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    Home»ब्लॉग

    क्या बंगाल में दीदी जाने वाली हैं?

    ShagunBy ShagunMay 15, 2025 ब्लॉग No Comments7 Mins Read
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    पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में हालिया हिंसा ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सुती, समसेरगंज, धुलियान और जंगीपुर में अप्रैल 2025 से शुरू हुई हिंसा में तीन लोगों की मौत और कई घायल होने की खबर है। इंटरनेट सेवाएं ठप, दुकानें बंद, और बीएनएसएस की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू है। इस बीच, राज्यपाल सी.वी. आनंद बोस ने गृह मंत्रालय को सौंपी अपनी रिपोर्ट में संवैधानिक संकट का हवाला देते हुए अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) की संभावना जताई है।

    अशोक भाटिया

    जब लोकतंत्र के चौराहे पर धुएं की लकीरें उठने लगें और सन्नाटा बाजारों में पसरे, तो समझिए कि कहीं कुछ बहुत गलत घट रहा है। पश्चिम बंगाल में तनाव और मुर्शिदाबाद हिंसा पर राज्यपाल द्वारा गृह मंत्रालय को सौंपी गई रिपोर्ट में राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) की संभावना की चर्चा है। आपको तो मालूम है कि पश्चिम बंगाल का मुर्शिदाबाद जिला इन दिनों ऐसी ही बेचैनी से गुज़र रहा है। सुती, समसेरगंज, धुलियान और जंगीपुर की गलियों में खामोशी है, लेकिन ये खामोशी सिर्फ सन्नाटा नहीं, एक गहरे तनाव की आहट है।

    शुक्रवार (11 अप्रैल) से शुरू हुई हिंसा में अब तक तीन लोगों की जान जा चुकी है, और कई घायल हैं। इंटरनेट ठप है, दुकानें बंद हैं, और सुरक्षाबल हर मोड़ पर तैनात हैं। इलाके में बीएनएसएस की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू है- पर क्या सिर्फ बंदूकों और बैरिकेड्स से भरोसे की बहाली हो सकती है? यह सिर्फ एक हिंसक घटना नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति, कानून-व्यवस्था और संवैधानिक मर्यादाओं के बीच जारी रस्साकशी की एक और कड़ी बनती जा रही है। बंगाल में हिंसा नई बात नहीं। कभी महिलाओं को सरे आम सड़क पर पीटा जाता है। तो कहीं पंचायत के कुछ लोग ‘कंगारू कचहरी’ लगातर इंसाफ करते है। लॉ एंड ऑर्डर पर लगातार उठ रहे सवालों के बीच राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होने की अटकलें लग रही हैं।

    बीजेपी बंगाल में राष्ट्रपति शासन की मांग कर रही है। राज्यपाल सीवी आनंद बोस दिल्ली आकर रिपोर्ट दे चुके हैं। बोस ने महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अलावा देश के गृहमंत्री अमित शाह से भी मुलाकात की है इसके बाद चर्चा तेज हो गई कि पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लग सकता है। कांग्रेस, टीएमसी या अन्य किसी विपक्षी दल शासित राज्य में बलात्कार की वारदात हो तो बीजेपी के नेता सुबह शाम उस प्रदेश को मुख्यमंत्री को कोसते हुए इस्तीफा मांगने लगते हैं। ठीक उसी तरह जब बीजेपी शासित राज्य में बलात्कार की कोई घटना होती हो तो उसी तर्ज पर विपक्ष उस मामले को इश्यू बनाकर एकजुट हो जाता है। ऐसे में इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सभी दलों के नेता अपने अपने राज्यों में हुई हैवानियत पर सियासी नफे नुकसान के हिसाब से चुप्पी साध लेते हैं। मानवीय दृष्टी से देखा जाय तो बलात्कार किसी महिला के सीने पर लगा वो जख्म होता है, जो कभी नहीं भरता । जिस कोख से बच्चा जन्म लेता है जब उससे हैवानियत होती है तो सिर्फ मानवता ही शर्मसार नहीं होती, पुरुषों की कथित समाज की ठेकेदारी पर भी सवाल उठते हैं। धरने-प्रदर्शन होते हैं। कैंडल मार्च निकलता है। आरोप लगते हैं। इस्तीफा मांगा जाता है। प्रशासन सतर्क, पुलिस मुस्तैद और जनता भी जागरूक दिखती है पर वो चुल्लूभर पानी कहीं नहीं दिखता जिसमें ऐसा महापाप करने वाले डूब मरते ।

    कोलकाता की डॉक्टर से हुई हैवानियत का मामला इतना तूल पकड़ लेगा और उसके परिवार को इंसाफ दिलाने की लड़ाई दावानल का रूप ले लेगी। ये तो किसी ने सोचा भी न होगा। वरना 2012 के निर्भया कांड से लेकर 2024 के कोलकाता की डॉक्टर बेटी ‘अभया’ के साथ हुई दरिंदगी के बाद देश की संवेदनाएं जागने में 12 साल नहीं लगते । ‘निर्भया’ और ‘अभया’ के मामलों के बीच के 12 सालों में देश में हजारों बलात्कार हुए। लेकिन उन लड़कियों और महिलाओं को इंसाफ दिलाने के लिए ऐसा आंदोलन क्यों नहीं हुआ, इसका जवाब भी समाज और सरकार दोनों को देना होगा। बीजेपी कह रही है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की टिप्पणी इस मुद्दे की गंभीरता को दर्शाती है। अब समय आ गया है कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर ऐसे मामलों में न्याय सुनिश्चित किया जाए।

