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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    P3- जुमलेबाज या निगहबान?

    By February 12, 2019 Current Issues No Comments12 Mins Read
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    गतांक से आगे…. 
    राहुल कुमार गुप्त 
    गरीब सवर्णों के आरक्षण के लिये यह फैसला एकाएक नहीं लिया गया। इसकी जरूरतों पर कई सालों से गौर किया जा रहा था किन्तु चुनावी वक्त पर इसे लागू कर मोदी सरकार खुद को सवर्णों की भी हितैषी साबित करना चाह रही है। मात्र छह दिन में इतना बड़ा विधेयक पारित कराकर लागू कर देना अपने आप में ऐतिहासिक है। यह केवल दृढ़ निश्चय, दूरदर्शी, देश के विकास व सही नियत की वजह से लागू हो सका। जो सभी धर्म के गरीबों की प्रतिभा के साथ उचित न्याय है। किन्तु आय की सीमा आठ लाख वो सामान्य व बैकवर्ड( क्रीमी लेयर) दोनों के लिये ज्यादा ही है। गरीबी के सही पैमाने के हिसाब से यदि आरक्षण दिया गया तो समाज को राष्ट्र को सही परिणाम प्राप्त हो सकेगा। खैर आय निर्धारित करने के लिये राज्यों पर छोड़ दिया गया है जोकि उचित ही है। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देकर वो पिछड़ों के लिये भी अच्छा साबित होना चाह रहे हैं।
    ओबीसी वर्ग में आरक्षण पर आरक्षण का एक दांव मोदी सरकार लाने जा रही है। इससे 500 से ज्यादा पिछड़ी जातियों को उचित न्याय मिल सकेगा। इसमें से तीन-चार पिछड़ी जातियां ही आरक्षण की मलाई खा रहीं थीं और अन्य सब आज भी अतिपिछड़े हैं। उन सबकी सुनवाई भी इस मोदी सरकार के दृढ़ इरादों के कारण पूरी होने वाली हैं। ओबीसी वर्ग में आरक्षण का बँटवारा बहुत पहले अन्य सरकारों को कर देना चाहिये था जिससे आरक्षण में संतुलन की सही स्थिति बनी होती, तो सामाजिक भेदभाव की खाईयां इतनी ज्यादा गहरी न होतीं।
    ओबीसी वर्ग में आरक्षण बँटवारे को गठित रोहिणी आयोग का कार्यकाल जरूर बढ़ा दिया गया है किन्तु इसे जल्द लागू करने पर मोदी सरकार विचार कर रही है। जो वास्तव में जरूरी भी है जिससे अन्य तमाम पिछड़ी जातियों को भी आरक्षण का लाभ मिल सके। तभी तो ‘सबका साथ सबका विकास’ का लक्ष्य पूरा होगा।
    लेकिन यह यहाँ पसंद किसे है? जातीयता के भेदों में गुँथे रहते हुए राष्ट्रीयता व मानवता को कमजोर रखेंगे तब तो अपने व अपने दलों व अपने परिवार के लिये सोच पायेंगे! ‘देश तो चल ही रहा है देश की कौन सोंचे’ इस विचार वाले यहाँ बहुतायत में हैं। और देश को स्थिरता, नैतिकता, ईमानदारी व विकास के पथ पर ले जाने वाला मात्र एक मजबूत कंधा मौजूद है। इसके बाद भारत के पास बेहतरीन नेतृत्व कब मिलेगा इसका जवाब शायद ही किसी के पास हो!
