जीवन में उत्साह

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जीवन में उत्साह बना रहे तो इस तरह समस्याएं हल होती हैं! गीता के छठे अध्याय के पांचवें श्लोक में श्रीकृष्ण कह रहे हैं, ‘मनुष्य को चाहिए कि अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे, क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है।’ यानी चित्त में उत्साह बोएंगे तो उत्साहवर्धन होगा और निराशा बोएंगे तो निराशा ही उपजेगी।

कुछ समय पहले एक समारोह में शामिल होना था। समय कम था, लिहाजा हमने टैक्सी ली। टैक्सी वाले की उदास शक्ल देखकर मैंने पूछा, ‘तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है क्या?’ वह बोला, ‘सर, क्या आप डॉक्टर हैं?’ मैंने जवाब दिया, ‘तुम्हारा चेहरा तुम्हें बहुत थका और बीमार बता रहा है।’ इस पर ठंडी आह भरते हुए वह बोला, ‘मेरी पीठ में दर्द बना रहता है।’ उसकी उम्र पूछी तो बताया, ‘तीस वर्ष।’ इस पर मैंने हैरानी जताते हुए कहा, ‘यह तो सिर्फ कसरत से ठीक हो सकता है।’

इसके बाद दूसरा प्रश्न पूछा, ‘क्या आजकल धंधा कुछ मंदा चल रहा है?’ टैक्सी वाले ने आश्चर्य से पूछा, ‘साहब, आपको कैसे पता चला? क्या आप ज्योतिषी हैं?’ मैंने कहा, ‘अरे भई, जब तुम हर वक्त बुझे हुए चेहरे से सवारियों का स्वागत करोगे तो भला कौन तुम्हारी टैक्सी में बैठना चाहेगा? ऐसे में आमदनी तो कम होगी ही। जीवन में सफलता के लिए आशा और उत्साह बनाए रखना बहुत जरूरी है।’ टैक्सी वाला जैसे सोते से जागा और बोला, ‘सर, आज आपने मेरी गलती का अहसास मुझे करा दिया।’

बात आई-गई हो गई। कुछ महीने बाद अचानक एक दिन उसी टैक्सीवाले ने मुझे बाजार में पहचान लिया और मुस्कराते हुए पूछा, ‘सरजी, कैसे हैं आप?’ मैंने कहा, ‘ठीक हूं भैया। पर मैंने तुम्हें पहचाना नहीं।’ इस पर वह बोला, ‘सर, मैं वही टैक्सी वाला हूं जिसे आपने उत्साह का पाठ पढ़ाया था। आज आपकी दी हुई शिक्षा के कारण ही मेरी तीन टैक्सियां किराए पर चल रही हैं और मेरा व्यवसाय खूब फल-फूल रहा है। परिवार में भी खुशहाली बढ़ी है। अब मैं भी हर उदास-मायूस व्यक्ति को मुस्कराते हुए काम करने की सलाह देता हूं।’

यह तो स्वाभाविक है कि जब आप अच्छा महसूस करते हैं तो मुस्कराते हैं। इससे अंदर की खुशी जाहिर होती है। यह बरकरार रहे, इसके लिए उत्साह का होना जरूरी है। अपना उद्धार स्वयं करें इसके लिए अपने आपको जानना व पहचानना है।

उत्साह हमारे ही अंदर है। उसे प्राप्त करने का तरीका है स्व को जानना, स्व का चिंतन-मनन करना। समस्याओं का चिंतन न करके उनके समाधान के तरीके अपनाने चाहिए। इंसान के जीवन में उत्साह है तो समस्याएं अपने आप हल हो जाती हैं। फिर वहां निराशा के लिए जगह नहीं रहती। कर्मप्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहिं सो तस फल चाखा। अर्थात समस्याएं हमने ही बनाई हैं और उसका फल भी हमें भुगतना है।

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