मथुरा में बीमार, त्यागी गई गायों की मददगार बनी जर्मन महिला फ्रेडरिक इरीना

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यह गाये हमारे बच्चों के जैसी हैं और मैं उन्हें नहीं छोड सकती


मथुरा, 17 सितंबर :  जिस देश में गाय के लिए लोगों की हत्या की जा रही है, जहां लगभग हर सड़क पर आवारा और छुट्टा गायें भटकती नजर आती हैं। हजारों कथित गोरक्षक के चलते भी इस देश में गायों की दुर्दशा हो रही है, वो भूखी प्यासी सड़कों पर पॉलीथीन खा रही हैं और गोशालें सरकारी मदद लोगों के दान के इंतजार में हैं। उस देश में एक विदेशी महिला 1200 गाय और बछड़ों का पाल रही है। इलाके के लोग उसे उन गायों की मां कहते हैं।जर्मनी की नागरिक 59 वर्षीय फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग उन 1,200 गायों की देखरेख कर रही हैं जिनमें से अधिकतर गायें त्यागी गई, बीमार और घायल हैं।
फ्रेडरिक इरीना  1978 में बर्लिन से भारत एक पर्यटक के रूप में आयी थी। उस समय उन्होंने अपने जीवन का कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया था।
मथुरा की अपनी यात्रा के बारे में बताते हुये उन्होंने कहा, मैं एक पर्यटक के रूप में आयी थी और मुझे अहसास हुआ कि जीवन में आगे बढने के लिए आपको एक गुरू की जरूरत होती है। मैं एक गुरू की तलाश में राधा कुंड गयी।
उसके बाद उन्होंने पडोसी के आग्रह पर एक गाय खरीदी और उसके बाद से मेरी जिंदगी पूरी तरह से बदल गयी।
इसके बाद उन्होंने गायों पर किताबें खरीदीं और हिन्दी सीखी।
उन्होंने बताया, मैंने देखा कि जब गाय बूढी हो जाती है और दूध देना बंद कर देती है तो लोग उसे छोड देते हैं।
फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग को यहां के लोग प्यार से सुदेवी माताजी कहते हैं। उन्होंने एक गौशाला शुरू की जिसका नाम सुरभि गौसेवा निकेतन है।
यहां राधे कुंड में गायों और बछडों के एक विशाल परिवार का हवाला देते हुये उन्होंने कहा, यह गाये हमारे बच्चों के जैसी हैं और मैं उन्हें नहीं छोड सकती।
एक बार एक गाय 3,300 वर्ग गज में फैली गौशाला में आ जाती है तो उसे खाना और दवा मुहैया करा कर उसकी पूरी देखभाल की जाती है।
उन्होंने कहा, आज, हमारे पास 1,200 गायें और बछडे हैं। और अधिक गायों को रखने के लिए हमारे पास जगह नहीं है। लेकिन जब कोई बीमार या घायल गाय को मेरे आश्रम के बाहर छोडकर जाता है तो मैं इंकार नहीं करती और उसे अंदर ले आती हूं।