    अब आपस में सब बँटे और लोगों को बाँटने वाले लोग अब एकत्रित हो रहे हैं।
    एकत्रित होने की वजह देश को खतरे में बता रहे हैं। देश को कई पायदानों में मजबूती मिली, विभिन्न विदेशी और देशी सूचकांक इसका गवाह हैं। कुछ मामलों में सूचकांकों में गिरावट भी दर्ज हूई है जो कि हर साल कुछ ही अंकों के साथ घटते-बढ़ते रहते हैं।
    विश्व बैंक और आईएमएफ की रिपोर्टें भी कह रहीं हैं भारत मजबूती की ओर अग्रसर हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ भी सौर ऊर्जा पर बढ़ते भारत की बुलंदियों के लिये मोदी जी पुरस्कारों से नवाज रहा है। मोदी सरकार में जब भारत की चीन से ठन गयी तो चीन को कदम पीछे करने पड़े। यह रणनीतिक जीत थी मोदी सरकार की। बाकी की पूर्ववर्ती सरकारें मुँह साधे बैठे रहतीं थीं। चीन,  सिक्किम और अरूणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताकर चहल-पहल करता रहता था मजाल थी कोई कुछ कह पाता इन्हें! पर मोदी के दृढ़ निश्चय और ईमानदार प्रकृति के चलते चीन का हौव्वा भारत के अंदर से पहली बार शांत हुआ था। इन तमाम बातों का विश्लेषण देश की अवाम को स्वयं से करना होगा तभी देश को सही हाथों में सौंपा जा सकता है। देश को सही हाथों में सौंपने की चाभी हम सब आमजन के पास है जब हम जातिवाद, क्षेत्रवाद व धर्म से ऊपर उठेंगे तो हमारा देश व उसका गौरव हमें नज़र आना चाहिये। गठबंधन की सरकारों का क्या हश्र होता है जनता कई बार देख चुकी है केवल लूट-खसोट,  ब्लैकमेलिंग और खुलेआम भ्रष्टाचार दिखता है।
    सभी गैर राजग दल एकजुट होकर एक शख्स को हटाने के लिये जी जान लगाये हैं इसका मतलब कुछ तो बात होगी उस शख्स में-
    “उसे हिटलर बता जो डरा रहे वतन को।
    वो खुद सहमे हैं उसके नेक इरादों से।।
    कहीं ऐसा नियम न पारित कर दे वो।
    लगे ताला फिर स्वार्थ की दुकानों में।।”
    मैं फ़कत मोदी विरोधी रहा हूँ और बहुत कुछ मोदी के विरोध में लिखा भी छपा भी, सोशल मीडिया में भक्त नामक नयी प्रजातियों से खूब बहस और झड़पें भी हूईं। क्योंकि वो तर्क नहीं कुतर्कों से अपनी बातों को जबरन मनवाना चाहा करते हैं जोकि तार्किक लोगों की समझ से बाहर होता है। इनके अज्ञानी अतार्किक समर्थकों की वजह से भी मैं कभी भी मोदी को अपना नेता मानने से इंकार करता रहा। इन्हीं समर्थकों की वजह से बहुत से साधारण लोग भी इनसे दूर होते रहे। इन्हीं अतार्किक लोगों की सोशल मीडिया में भरमार से भी मोदी को प्रतिक्रिया स्वरूप जुमलेबाज का तमगा मिल गया। अपशब्दों और गालियों का प्रयोग सोशल मीडिया में पहले विशिष्ट था क्योंकि वो भक्त ही प्रयोग करते थे अब सामान्य हो गया क्योंकि अब सब प्रयोग करने लगे हैं।
    मोदी के लिये ये मेरे विचार हो सकते हैं तात्कालिक हों या भावावेश में लिखें हो किन्तु मैं जिस वृक्ष की शाखा हूँ उसकी जड़ें प्रखर समाजवादी हैं। और मैं दिल से सदा ही समाजवादी हूँ व रहूँगा। देश में मोदी के बाद अगले विकल्प के रूप में बहुत लोगों की जो चाहत है वो केजरीवाल जी, अखिलेश जी, मायावती जी, राहुल गाँधी जी या पूर्वोत्तर से कोई राष्ट्रवादी नेता की है। परंतु इन पर गठबंधन का बहुत ज्यादा बोझ न हो कि कोई उचित कार्य भी अपने मनमुताबिक न कर सकें।
    इस आलेख का लिख जाना मात्र एक इत्तेफाक ही हो सकता है क्योंकि इसे लिखने की प्रेरणा दिल्ली से बाँदा सफर के दौरान ट्रेन में मिली एक बच्ची से मिली। जो क्लास-7 की स्टूडेंट रही।
    जिसकी सरलता और निर्मल मन ने मुझे बहुत कुछ अलग सोचने पर विवश कर दिया। मैं अब तक पूर्वाग्रह से ग्रसित था हर बात में मोदी की बुराई ही निकालता था। बच्ची के दो सरल से शब्दों ने मेरे मन को कुछ देर तक शांत कर दिया। फिर यह आलेख लिखने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
