236 वर्ग किलोमिटर था , जिसमें  मुजफ्फराबाद, मीरपुर और रावलकोट जैसे स्थानों (जिसे पाकिस्तान आजाद कश्मीर कहता है) के अलावा गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे राज्य भी इसमे शामिल थे। इस प्रदेश के आधे से अधिक हिस्सा पाकिस्तान-चीन के पास है। भारत के पास केवल 1,01,000 वर्ग किलोमिटर तक का हिस्सा है। पाकिस्तान के कब्जे में 78,114 वर्ग किलोमिटर एवं चीन के कब्जे में 42,735 वर्ग किलोमिटर तक का क्षेत्र है। पाकिस्तानी कब्जे में गिलगित-बाल्टिस्तान का 85 प्रतिशत भाग से भी अधिक का क्षेत्र है। ये इलाके प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध हैं।
वर्तमान समय मे पाकिस्तान को अपने कुल खर्च होने वाले दैनिक पानी का 90 प्रतिशत से अधिक पेयजल इन्हीं इलाकों से प्राप्त होता है। यहां सोने का एक बहुत बड़ा भंडार होने का अनुमान है , क्योंकि यहां पानी में रेत के साथ सोने के कण बहकर चले आते हैं। यह स्थान पाकिस्तान के हाथ पड़ने से पहले तक गिलगित सोने के कणों से ही करों का भुगतान किया करता था। 16 मार्च , वर्ष1846 तक गिलगित-बाल्टिस्तान पंजाब का ही एक हिस्सा था। वर्ष1845 में अंग्रेजों और सिखों के मध्य प्रथम युद्ध हुआ था। सिखों ने अंग्रेजों को पानी पिला दिया था, लेकिन अंतत: वे हार गए। दोनों के बीच 9 मार्च , 1846 को लाहौर में समझौता हुआ।
अंग्रेजों के दिलो दिमाग में सिखों ने ऐसा खौफ पैदा कर दिया था, जिसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंग्रेजों ने युद्धविराम के सात दिनों के बाद यानी, 16 मार्च को अमृतसर संधि के जरिये जम्मू-कश्मीर के इलाके को पंजाब से काटकर जम्मू के डोगरा शासक गुलाब सिंह को 75 लाख रुपये में बेच दिया और इसका आधिपत्य लद्दाख, एस्टोर, गिलगित, बाल्टिस्तान तक हो गया। उसी वक्त से गिलगित और बाल्टिस्तान जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा हैं।
हिंदू राजाओं के काल में यह स्थान सर्गिन नाम से विख्यात था। बाद में इस स्थान पर गलियित एवं सिख शासन के दौरान इसका नाम गिलगित पड़ा। गिलगित-बाल्टिस्तान रणनीतिक दृष्टिकोण से अंग्रेजों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। पेशावर की तरह ही गिलगित का भूगोल भी उन्हें बहुत रास आता था, इसी कारण , यह भूभाग मध्य एशिया को भारत से जोड़ता था , जहां चीन , रूस व ब्रिटिश साम्राज्यों की सीमाएं मिलती थीं। रूस एवं चीन को लेकर ब्रिटेन की अपनी आशंकाएं थीं। इसी कारण जम्मू-कश्मीर को बेचते समय उन्होंने यह शर्त रखी कि यदि इलाके की सरहदों पर कोई मोर्चा खुलाता है तो डोगरा राजा की सेनाएं उसकी ओर से लड़ेंगी।
पाकिस्तान व चीन ने आपस मे जम्मू-कश्मीर के इलाकों की जो बंदरबांट की है, उसके पीछे पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों की गलत नीतियां बहुत हद तक जिम्मेदार रही हैं। उन्होंने कभी अपने इस हिस्से की सुध लेने की सियासी कोशिश भी नहीं की जिसकी उम्मीदें स्वाभाविक रूप से हमसे थीं। इतना तय है कि हमें पाकिस्तान के मामले में आक्रामक कूटनीति का सहारा लेने के साथ ही साथ इसमे निरन्तता बनाये रखना पड़ेगा तभी शायद अपेक्षित परिणाम निकल सकेगा एवं हम इस अपनी भुस्वर्ग कहलाने वाली भूभाग को पुनः अपने देश की सीमा में लाने का एक इस अवसर का पूर्ण फायदा उठाने में कामियाब होंगे।

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