कहाँ से चलकर आयी है जानकार हैरान रह जायेंगे
लीची का नाम सुनते ही जहां मुंह में रसभरे स्वाद का एहसास भर जाता है, वहीं मुजफ्फरपुर का नाम भी जेहन में कौंध जाता है. कहने को तो मुजफ्फरपुर की लीची बहुत मशहूर है, लेकिन पहले-पहल भारत में यह चीन से आया था.
जिस रसीले, खुशबूदार फल को हम लीची कहकर पुचकारते हैं, वह वास्तव में सदियों पहले चीन से यहां पहुंचा है मशहूर बौद्ध तीर्थयात्री ह्वेनसांग के साथ, जो कई बरस नालंदा विश्वविद्यालय में छात्र रहे थे. माना जाता रहा है कि सबसे बढ़िया किस्म की लीची बिहार में मुजफ्फरपुर के बागानों की सौगात है. इनका कंटीला छिलका आसानी से उतारा जा सकता है और भीतर वाली गुठली भी बहुत पतली- नाम मात्र की ही होती है. सुगंध और मिठास के तो कहने ही क्या!
जहां फौंसेका नामक एक एंग्लो-इंडियन साहब के बाग थे. उनका दावा था कि चूंकि उनके पेड़ों के बीज मुजफ्फरपुर से लाये गये थे और फल की गुणवत्ता बरकरार रखने के लिए कलम भी वहीं के कुशल बागबान लगाते थे, अतः इस बाग की पैदावार को कमतर नहीं आंका जाना चाहिए. सबसे महंगी और लोकप्रिय प्रजाति गुलाबजल की याद दिलाती ‘रोज लीची’ थी.
लीची का मौसम चेरी, शहतूत और जामुन-फालसे की तरह बहुत छोटा होता है, अतः इसका आनंद लेने की मोहलत दो-चार घड़ी होती है. याद रहे, ‘उम्र छोटी ही सही यह उम्र बड़ी होती है!’ शुरू में हर फल महंगा होता है और पहले-पहल बाजार में पहुंचने वाला फल स्वादिष्ट भी अधिक नहीं होता. अतः और भी ज्यादा सतर्क रहने की दरकार होती है.
लीची के अधिकांश शौकीन टिन में बंद पहले से छिली, गुठली निकाली हुई लीची से संतुष्ट हो लेते हैं. पर ढेरों ठंडी की लिची को खुद छीलकर निबटाने का मजा ही कुछ और है. नयी पीढ़ी लीची के शरबत, आइस्क्रीम आदि से ही परिचित है. चीन में भोजनोपरांत अवश्य लीची को वनीला आइस्क्रीम के साथ परोसने का रिवाज है.







