P2- जुमलेबाज या निगहबान?

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गतांक से आगे…. 
राहुल गुप्ता 
भारत में भ्रष्टाचार का कैंसर तीसरे स्टेज में है जो कि खतरनाक स्थिति में है न कि अति खतरनाक स्थिति में। इसकी बेहतर चिकित्सा एक कुशल नेतृत्व में तब हो सकती है जब मरीज भी सहयोग करे।
किन्तु यहाँ सुधार से संबंधी कार्रवाई जब भी होती है हो हल्ला शुरू हो जाता है।
विमुद्रीकरण काला धन के लिये एक ब्रह्मास्त्र की तरह कार्य कर सकता था। किन्तु मुख्य नेतृत्व की नियति अच्छी होने के बावजूद वह ब्रह्मास्त्र भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया व कुछ की जान लेकर बहुतों को परेशानी दे गया। विपक्ष तो यहाँ तक कह रहा है कि यह भारत का अबतक का सबसे बड़ा घोटाला है।
आमजन व कुछ विशिष्टजन को छोड़कर इस भ्रष्टाचार के दलदल में सबने गोते लगाये। भारतीय जनता इस हकीकत से रूबरू हो चुकी थी। सबने काले को सफेद कर लिया। मिला कुछ नहीं।
इतना बड़ा देश, जनसंख्या, विविधताएं व इतने बड़े तंत्र में बहुत से प्रयोगों के बाद ही कोई बड़ा प्रयोग सफल हो सकता है। वो भी तब जब प्रशासन व कुछ हद तक जनता भी साथ दे।
जनता ने नोटबंदी के दौरान बाखूबी साथ दिया किन्तु जब उसे लगा सब सामर्थ्यवान बिना तनाव के काले को सफेद कर रहे हैं तब वो खुद को ठगे से महसूस करने लगे। यहाँ भी मोदी जुमलेबाज के रूप में मजबूत होते गये।
हाँ! नोटबंदी का निर्णय और अति ईमानदार अधिकारियों को विश्वास में लेकर और बेहतरीन और नूतन तकनीकियों की सहायता से थोड़ा व्यवस्थित होकर करते तो परिणाम कुछ और बेहतर होते।
यहाँ मोदीजी की ईमानदारी व देश के प्रति बेहतर नियत को हम झुठला नहीं सकते। किन्तु तमाम लोगों ने अपने पदों का दुरुपयोग करते हुए भी ब्लैक मनी को व्हाइट में चेंज किया है और चेंज करवाया है।
विदेशों में पड़ा कालाधन भी इसलिये केवल मुद्दा बनकर रह गया कि उसमें कई नेताओं-अभिनेताओं के साथ कई प्रशासक कई डाॅक्टर व इंजीनियर व न्यायपालिका के कई  दिग्गज व बहुत से उद्योगपति सम्मिलित हैं।
खैर मोदी जी द्वारा दिया गया चुनावी घोषणा का महत्वपूर्ण बिंदु “विदेशों से कालाधन आयेगा” पे कार्रवाई त्वरित तो नहीं है पर स्थगित भी नहीं है। इस घोषणा पर त्वरित कार्रवाई न होने से वो तमाम विरोधियों व अधिकांश लोगों में जुमलेबाज के रूप में प्रतिष्ठित हो गये।
हाँ! ये न्यायोचित तो नहीं है किन्तु  सत्ता में बने रहकर ही भारत के सर्वांगीण विकास के बारे में बारी-बारी से कदम उठाये जा सकते हैं। इसके लिये सत्ता में बने रहना भी जरूरी है। कैंसर की गाँठ यूं ही निकालकर नहीं फेंक दी जाती, उम्मीद है इस कालेधन का इलाज अगले कार्यकाल तक सबके सामने होगा। हो सकता है इसमें कुछ अपनों व कुछ खास विरोधियों को बचा दिया जाये। तो क्या? कुछ और बड़े लोग तो दबोचे में आ ही जायेंगे।