    बीजेपी का ये रिएक्शन राष्ट्रपति मुर्मू द्वारा न्यूज़ एजेंसी ‘पीटीआई’ के लिए लिखे गए एक विशेष हस्ताक्षरित लेख के बाद आई। जिसमें उन्होंने कोलकाता में डॉक्टर के बलात्कार और हत्या पर बात की और महिलाओं के खिलाफ जारी अपराधों पर अपनी पीड़ा व्यक्त की । बीजेपी नेताओं का कहना है कि ममता बनर्जी इस मुद्दे को लेकर भयभीत दिख रही हैं। इसलिए लगातार बीजेपी शासित राज्यों के खिलाफ ‘आग’ उगलते हुए बहुत कुछ जल जाने की धमकी दे रही है। वहीं राष्ट्रपति की राय पब्लिक डोमेन में आने के बाद अटकलें लग रही है कि क्या ममता दीदी की कुर्सी छीन ली जाएगी और उनकी सत्ता जाने वाली है?

    यह सबसे बड़ा सवाल दिल्ली से लेकर बंगाल तक हर किसी के दिमाग में तेजी से घूम रहा है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर आक्रोश जाहिर करने के साथ ही इस पर अंकुश लगाने का आह्वान करते हुए कहा कि “बस ! बहुत हो चुका। अब वो समय आ गया है कि भारत ऐसी ‘विकृतियों’ के प्रति जागरूक हो और उस मानसिकता का मुकाबला करे जो महिलाओं को ‘कम शक्तिशाली’, ‘कम सक्षम’ और ‘कम बुद्धिमान’ के रूप में देखती है।’ राष्ट्रपति देश की प्रथम नागरिक हैं। भारत की सेना की सर्वोच्च कमांडर हैं। वो एक महिला हैं। देश की हर बेटी उनमें अपनी मां की छवि देखती है। ऐसे में कोलकाता कांड पर राष्ट्रपति के बयान से मामले की गंभीरता और गहराई को समझा जा सकता है।

    एक दशक से अधिक समय से विपक्ष में बैठी कांग्रेस के नेता बीते 10 सालों से ये कहते नहीं थक रहे हैं कि पार्टी प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ भी नया नहीं किया। देश में जो कुछ हुआ कांग्रेस ने किया। नेहरू-गांधी परिवार ने किया। उनकी नीतियों ने किया। मोदी जो कर रहे हैं वो कांग्रेस का विजन था । उसका सपना कांग्रेस नेताओं ने देखा था।

    इसके बाद बीजेपी नेता अपनी सरकार कामकाज गिनाते हुए कांग्रेस के आरोपों का काउंटर करते हैं। अब समझने की बात ये है कि कांग्रेस ने भारत में अपने लंबे शासन काल में कई राज्य सरकारों को राष्ट्रपति शासन लगाकर बर्खास्त किया था। अब कांग्रेस नेताओं की उस बात पर गौर करें जिसमें वो कहते हैं कि बीजेपी और मोदी, कांग्रेस के कामों को कॉपी-पेस्ट कर रहे हैं। तो क्या बीजेपी, अब बंगाल का किला ढहाने के लिए उसी अस्त्र का इस्तेमाल तो नहीं करने जा रही, जिससे कांग्रेस पार्टी की पूर्ववर्ती केंद्र सरकारों ने कई राज्यों में विपक्ष की सरकारों को वहां की कानून व्यवस्था संभालने के नाम पर गिरा दिया था। शायद यही डर ‘दीदी’ यानी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लगने लगा होगा कि जिस तरह बीजेपी नेता, टीएमसी की सरकार को गिराने की बात कर रहे हैं। उनका इस्तीफा मांग रहे हैं, ऐसे में महिला राष्ट्रपति की राय को आधार बनाकर कहीं केंद्र की सरकार आर्टिकल 356 का इस्तेमाल करके उनकी सरकार तो नहीं गिरा देगी।

    क्या कहता है विश्लेषण:

    मुर्शिदाबाद हिंसा और ‘अभया’ कांड जैसे मामलों ने बंगाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया है। बीजेपी का राष्ट्रपति शासन की मांग करना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है, क्योंकि 2026 में बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं। हालांकि, राष्ट्रपति शासन लागू करने के लिए ठोस आधार और संसदीय मंजूरी जरूरी है, और सुप्रीम कोर्ट इसकी वैधता की समीक्षा कर सकता है। ममता बनर्जी की लोकप्रियता और टीएमसी का मजबूत जनाधार केंद्र के लिए चुनौती पेश करता है।

    राष्ट्रपति शासन की संभावना फिलहाल अटकलों तक सीमित है, लेकिन मुर्शिदाबाद की घटनाएं और केंद्र-राज्य तनाव इसे गंभीर बना रहे हैं। यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मसला नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थों का मामला है। क्या ममता सरकार इस संकट से उबर पाएगी, या केंद्र अनुच्छेद 356 का सहारा लेगा, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।

    Shagun

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