काश भारत के सभी मुसलमानों की जमात तबलीगी हो जाये!

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माह-ए-रमज़ान में टू इन वन इबादत का मौक़ा

 

  • नवेद शिकोह

तबलीग़ का अर्थ है धर्म का प्रचार। धर्म की ख़ूबियों को बयां और साबित करना। संकीर्णता के दायरे से बाहर धर्म को इंसानित और मानव कल्याण से जुड़ा होना बताना। यह भी साबित करना कि हमारा धर्म राष्ट्रधर्म के सिद्धांतों का पालन करता है। हमारे धर्म ने हिदायत दी है कि हम अपने मुल्क के कायदे-कानूनों और आदेशों को पूरे अनुशासन के साथ निभाने का धर्म निभाये।

इन बिन्दुओं पर अमल किया जाये तो इसे अस्ल यानी वास्तविक तबलीग़ कहते हैं। किसी भी धर्म की ऐसी तबलीग उस धर्म का नाम रौशन करती है।

माह-ए-रमज़ान शुरु हो चुका है। वक्त-ए-मौक़ा भी है और दस्तूर भी है कि हर कोई मौका पड़ने पर अपना धर्म निभाये और अपने धर्म की मानवतावादी इबादतों को अमल मे लाकर अपने धर्म की खूबियों को दुनिया के सामने लाये। इससे बढ़ कर इस्लाम धर्म की तबलीग या प्रचार कुछ भी नहीं हो सकता है।

भारत के क़रीब पच्चीस करोड़ मुसलमान अपना धार्मिक दायित्व निभाकर भारत के इस मुश्किल वक्त के लिए देश का फर्ज भी निभा सकते है।

कोविड 19 महामारी के क़हर से विकसित पश्चिमी देश आर्थिक मंदी से भयभीत हैं। सबसे बड़ी आबादी वाला भारत गरीबी बाहुल्य विकासशील देश है। यहां गरीबी और बेरोजगारी पहले से है। देश की लगभग आधी आबादी रोज़ कुआँ खोदती है और रोज़ पानी पीती है। अर्थात रोज की मजदूरी की कमाई से रूखी-सूखी रोटी से पेट भरा जाता है। लॉकडाउन और कामबंदी की वजह से काम बंद हैं। मजदूरी और कमाई बंद है। रोज कमाने और रोज खाने वाले अपने-अपने घरों में क़ैद हैं। इनके पेट भरने का इंतज़ाम के लिए सरकारें जुटी हैं। आर्थिक मंदी को सरकारें अकेले कैसे झेलें। आम नागरिकों का भी धर्म है कि सरकार के साथ वो भी बेरोजगार और बेसहारा हो गई गरीब आबादी के पेट भरने की इबादत में शरीक हों।

इस सख्त वक्त में ही रमज़ान मुबारक शुरु हो चुका है। इबादतो, बरकतों और दान के इस माह में भारत की गरीब जनता की मदद बहुत बड़ी इबादत साबित होगी। माहे रमजान में मस्जिदों में तराबीह के आयोजनों का रिवाज है। इफ्तार पार्टियां, गरीबों की मदद,भूखों का पेट भरना, जक़ात, खैरात और फितरे की रमजान और ईद में ख़ास एहमियत है। मुसलमानों की धारणा है कि इबादतों के इस महीनों में हर नेक काम का सवाब (पुण्य) सौ गुनाह बढ़ जाता है।

 

कोरोना महामारी से जान बचाने के लिए इस बार सामाजिक दूरी बनाना वाजिब(अनिवार्य) है। इसलिए मस्जिदों में तराबीह के आयोजन, रोजा अफ्तार पार्टियों और ईद मिलन समारोह तो होंगे नहीं। लेकिन इबादतों के सिलसिले में कोई कमी नहीं होगी। देश के मुसलमानों की करीब पच्चीस करोड़ की आबादी यदि देश की गरीब जनता की मदद में उतर आये तो ये माहे रमजान की सबसे बड़ी इबादत होगी। रोज़े का एक कारण भूख का एहसास करना भी है। देश का राशन बचाना ताकि गरीबी कुछ कम हो, ये भी रोजे का मक़सद है। कोई भूखा ना रहे। धनाभाव में कोई मरीज बिना इलाज के ना मर जाये। कोई बच्चा पढ़ाई से वंचित ना रह जाये। कोई रोटी को मोहताज ना हो। बस इस्लाम की इसी फिक्र ने ज़कात और फितरा जैसे अलग-अलग दान अनिवार्य किये हैं।

 

पच्चीस करोड़ मुसमान यदि रमजान और ईद में यह धार्मिक दान राष्ट्रहित में देश के गरीबों को समर्पित कर दें तो वाकई इस महामारी में भुखमरी के खिलाफ लड़ाई को बड़ा बल मिलेगा। इस दान (फितरा, जकात) के अलावा मुसलमान एक महीने रोजे रखकर देश के अनाज को बचाकर ना सिर्फ धर्म बल्कि राष्ट्र धर्म भी निभायेगा। और यदि सरकार के राष्ट्र कोशों/ रिलीफ फंड में मुसलमान रमज़ान और ईद का दान पंहुचा दें तो इस महामारी में मुस्लिम समाज की तरफ से हजारों करोड़ की मदद मिल सकती है। धर्म और राष्ट्रधर्म निभाकर ऐसे में मुसलमान अपने इस्लाम धर्म की असली तबलीग़ कर सकते हैं। ये तबलीग निजामुद्दीन वाले मरकज के चंद लापरवाह मुसलमानों की तबलीग के विपरीत होगी। और नकली तबलीगियों के कलंक को भी असली तबलीग धो सकती है।

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