ट्रांसफर हो या घर बदलने कि प्रक्रिया, शुरुआती दौर में परेशानी तो उठानी ही पड़ती है भले उसके बाद राहत व चैन मिले।  स्वाभाविक है कि परिवर्तन होगा तो शुरुआती दौर में तकलीफ भी होगी। उस तकलीफ को झेलने के बाद ही अच्छे दिन के दर्शन होंगे। यह कार्यकाल तो शुरुआती दौर वाला परिवर्तन साबित हो रहा है जो तकलीफमय है और आगे सही इलाज, स्थायित्व अमन व चैन पाने के लिये ऐसे चिकित्सक का अनवरत साथ रहना व सलाह देना भी अनिवार्य है। सत्तर सालों को पाँच सालों से नहीं तौला जा सकता।
जीएसटी का लागू होना भी शुरुआती दौर में आफत बनकर आया किन्तु धीरे-धीरे यह आरामदायक साबित होने लगा। कर चोरी की संभावनायें कुछ हद तक कम हूईं।
पिछड़ों व मुस्लिमों की हिमायती बने विपक्षी दलों के साठ वर्षीय सरकारों ने इनके विकास में कोई आमूल-चूल परिवर्तन नहीं किया। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने का काम  123 वाँ संशोधन लाकर मोदी सरकार ने किया है। जो पिछड़ों के लिये सम्मान व उनके हक की बात है। आज के दौर में तीन तलाक एक सामाजिक बुराई से कम नहीं है। उस पर किसी सरकार ने ध्यान नहीं दिया क्योंकि वोट बैंक का मामला आड़े आ रहा था। लेकिन मुस्लिम महिलाओं के लिये सम्मानपूर्वक जिंदगी जीने के लिये इस पर रोक जरूरी थी। जो इस मोदी सरकार के कड़े निर्णय के कारण संभव हो पाया। भले ही अभी यह अध्यादेश के रूप में लागू है लेकिन राज्यसभा में बहुमत होते ही यह भी कानून में समाहित हो जायेगा। जब अन्य मुस्लिम देशों में तीन तलाक पर प्रतिबंध है तो भारत जैसे सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश पर क्यों नहीं? मोदी कई ऐसे मामलों में निगहबान की भूमिका में राष्ट्र को नजर आने लगे।
धर्म मानव के सम्मान, मानवीय अधिकारों व उनकी सुरक्षा के लिये होना चाहिये न की मानवीय जीवन को नारकीय बनाने के लिये।
इसी सरकार के द्वारा बहुत से निरर्थक कानूनों को तिलाञंजलि दे दी गयी।
बेटियों को संरक्षित वातावरण देने के लिये बलात्कार जैसे घृणित अपराधों में मृत्युदंड का प्रावधान कर दिया गया इससे पहले की सरकारों ने यह भी करना उचित न समझा था।
बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के पीछे पोर्न फिल्मे हैं जो सोशल मीडिया में धड़ल्ले से परोसी जाती हैं।
उन तमाम साईटों पर प्रतिबंध लगाने का कार्य भी मोदी सरकार ने कर दिखाया। बस अब प्रशासनिक स्तर के ईमानदारी की बारी है उसके सुधार का आगाज अगले कार्यकाल से हो सकता है।
भारत के स्वर्ग समझे जाने वाले पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर को जहन्नुम बनाकर छोड़ने वाली सरकारें अब पूर्वोत्तर के बेहतर विकास व अमन-चैन को लेकर खुद पे ग्लानि महसूस करती होंगी। कि वो भी पूर्वोत्तर को चाहते तो बेहतर बना सकते थे। वोट बैंक की राजनीति से उबरना पड़ेगा तभी देश खुशहाली की ओर अग्रसर होगा। यहाँ मोदी सरकार ने बेहतर कार्य किया जो यहां आज तक संभव नहीं था उसे मोदी के कार्यकाल में संभव कर दिया गया।
वहाँ के लोगों को अब लगने लगा वो भारत के ही अंग हैं भारत उनका ही है।
” लहू का ये रक्तिम वर्ण, रंग है प्रेम का,
सुन रहे हो स्वर यह धीमा-धुंधला,
एक दिन, एक दिन अवश्य ही,
कंपायमान होगा, यह धीमा स्वर!”