    उसने अखबार पढ़ते हुए अपनी मम्मी से रोष भरे अंदाज में कहा, कि सब विरोधी दल मिलकर मोदी  को हटायेंगे, मतलब अकेले मोदी बुरा है और ये सब अच्छे ! अगर ये सब अच्छे होते तो अकेले भी तो जीत सकते थे ! जिन्हें खुद पर विश्वास नहीं वो देश का विश्वास क्या जीतेंगे? उसकी माँ ने कहा, बेटा, तभी तो महागठबंधन बना रहे हैं। फिर कई प्रश्न स्वतः मेरे मन में अंकुरित होने लगे।
    सभी विरोधी एक छत के नीचे आखिर कब तक अपनी एकता का गुणगान गायेंगे? आज जातीयता व क्षेत्रवाद के चलते महागठबंधन जरूर अपनी मजबूती पर है और मोदी सरकार को हटाने में सक्षम भी हो सकता है क्योंकि देश की जनता को मोदी सरकार से इतनी अपेक्षायें थीं जो सत्तर सालों की कमी को पूरा करने के लिये थीं। किन्तु फौरी तौर पर तो सबकुछ एकसाथ नहीं मिल सकता सब धीरे-धीरे व नियमबद्ध तरीकों से संभव है। पर जनता को इतना डिटेल में समझाने का कोई उचित तरीका अब बचा नहीं, क्योंकि सोशल मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया का सच कोई सुनना और जल्द मानना नहीं चाहता। इन्होंने जहाँ मोदी की छवि को विस्तार दिया है वहीं जुमलेबाजी की परछायी भी साथ दी है।
    हाँ! प्रिंट मीडिया की गरिमा अब भी बची हूई है। किन्तु विभिन्न अखबारों के हर पेज पलटाने का जनता के पास वक्त नहीं है।
    ऐसे में आज महागठबंधन ही प्रबल है। आज से पहले इसके लिये मैं जरूर खुश होता।
    लेकिन जब मैंने एक नये तरीके से सोचना शुरू किया तो मोदी सरकार में देश के प्रति बहुत से सकारात्मक पहलू नज़र आने लगे। मुझे लगता है अब्राहम लिंकन की कार्यशैली को मोदी सरकार भी अपना रही है लिंकन साहब का मानना था कि अगर उन्हें कुल्हाड़ी से पेड़ काटने के लिये छह घंटे दिये जायें तो वो चार घंटे कुल्हाड़ी को घिसने में ही निकालेंगे। मोदी सरकार के जो बहुत से काम अभी दिख नहीं रहे वो बिल्कुल उसी कुल्हाड़ी और पेड़ की तरह हैं। अभी तो कुल्हाड़ी पैनी हूई है जब पेड़ कटने यानि की अब कई बेहतरीन फैसलों को अंजाम देने की बारी शुरू हुई है।
    मासूमों से बलात्कार पर मृत्युदंड,  एससी-एसटी एक्ट को पुनः मंजूरी, नागरिकता बिल संशोधन, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग को संवैधानिक दर्जा, सभी धर्मों के गरीबों को दस फीसदी आरक्षण, जीएसटी, चीन का हव्वा खत्म कर उसकी सेना को कदम पीछे करने पर मजबूर करना, साक्षात्कार खत्म करना, भारतीय संस्कृतियों व परंपराओं को बढ़ावा देना, योग को विश्वव्यापी बना देना, आयुष्मान भारत, ओबीसी वर्ग में आरक्षण के बँटवारे का आगाज, विदेशों में अपनी मजबूत स्थिति को प्रदर्शित करना आदि ये बहुत से सकारात्मक पहलू हैं जो सही आत्म विश्लेषण करने को मजबूर करता है। शत-प्रतिशत दूध का धुला तो कोई नहीं हो सकता। लेकिन जो इन आदर्श प्रतिमानों के करीब हो वो अन्य से तो बेहतर है ही। रही राजनीति तो वो आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच ही पलती-पोषती हैं। इस सरकार में भी कुछ घोटालों व कुछ न्यायिक प्रक्रियाओं पर अंगुलियाँ उठी हैं। बहुत से सकारात्मक पहलुओं के साथ कुछ नकारात्मक बिन्दु अनायास ही लगे रहते हैं। प्रतिशतता यदि सकारात्मक कार्यों की ज्यादा है तो सकारात्मकता का ही प्रभाव ज्यादा दिखेगा। एक और सकारात्मक कार्य की पहल के लिये कटिबद्धता अगर सफल होती है तो यहाँ न्याय की उचित परिभाषा का मूर्त रूप भी दिखना शुरू हो जायेगा।
    यहां असल मायने में न्याय तब न्याय होगा जब समान नागरिक संहिता अनुच्छेद-44 पूरे देश में लागू होगी। इसकी मंथर गति से शुरूआत तो हूई जो तीव्र विरोध के कारण दब सी गयी। एक देश एक कर तो पारित हो गया अब एक देश एक न्याय भी पारित हो तो सामाजिक भेदभाव मिटे। जिस समता और अखण्डता और एकता का स्वप्न हमारे नीति निर्माताओं ने देखा था वो पूरा हो सके।
    लेकिन ऐसा साहस कौन सी सरकार जुटा पायेगी जवाब?  सबके पास होगा- मोदी सरकार! या कोई और?
