जी के चक्रवर्ती
शहर में मज़दूर जैसा दर-ब-दर कोई नहीं
जिस ने सब के घर बनाए उस का घर कोई नहीं।।
मजदूर और मजबूर में कोई ज्यादा फर्ख नहीं है, वैसे हम साधारण जीवन में देखे तो शारीरिक मेहनतकश लोगों की संख्या अधिक है और हो भी क्यों नहीं क्योकिं हमारे सामाज में गरीबों की संख्या भी अमीर लोगों की अपेक्षा अधिक है। मजदूरों की मेहनत से ही ताजमहल से क़ुतुबमीनार तक जैसे सांस्कृतिक धरोहरे आज तक हमारे सामने खड़ी हुई है, न जाने कितने ही लोगों के श्रम के बदौलत आज संपूर्ण दुनिया में अनेकों कौतूहल से लेकर रेल लाइन और हवाई जहाज तक के सभी चीजें आज हम सभी लोग इस्तेमाल करते चले आया रहे हैं। यदि हम एक मजदूर की कल्पना करें तो उसका सम्पूर्ण जीवन श्रम पर निर्भर है। एक मजदूर की शादी विवाह से लेकर अपने जीवन की सभी जिम्मेदारियों का निर्वाह और तो और यहाँ तक उसके कफ़न तक सब कुछ श्रम के धरातल पर ही टिका रहता है।

यह हमारे समाज का एक ऐसा व्यक्तित्व होता है जो कुछ बोलने प्रतिकार करना और आराम जैसी सामाजिक दिनचर्या को भी दरकिनार कर मात्र श्रम करने और श्रम करते-करते ही प्राण त्यागने से लिये जिन्दा रहता और उसी के श्रम के आधार पर हमारे समाज की प्रत्येक वस्तु अपनी अस्तित्व के साथ खड़ी रही है या चलती रहती है। हमारे समाज में पलने वाला मजदुर कोई हम लोगों से अलग तरह का इंसान नहीं बल्कि हम आप जैसे ही एक मनुष्य एक इंसान है जिसे हम आने कामों के लिये हमेशा प्रयोग करते आये हैं और हमारी जरुरत के खत्म होते ही हम उसे विदा कर देते हैं

शायद हम आप में कोई ही होगा जो यह याद रखता होगा कि हमारे जिस मकान में हम रह रह रहे हैं उसमें किसी मजदूर ने उसे बनाने में अपना खून पसीने एक कर दिया होगा और उसी माकन में हम और हमारे पीढ़ियां अपना जीवन गुजार देते हैं। इसके अनुसार वह मजदुर हमारे घर के नींव की ईंट की तरह होता है कि जिसके श्रम पर हम अपने पीढ़ी दर पीढ़ी गुजार देते हैं फिर भी वह उसी जगह खड़े रह कर आने वाले शादियों की कहानी संस्कृतियां अपने बृक्ष स्थल में समेटे निश्चल सा खड़ा उस मजदूर की कुर्बानियों की मूक कहानी सुनाती रहती है। बस यूं समझ लीजिये कि मजदूर और मजदूरों से ये दुनिया बनी और टिकी हुई है।







