- करोड़ों का विश्वास जीतने वाले इस गरीब पत्रकार का न्यूज रूम डबल डोर साउंड प्रूफ तक नहीं
- मोदी सरकार के शुभचिंतक विनोद दुआ के मीडिया ग्रुप ‘द वायर’ को सरकार आर्थिक सहयोग क्यों नहीं देती !
-नवेद शिकोह
लेटेस्ट टैक्नोलॉजी में अरबों रूपये के सैटअप और तेल मालिश वाले कुछ न्यूज चैनल्स मोदी सरकार को नुकसान पंहुचा रहे हैं। ऐसे न्यूज चैनलों के घिसे-पिटे आलाप से हम ऊब जाते हैं और फिर इन्टरनेट पर ‘द वायर’ में सरकार हितैषी विनोद दुआ के विश्लेषण से आत्मसात होते हैं। ये हम इतना दिल और ध्यान लगाकर देखते है कि न्यूज रूम की कई बड़ी तकनीकी बाधाएं सच बताने और सच जानने की दीवानगी के बीच बेअसर हो जाती हैं। वायर के पास इतना भी पैसा नहीं कि शायद उनके सैटअप का वायर भी दुरुस्त हालत मे हो। पैसा नहीं है लेकिन करोड़ों दर्शक, श्रोता और पाठकों का सच पर विश्वास इस वेबसाइट की बहुत बड़ी और बेशकीमती पूंजी है। दा वायर का न्यूज रुम शायद साउंड प्रूफ डबल डोर भी नहीं।
विनोद दुआ जिस छोटे से बेतरतीब कमरे से लाइव विश्लेषण और न्यूज पेश करते हैं तो कभी गाड़ियों का शोर तो कभी कोई और डिस्ट्रबविंग आवाज बाधा डालती है। लेकिन विनोद की सच्ची खबरों और सच्चे तर्कों के आगे शोर के अतिक्रमण की चल नहीं पाती।
मैंने लिखा है कि पत्रकार विनोद दुआ मोदी सरकार के हितैषी हैं। इसपर आपको आपत्ति होगी। लग रहा होगा कि विनोद को सरकार हितैषी कहकर मैं विनोद कर रहा हूं।
लेकिन मैं ये संजीदगी से कह रहा हूं कि विनोद दुआ मोदी सरकार के हितैषी है। और वर्तमान सरकार ही के नहीं पिछली कांग्रेस और अन्य हर सरकार के वो हितैषी रहे हैं। मुझे लगता है कि सरकार की खामियां बताने वाली पत्रकारिता सरकार की शुभचिंतक होती है। सरकार के लिए फायदेमंद होती है। दरबारी पत्रकारिता, गोदी मीडिया और चापलूस पत्रकार सरकार के लिए हानिकारक होते हैं। कई स्थान पर आलोचना को महत्वपूर्ण विधा का दर्जा मिला है। तनक़ीदनिगार (आलोचक) का साहित्य में विशिष्ट दर्जा है। आलोचना बिगाड़ती नहीं निखारती है। लोकतांत्रिक सिस्टम में विपक्ष या चौथे स्तम्भ की आलोचनातमक दृष्टि सरकार को सही दिशा दिखाती है। पत्रकारिता में खामियों को उजागर करने वाले पत्रकार को विरोधी की संज्ञा देना अज्ञानता ही नहीं मूर्खता भी है।
व्रत या रमजान के रोज़े को फाक़ा कहने वाले जाहिल धर्म के साइंटिफिक मायने नहीं जानते।
विनोद दुआ, पुण्य प्रसून वाजपेयी, अभिसार शर्मा और इन जैसे देश के सैकड़ो छोटे-बड़े पत्रकार कांग्रेस सरकारों की भी धज्जियां उड़ाते थे और भाजपा सरकार की भी बखिया उखाड़ते हैं।
एक किस्सा सुनिये :- मुझे तक़रीर करने का बहुत क्रेज था। तकरीर करने का मौका मिलना था। तैयारी में रेडिमेड कुर्ता पैजामा खरीद कर लाया। चैक नहीं किया। बड़े-बूढ़े शुभचिंतकों ने बताया भी नहीं कि सिलाई यानी बखिया चैक करो। जोश में तकरीर शुरू ही की ही थी कि लोगो नै हंसना शुरु कर दिया। कुर्ते के बगल और पैजामा की म्यानी की बखिया उखड़ गयी। बेइज्जती झेलने के बाद पश्चाताप हुआ। काश! मैं नहीं तो दूसरा कोई शुभचिंतक पहले ही रेडीमेड कपड़ों की सिलाई को खीच तान कर चैक कर लेता।
ऐसे ही.. इसलिए ही सत्ता को खींचना-तानना पत्रकारिता का धर्म है और सत्ता के लिये मुफीद(फायदेमंद) भी है। पत्रकारिता सरकार के कसीदे गढ़ने के लिए नहीं विपक्ष की भूमिका में होती है। आलोचनात्मक पत्रकारिता ही सत्ता की टाॅनिक का काम करती है और चाटुकार पत्रकारिता सत्ता के लिए जहर बन जाती है।
ये बातें ना गैर भाजपा सरकारों के अंधभक्त समझते थे और ना भाजपा सरकारों के अंधभक्त समझ पा रहे हैं। मुझे याद है गैर भाजपा सरकारों में पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसों की आक्रामक पत्रकारिता से तिलमिला कर गैर भाजपा सरकारों में इन पत्रकारों पर संघी पत्रकार होने के खूब आरोप लगते थे। और अब अंधभक्त कह रहे हैं कि पुण्य प्रसून वाजपेयी और विनोद दुआ जैसे चंद पत्रकार एक एजेंडा चला रहे हैं।