    देश में अनुच्छेद-44 को मजबूती से लागू होने का सबकी तरह मुझे भी बेसब्री से इंतजार है। इसको मूर्त रूप देने में बहुत सी अड़चनें हैं क्योंकि राज्यसभा में ये कमजोर हैं और यह ऐसा विषय है जिसे विपक्ष कभी तव्वजो नहीं देगा क्योंकि यह विपक्ष के वोट बैंक से सीधा जुड़ा मामला है। वोटबैंक का सत्कार ही जबतक देश की प्रगति का पैमाना बना होगा तब तक यहाँ भेदभाव व सामाजिक विषमताओं की ज्वालायें निरंतर विकराल रूप धारण करती रहेंगी और एक वक्त ऐसा भी आयेगा जिस पर बहुत कुछ जलकर स्वाहा हो जायेगा।
    “मत बँटों अब किसी के स्वार्थ में।
    बस जिओ तुम देश के सम्मान में।।”
    देश में मोदी सरकार के जो सुधार कार्य लंबित हैं अगर उनका क्रियान्वयन होना भारत की तकदीर में है तो महागठबंधन रूपी ब्रह्मास्त्र को अप्रभावी होना पड़ेगा और दूसरे कार्यकाल में ही आम आदमी से युग पुरूष बने मोदी का असली चरित्र भी अवाम के समक्ष आ पायेगा।
    इन सकारात्मक पहलुओं के पहले मैं जो पूर्वानुमान लगा रहा था वो विपक्ष के समरूप ही रहा होगा, “वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो की तरह मोदी भी लोकतंत्र को कमजोर कर तानाशाही राह पर हैं, देश को उनसे खतरा है।” पर मदुरो की तानाशाही की वजह से वहाँ की अर्थव्यवस्था सहित कई व्यवस्थाओं का ग्राफ लगातार नीचे गिरता जा रहा था जबकि भारत के साथ ऐसा नहीं था। विश्वबैंक व आईएमएफ की रिपोर्टों के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत होती जा रही है। वर्ष 2019  में भारत ब्रिटेन को भी पीछे करके पाँचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है।
    ऐसे में मेरी मदुरो से मोदी की तुलना मेरी नकारात्मक सोच का ही हिस्सा थी। यह सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की सोच मेरे देश को सही नेतृत्व मिलने के लिये ही है। मुझे लगता है देश का नेतृत्व सही हाथों में देने के लिये ऐसा विश्लेषण करना सबके लिये ही अतिआवश्यक है। क्या सही? क्या गलत? अब इससे पर्दा दूसरे कार्यकाल से ही हट पायेगा। क्योंकि इतने विशाल जनसंख्या और विविधताओं वाले देश में में बड़े परिवर्तन लाने के लिये पाँच वर्ष का समय वाकई कम है और यह तब और कम पड़ता है जब लिंकन की मजबूत कार्यशैली पर सरकार कदम बढ़ा रही हो। परिवर्तन का शुरूआती दौर तो तकलीफों का जख़ीरा लाकर खड़ा कर देता है। यदि मोदी का दूसरा कार्यकाल देशहित व जनहितों को स्थायित्व प्रदान करता है तब भारतीय इतिहास भी उन्हें स्वतः स्वर्णिम अक्षरों में युग पुरूष स्वीकार कर लेगी।अन्यथा की स्थिति में इतिहास जुमलेबाज की उपाधि पे ही अपनी रबर स्टाम्प लगा देगा।
    इस सरकार में कई संस्थाओं में समय-समय पर मचती उथल-पुथल भी यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि कहीं मेरा पूर्वाग्रह ही तो सत्य नहीं है! ऐसा वैचारिक द्वंद्व मेरे साथ एक बड़े जनसमूह के साथ जरूर चल रहा है क्योंकि वजह  देश का अमन-चैन व सर्वांगीण विकास है। यहाँ विपक्ष का तथ्य भी मजबूत नज़र आने लगता है कि शायद विपक्ष ही सच न हो। क्योंकि जिस प्रकार से सत्य आँकड़े छिपाने और गलत प्रकाशित करवाने के आरोप भी लगते आये हैं अगर उनमें वास्तव में सच्चाई है तो ऐसी स्थिति स्वस्थ लोकतंत्र के लिये काल के समान है। ऐसे में भी मोदी जी की जो इमेज है वो जुमलेबाज के विशेषण को ही प्रभावी बनाती है।
    जो भी हो इन दोनों विशेषणों में क्या उपयुक्त है इसका फैसला दूसरे कार्यकाल से ही लगाया जा सकता है किन्तु जातिवाद व क्षेत्रवाद के इस महागठबंधन के चक्रव्यूह को भेद पाना आसान नहीं लग रहा। राष्ट्रवाद की आँधी भी अभी थमी सी नजर आ रही है शायद वो भी इसी विश्लेषण पर लगी है कि विश्व में ख्याति प्राप्त वो मोदी हैं क्या?-जुमलेबाज या निगहबान? (यह लेखक के अपने निजी विचार हैं) समाप्त 

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