आपकी बात आपके विचार: जी के चक्रवर्ती
आज हमारे समाज के लोगों की इस्थिती वहां पहुँच गयी है जहाँ से खड़े हो कर देखने से यह पता चलता है कि हम मनुष्यों का अधिक विकसित होना भी मनुष्यता के लिये खतरनाक सिद्ध हो रहा है। आज हमारे देश में कानून है कानून के रक्षक भी हैं इस इस तरह की एक व्यवस्था समाज के अंदर विकसित हो गयी है कि किसी के चाहने मानने या न मानने से कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि हमें इस सिस्टम में जिन्दा रहना है न चाह कर भी हम वह काम कतई नहीं कर सकते हैं जिससे समाज का कोई दूसरा व्यक्ति प्रभावित या उसके हित को आघात पहुँचता हो। कहने का अर्थ यह है कि कभी- कभी हम इंसानो द्वारा समाज को व्यवस्थित रूप से चलने के लिये बनाये गये नियम कानून खुद हम मनुष्यों पर ही भारी पड़ने लगता है।
आज हम इंसानो का समाज उसी मोड़ पर पहुँच कर मानवता को पुकार रही है कि तुम्हारे द्वारा बनाये गये नियम कानून अत्याधिक कठोर व खुद तुम्हारे लिये ही प्राण घातक सिद्ध हो रही है। अभी -अभी निर्भया मामले में चारो अभियुक्तों की हुई मौत की सजा पर इंसानो की इंसानियत को झकझोर कर यह पूंछ रही है कि ऐसी क़ानूनी व्यवस्था क्या इंसानी सभ्यता के लिये एक बर्बरता पूर्ण दण्ड जैसा घातक सिद्ध नहीं हो रहा है? इसलिये आज संयुक्त राष्ट्र ने दुनियां के सभी देशों से मौत की सजा को रोकने या इस पर प्रतिबंध लगाने की अपील की है। हमारे देश में निर्भया मामले के चार दोषियों को तिहाड़ जेल में फांसी पर लटकाए जाने के ठीक एक दिन बाद यह अपील की गई है।
इन चारों को हुई फांसी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए संयुक्त राष्ट्र के महासचिव “एंटोनियो गुटेरस” के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक ने यह कहा कि वैश्विक संगठन सभी देशों से फँसी की सजा पर प्रतिबंध लगाने की अपील करता है। दुजारिक ने एक नियमित संवाददाता सम्मेलन में शुक्रवार के दिन यह कहा कि इस विषय पर हमारा नजरिया बहुत स्पष्ट है। हम सभी राष्ट्रों से मौत की सजा के प्रावधान पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाने का आह्वान करते हैं। भारत में 16 दिसंबर, 2012 के रात में हुई इस घटना ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था।
यह निश्चित रूप से हम इंसानो के सुसंस्कृत समाज में जघन्य अपराधों में से एक था, लेकिन हमारे देश में यह पहली दफा हुआ है कि एक साथ चार लोगों को देश ही नहीं बल्कि एशिया के सबसे बड़े तिहाड़ जेल में एक साथ फांसी पर लटकाया गया।
हमारे समाज में कानून द्वारा किसी भी इंसान को सजा दिये जाने का प्रावधान इस लिये किया गया है कि गलती करने वाले इंसान को सजा देकर उसके द्वारा भविष्य में ऐसे अप्रिय एवं जघन्य कार्यो से दूर रहे यही कानून का मूल उदेश्य होता है लेकिन यहाँ यह प्रश्न उठता है कि जब उस व्यक्ति को फँसी पर चढ़ा कर उस अपराधी के प्राण ले लिये गये तो सजा और कानून का मूल उद्देश्य ही कहीं खो जाता है?







