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    Home»राजनीति

    अनुत्तरित सवालों का सियासी तूफान है इस्तीफा

    ShagunBy ShagunJuly 23, 2025 राजनीति No Comments5 Mins Read
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    Post Views: 938

    दिलीप राय शर्मा

    देश में एक अचानक से आया एक सियासी तूफ़ान थमने का नाम नहीं ले रहा है। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफे ने भारतीय राजनीति में हलचल मचा दी है। मंगलवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा उनका इस्तीफा स्वीकार किए जाने के बाद देशभर में सवालों का सैलाब उमड़ पड़ा है। धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया, लेकिन उनके प्रखर व्यक्तित्व और सोमवार को राज्यसभा के संचालन में दिखी तल्खी को देखते हुए कोई भी यह मानने को तैयार नहीं कि यह इस्तीफा केवल स्वास्थ्य के कारण हुआ। क्या इसके पीछे कोई सियासी दबाव था? क्या सत्तारूढ़ दल और धनखड़ के बीच कोई अनबन उभरी? या फिर यह संवैधानिक पद की गरिमा को लेकर उठा कोई तूफान था? ये सवाल न केवल राजनीतिक गलियारों में, बल्कि आम जनमानस में भी गूंज रहे हैं।

    सियासी तकरार या अपमान का घाव?

    धनखड़ का कार्यकाल हमेशा से विवादों के घेरे में रहा। विपक्ष ने उन पर बार-बार पक्षपात का आरोप लगाया, दावा किया कि वह सरकार का बचाव करते हैं और विपक्षी नेताओं को निशाना बनाते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और जया बच्चन जैसे दिग्गज नेताओं के साथ उनकी तीखी नोकझोंक ने सुर्खियां बटोरीं। धनखड़ पर यह भी इल्जाम लगा कि वह उपराष्ट्रपति जैसे गरिमामय संवैधानिक पद की मर्यादाओं को भूलकर सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता की तरह व्यवहार करते हैं। खासकर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति उनकी कथित अति-नम्रता, जैसे हाथ जोड़कर झुकना, विपक्ष के लिए तंज का कारण बना। विपक्ष ने उन्हें “रीढ़विहीन” और “चाटुकार” तक कह डाला।

    हाल के दिनों में कुछ घटनाएं खास तौर पर चर्चा में रहीं। राज्यसभा में जेपी नड्डा का यह बयान कि “मैं कहूंगा, वही रिकॉर्ड में जाएगा” धनखड़ को अपमानजनक लगा होगा, क्योंकि यह अधिकार केवल सभापति का है। इसके अलावा, जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को लेकर विवाद, जिसमें धनखड़ ने विपक्ष के हस्ताक्षर वाले प्रस्ताव को प्राथमिकता दी, ने भी सत्तारूढ़ दल में नाराजगी की सुगबुगाहट पैदा की। क्या बीएसी की बैठकों में भाजपा नेताओं की अनुपस्थिति ने धनखड़ को ठेस पहुंचाई? या फिर किसानों के पक्ष में और न्यायपालिका के खिलाफ उनके तीखे बयानों ने सत्ता के गलियारों में भूचाल ला दिया? ये सवाल अनुत्तरित हैं।

    स्वास्थ्य का बहाना या मजबूरी?

    धनखड़ ने इस्तीफे का कारण स्वास्थ्य बताया, लेकिन यह तर्क कई सवाल खड़े करता है। उपराष्ट्रपति जैसे पद पर रहते हुए उन्हें स्वास्थ्य सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी। फिर, इस्तीफे के बाद सत्तारूढ़ दल की चुप्पी भी संदेह को जन्म देती है। इस्तीफे के 15 घंटे बाद प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर उनके स्वास्थ्य की कामना की, उन्होंने लिखा, “धनखड़ को उपराष्ट्रपति सहित कई भूमिकाओं में देश की सेवा का अवसर मिला।” लेकिन न तो कोई बड़ा भाजपा नेता उनके घर हालचाल पूछने पहुंचा, न ही पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक बयान आया। यह चुप्पी क्या कोई सियासी संदेश दे रही है? फ़िलहाल आज की खबर के अनुसार उनका इस्तीफा मंजूर हो गया है।

    पश्चिम बंगाल से दिल्ली तक: विवादों का सफर

    धनखड़ का राजनीतिक सफर हमेशा चर्चा में रहा। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में उनके कार्यकाल में ममता बनर्जी सरकार के साथ उनकी तीखी तकरार ने उन्हें सुर्खियों में रखा। उनके बयान और व्यवहार तब भी भाजपा के प्रखर नेता जैसे थे। उपराष्ट्रपति बनने के बाद भी यह छवि बरकरार रही। विपक्ष ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव तक लाया, जो तकनीकी कारणों से विफल रहा। आजाद भारत के इतिहास में शायद ही कोई उपराष्ट्रपति इतना विवादास्पद रहा हो। फिर भी, यह धारणा थी कि धनखड़ प्रधानमंत्री मोदी के करीबी हैं। उनकी नियुक्ति ने जहां देश को चौंकाया था, वहीं उनके इस्तीफे ने और बड़ा झटका दिया है।

    भविष्य के गर्भ में छिपा सच

    धनखड़ ने महज 10 दिन पहले कहा था, “ईश्वर की कृपा रही तो मैं अगस्त 2027 में रिटायर होऊंगा।” फिर अचानक यह इस्तीफा क्यों? क्या यह उनकी मर्जी थी, या सत्ता के शीर्ष से कोई दबाव? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे कोई गंभीर वजह है, जिसका खुलासा शायद धनखड़ भविष्य में करें। उनके प्रखर व्यक्तित्व को देखते हुए यह माना जा रहा है कि वह चुप नहीं रहेंगे।

    उपराष्ट्रपति पद की दौड़: नई सियासी चाल?

    धनखड़ के इस्तीफे के बाद उपराष्ट्रपति पद के लिए कई नाम चर्चा में हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम सबसे आगे है। कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा नीतीश को यह पद देकर बिहार में मुख्यमंत्री पद अपने पास रखना चाहती है। इसके अलावा, केरल के पूर्व राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान और रविशंकर प्रसाद जैसे नाम भी उछल रहे हैं। पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए वहां के किसी नेता को यह पद देने की चर्चा भी है। भाजपा ने धनखड़ को राज्यपाल बनाकर बंगाल में सियासी जमीन मजबूत करने की कोशिश की थी, लेकिन सफलता नहीं मिली। क्या अब यह पद किसी नई सियासी रणनीति का हिस्सा बनेगा?

    विपक्ष को मिला नया हथियार

    धनखड़ के इस्तीफे ने विपक्ष को एकजुट होने का मौका दे दिया। वही विपक्ष, जो कल तक उन्हें “भाजपा का प्रवक्ता” और “मोदी भक्त” कहकर निशाना साधता था, अब उनके प्रति सहानुभूति जता रहा है। यह राजनीति की विडंबना ही है कि वक्त के साथ दुश्मन दोस्त बन जाते हैं और दोस्त अनजान। धनखड़ का इस्तीफा केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि यह सियासी गलियारों में एक नए तूफान की आहट है। सच क्या है, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन धनखड़ की विदाई ने भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय जरूर खोल दिया है।

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