प्रसिद्ध मणिपुरी कवयित्री मेमचौबी देवी ने अपनी इस कविता के माध्यम से पूर्वोत्तरवासियों की आत्मा को ही शब्दों की माला में पिरो दिया।
कि कभी तो वो भारत की मुख्य धारा में सम्मिलित होंगे किन्तु पूर्ववर्ती सरकारों के ढुलमुल रवैये से उनकी आशायें निराशाओं में तब्दील हो रहीं थीं। मोदी के सत्ता संभालते ही पूर्वोत्तर में भी सुधार की प्रक्रियायें तीव्र गति से होने लगीं जिससे वहाँ के लोगों का जुड़ाव दिल से भारत के साथ होने लगा। त्रिपुरा व मेघालय से वर्षों से लगा अफ्सपा भी हटा लिया गया। अर्थात यहाँ के लोगों को मानवाधिकार, मूल अधिकार व नागरिकता के अधिकारों की स्वतंत्रता मिल गयी। कुछ यहां के और प्रदेश हैं जहाँ जल्द ही और सकारात्मक बदलाव दिखने को तत्पर हैं।
यह सात बहनों के प्रदेश का भौगोलिक हिस्सा तो लगभग डेढ़ प्रतिशत ही भारत से जुड़ा है शेष 98.5% हिस्सा तो चीन, बांग्लादेश, म्यांमार व भूटान से जुड़ा है ऐसे में यहाँ अवैध घुसपैठियों की संख्या भी अधिक है। बांग्लादेश में असुरक्षित महसूस कर रहे हिन्दू यहाँ घुसपैठ कर रोजी-रोटी चलाकर सुरक्षित तो महसूस कर रहे हैं। किन्तु बांग्लादेशी मुस्लिम व म्यांमार से आये रोहिंग्या मुस्लिम भी यहाँ भारी मात्रा में घुसपैठियों के तरीकों से रह रहे हैं। मुस्लिम तुष्टीकरण वाले दल भी पूर्वोत्तर के लोगों व वहां की संस्कृति को बढ़ावा देने के बजाय इस फिराक में हैं कि कैसे उनका वोट बैंक बढ़ जाये। और भाजपा भी नागरिकता बिल में संशोधन करके विपक्ष को करारी मात देना चाहती है। विपक्षियों को यह डर सता रहा है कि यहां कई वर्षों से रह रहे बांग्लादेशी गैर मुस्लिमों को नागरिकता का अधिकार देकर बीजेपी अपना वोट बैंक पूर्वोत्तर के साथ पश्चिम बंगाल में भी बढ़ा लेगी।
बस पूर्वोत्तर में इस नागरिकता बिल को लेकर विरोध शुरू है। लेकिन उन असुरक्षित हिन्दुओं को यदि यह भारत नहीं अपनायेगा तो कौन अपनायेगा? रही बात घुसपैठिये मुस्लिमों की तो उनकी स्थिति बांग्लादेश में असुरक्षा की नहीं है। बस यहां की मुस्लिम तुष्टीकरण की सरकारों के चलते ही वो यहाँ बसते चले आये हैं। जिससे पूर्वोत्तर के मूल लोगों को अपना हक बँटता दिखायी दे रहा है। नागरिकता बिल पर यह विरोध अभी अस्थायी ही यहां के लोगों की, संस्कृति की, उनके आवास और अवसर की समानता को आगे रखते हुए नागरिकता बिल पारित होने के बाद इसके दूरगामी परिणाम पूर्वोत्तर के हित के साथ भारत के भी हित में ही होंगे।
हाँ! जहन्नुम सा बन चुके धरती के जन्नत जम्मू-कश्मीर के हालात अभी बहुत सही तो नहीं हो सके, किन्तु आतंकी गतिविधियों में कमी आयी है व कई आतंकियों के साथ उन्हीं की भाषा में उन्हें समझाया जाने लगा है। पत्थरबाजी की घटनाओं में फायरिंग का आदेश न देना यह सरकार की सही समझ-बूझ का नतीजा है। क्योंकि यह सरकार मानती है कि यह पत्थरबाज भारत के ही अपने हैं जो कि पूर्ववर्ती सरकारों के इस क्षेत्र की अनदेखी से पनपे हैं।
भारत बहुत बड़ा देश है बहुत सी समस्याओं से ओत-प्रोत भी है। यह समस्यायें कई जगह वोट बैंक के लिये जानबूझकर बढ़ाई भी गयीं हैं और गढ़ी भी गयी हैं। इन समस्याओं का निदान करने निकला वो अकेला है, जनता के साथ सदैव अभिवादन की मुद्रा में रहने वाला वो युग परिवर्तक काश! दो-चार और होते तो सार्थक परिणाम कुछ और ज्यादा होते। वीआईपी कल्चर खत्म! साक्षात्कार खत्म!
