राहुल कुमार गुप्त
- यूपी के मिर्जापुर जिले में महिला किसानों पर बर्बतापूर्वक लाठीचार्ज, खड़ी फसलों को दैत्याकार मशीनों ने तहस-नहस किया
- रेलवे चौड़ीकरण के लिये खाली करा रहे थे भूमि, केवल कुछ दिन शेष थे फसलों को पकने में, बस फसल पकने की माँग कर रहे थे वहाँ के किसान
राजनीति और संविधान से संबंधित किताबों में देश की व प्रदेश की सरकारों के लोकतांत्रिक होने का वर्णन है, सच में ! पढ़कर अच्छा लगता है। ए.सी. रूम में लेटे हुए हर लुफ्त उठाते हुए लगता है सब कुछ तो अच्छा ही है पूरे देश में। हाँ ! कुछ यही मेंटेल्टी वाले लगभग 10% लोग देश की 90% आबादी पर शासन करते हैं। ये शासन करने वाले लोग जरूर बदलते हैं पर उन्हें मालूम होता है कि पुनः सत्ता में आयेंगे, भले पाँच, दस या पंद्रह साल बाद। किन्तु सबकी कार्यशैली लगभग एक सी ही रहती है। क्या केवल वोट देना और चुनाव होना होना मात्र ही वास्तविक लोकतंत्र है? या लोकतंत्र की एक विस्तृत परिभाषा भी है। सरकार को समय-समय पर लोकतंत्र की अधिकारिक परिभाषा से यहाँ की जनता को आत्मसात कराना चाहिये, जनता के अधिकारों को भी सरकारों को ही समय-समय पर बताते रहना चाहिये। ताकि नौकरशाही और यहाँ का लोकतांत्रिक शासन लालफीताशाही में तब्दील होने से बचता रहे, तानाशाही में तब्दील होने से बचता रहे।
देश भर में आये दिन आम लोगों के साथ लोकतांत्रिक रवैया की जगह तानाशाही का इस्तेमाल आम बात है। नौकरशाही ज्यादातर प्रधान है और इस नौकरशाही के आगे लोकतंत्र नतमस्तक नजर आता है। यह नौकरशाही भी नेताशाही के आगे नतमस्तक है ! तो देश में वास्तविक रूप से या व्यवहारिक रूप से कौन सी …शाही प्रचलन में है? यह यहाँ की जनता को भी गौर करना चाहिये। अगर यहाँ सुरक्षित रहना है तो अपने अधिकारों के खिलाफ आवाज मत उठाओ। हाँ! कुछ साहसी लोग बहुत कुछ खोकर और सहकर कभी-कभार न्यायालय से न्याय हासिल कर लेते हैं किन्तु सभी में न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की भी हिम्मत नहीं होती।

जहाँ कई बार बात करने मात्र से बात बन सकती है वहाँ भी सत्ता के मद में दमनकारी नीतियों का ही प्रयोग किया जाता रहा और किया जाता है। बहुत से वाजिब अनशन और आंदोलनों को ऐसी दमनकारी और मानसिक प्रताड़ना वाली नीतियों से दबा दिया जाता है। यूपी में शिक्षामित्रों के साथ, होमगार्डों के साथ, बेरोजगारों के साथ और किसानों और कई व्यक्तिगत लोगों के साथ तो यह सब होता चला आ रहा है। अन्य प्रदेशों में भी कुछ-कुछ ऐसी ही दशा और दिशा है। वो चाहे मध्य प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकार द्वारा किसानों पर गोली चलवाने का मामला हो या फिर अन्य और कई मामले जो केवल दमनकारी और तानाशाही नीतियों को ही उजागर करते हैं।
न्याय की प्रक्रिया व उसकी दर कई मामलों में इतनी मंद है कि लोग इसकी मंद प्रक्रिया से ही हताश हो जाते हैं और अपने अधिकारों का हनन होने देते हैं तथा हर गलत को सहने के लिये मजबूर हो जाते हैं।
अभी हाल ही का प्रकरण उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले का है।
यहाँ के अदलहाट इलाके के कुंडाडीह जादवपुर में रेलभूमि पर कब्जा करने के लिए किसानों की खड़ी फसल को दैत्याकार मशीनों से रौंद दिया गया। जिस फसल को उगाने के लिये किसानों ने अपने बच्चों से भी ज्यादा परवरिश की हो उसे अपने आँखों के सामने भला कौन नष्ट होते देख सकता है? अपनी उन्हीं खड़ी फसलों को बचाने के लिए मशीनों के समक्ष लेटकर विरोध कर रहे किसानों पर जमकर लाठियों का और कठोर शब्दों का प्रहार हुआ तथा महिला किसानों पर महिला पुलिसकर्मियों ने बल का प्रयोग किया।
रविवार को हावड़ा-नई दिल्ली के बीच रेलव डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर निर्माण कर रही कार्यदायी संस्था ने खड़ी फसल को रौंद कर अधिग्रहीत जमीन पर कब्जा किया। भारी संख्या में मौजूद किसानों ने जेसीबी व पोकलैंड के सामने लेटकर विरोध करने लगे। पुलिस के बर्बर लाठीचार्ज के चलते महिलाओं सहित कई किसान घायल हो गए।
कुंडाडीह, जादवपुर गांव के किसानों की जमीन रेलवे चौड़ीकरण में गई है, जिसमें बहुत से किसान मुआवजा प्राप्त कर चुके हैं जबकि कुछ किसानों को मुआवजा अभी तक नहीं मिला है। किसानों की मांग थी कि खड़ी फसल को न रौंदा जाए और निर्माण कार्य जमीन नाप का काम फसल कटने के बाद किया जाए।

किसानों ने इस संबंध में लगातार प्रशासन से माँग की लेकिन किसानों की एक न सुनी गयी। जैसे ही प्रशासन ने किसानों की फसलों को मशीनों से रौंदना शुरू किया तो गांव की किसान महिलाएं जेसीबी और पोकलैंड के सामने आकर लेट गईं। वह अपनी फसलों को बचाने की गुहार लगाते रहे लेकिन प्रशासन के कान में जूँ तक नहीं रेंगी। ऊपर से इनके ऊपर बर्बतापूर्वक कार्रवाई की गयी।
जिस पर विपक्ष के नेताओं को भी मुद्दा मिल गया और सरकार के विरोध में विपक्षी नेताओं के ट्वीट आने लगे। किन्तु जब ये खुद सरकार में होते हैं तब इन्हें भी आम समस्यायें या जन भावनायें नज़र क्यूँ नहीं आतीं। जब आंदोलन उग्र हो और गैर वाजिब माँगें हों तब तो ठीक है सरकार हल्का बल प्रयोग कर कानून का शासन स्थापित कर सकती है किन्तु वाजिब माँगों, न्याय की माँग और अपने अधिकारों की माँग को भी बलपूर्वक और बर्बतापूर्वक दबाना कहाँ तक न्यायोचित है? क्या हम सचमुच व्यवहारिक रूप से लोकतांत्रिक देश के निवासी हैं या मात्र लिखित रूप से लोकतांत्रिक देश के निवासी हैं!







