क्या कोई जान पाया, कर्म फल का रहस्य क्या है ?

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‘अच्छे कर्म का सुफल और बुरे कर्म का कुफल। कहा गया है कि जैसा बोओगे, वैसा काटोगे। कर्मफल का निर्धारण किस प्रकार होता है, यह जानना मानव मस्तिष्क के लिए कठिन है, क्योंकि उसकी क्षमताएं सीमित हैं। न तो मानव और न उसका बनाया हुआ यंत्र इस रहस्य को जान सकता है।’

मनुष्य जब थक जाता है तो वह भाग्य अथवा नियति को यह कहकर दोष देता है कि यह प्रारब्ध था, होनी को कौन टाल सकता है। इस प्रकार की लोकोक्तियां बहुत पहले से प्रचलित हैं। प्रकृति ने मनुष्य को स्मृति के रूप में विलक्षण शक्ति दी है, जहां रोज के कर्म दर्ज होते रहते हैं। हमारे अपने व्यवहार और दूसरों द्वारा किए गए व्यवहार का हिसाब-किताब स्मृति में दर्ज होता रहता है। सुख-दुख, हर्ष-विषाद, मान-अपमान, यश-अपयश, द्वेष-विद्वेष, हास-परिहास, छल-कपट, संसार की सभी क्रियाओं का विवरण स्मृति में अंकित होता रहता है। यही भाग्य का लेखा-जोखा कहलाता है, जिसे कर्म का सिद्धांत भी कहते हैं।

अच्छे कर्म का सुफल और बुरे कर्म का कुफल। कहा गया है कि जैसा बोओगे, वैसा काटोगे। कर्मफल का निर्धारण किस प्रकार होता है, यह जानना मानव मस्तिष्क के लिए कठिन है, क्योंकि उसकी क्षमताएं सीमित हैं। न तो मानव और न उसका बनाया हुआ यंत्र इस रहस्य को जान सकता है। इसके लिए किसी पराशक्ति की परिकल्पना की गई है। सारी वैज्ञानिक उपलब्धियां इस पराशक्ति के सम्मुख परास्त हैं। तभी तो मनुष्य भाग्य, नियति, प्रारब्ध का नाम लेता है जो किसी एक जन्म का नहीं, अनेक जन्मों का गणित है। सृष्टि का सारा काम यंत्रवत चलता है। असंख्य प्राणियों के जन्म, नाम, रूप-रंग, स्वभाव, क्रिया-कलाप, उपलब्धियां आदि इन सब विवरणों को तथ्यों पर आधारित और प्रामाणिक तौर पर रख पाने की क्षमता मानव निर्मित कम्प्यूटर द्वारा संभव नहीं है।

इस संसार को कर्मभूमि कहा गया है, जहां पर किया गया प्रत्येक सुकृत्य या कुकृत्य अनंतकाल तक मनुष्य की मूल चेतना को सुख या दुख देता रहता है। इसी कारण धर्म और दर्शन इस बात पर जोर देते आए हैं कि जीव सत्कर्म, सत्संग, सन्मार्ग, संस्कार से अपने दुर्लभ मानव जीवन को तराशता रहे, सही दिशा में ले जाए। कारण कर्म करने के लिये मानव स्वतंत्र है किंतु प्रतिफल भोगने से मुक्त नहीं हो सकता। कर्म का भोग और भोग का कर्म जीव की यही नियति रही है। यदि ऐसा न होता तो क्या कारण है कि सृष्टि के इतने विशाल प्रांगण में एक ही घड़ी पल नक्षत्र में जन्मे हजारों प्राणियों में रंग, रूप, ऐश्वर्य, वैभव जैसी स्थितियां भिन्न-भिन्न पाई जाती हैं।

कोई तो सोने की चम्मच के साथ जन्म लेता है और किसी को एक चम्मच दूध भी नसीब नहीं होता। ईश्वर तो ऐसा अन्याय कर नहीं सकता, उसके लिए तो सारे प्राणी प्रिय हैं। हमारे अपने कर्म ही नियति, प्रारब्ध या भाग्य का निर्धारण करते हैं। कर्म फल की किसी प्रकार की अपेक्षा के बिना स्वाभाविक कर्म करते रहना चाहिए। कहा गया है कि जीवन में जो घट रहा है वह प्रारब्ध अथवा भाग्य है और वह पूर्व कर्मों का संचित फल है।