भारत के योग का विश्व में डंका!
सऊदी अरब में मंदिर!
छोटे देशों का एफडीआई में बढ़ता निवेश! कई धातुओं, खनिज, कृषि उत्पादों व सौर ऊर्जा में भी नित नये आयाम स्थापित कर रहे भारत हकीकत में शांति व विकास की राह में अग्रसर हो रहा है।
जब बड़े परिवर्तन व निर्णय (नोटबंदी व जीएसटी) लिये जायेंगे तो फौरी तौर पर जीडीपी कमतर तो होगी ही लेकिन जल्द ही उसमें सुधार आ जाना यह साबित करता है कि मोदी सरकार द्वारा उठाये गये कदम मील का पत्थर साबित होंगे।
कमियां इंसानों की प्रकृति में हैं किन्तु जो कमियों को कम कर सके वो ही आत्मनियंत्रक होता है। यह भारत का सौभाग्य है कि उसे एक नेता (नेतृत्व करने की क्षमता, निर्णय लेने की क्षमता) मिला। जो वोट बैंक को गौण मानते हुए भारत को स्थायी मजबूती देने की दिशा में कार्य कर रहा है। ऐसे कई कार्यों का सोशल मीडिया में मजाक भी बनाया जाता है।
काश! उन सबमें दूरदर्शिता होती तो ऐसा करने से वो बाज आते किन्तु सबमें दूरदर्शिता होती कहाँ है?
क्या भारत में बन चुकी बड़ी सामाजिक खाईयों को पाटा जा सकता है? सामान्यतः जिस उत्तर की आशा सबको है वो यही की असंभव है इन खाईयों को पाटना!
ऐसे में “सबका साथ सबका विकास” का  मूलमंत्र साथ लेकर कोई बहुत हिम्मत वाला ईमानदार व सत्ता से ज्यादा राष्ट्रहित को चाहने वाला ही चल सकता है।
बाकी कई दल तो वोट बैंक की जातियों तक खुद को निर्भर किये हैं। सपा और राजद का नाम आते ही लोगों के दिमाग में स्वतः यादव और मुस्लिम छवि उभर कर आ जाती है। बसपा का नाम आते ही एससी जाति के कुछ वर्ग ही नजर के सामने आते हैं। प्रारंभिक दौर में कांग्रेस सभी वर्गों की पार्टी थी किन्तु वक्त के साथ-साथ अगड़े इससे जुदा होते गये फिर कई प्रदेशों में पिछड़ों व दलितों का मोह भी कांग्रेस से कम हो गया। कई प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस के वोट बैंक पर अपना एकाधिकार जमा लिया।
मोदी सरकार ने जब देखा एससी-एसटी एक्ट की जरूरत आज भी है तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलकर उसे बहाल कर दिया किन्तु उससे अन्य का नाराज होना स्वाभाविक था जिसके चलते मुख्यतः तीन राज्यों में अपने पार्टी की सरकार गँवानी पड़ी।
जारी….(यह लेखक के अपने निजी विचार हैं)

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