28 मई जयंती विशेष : आद्य पत्रकार थे- देवर्षि नारद !

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राजेन्द्र सक्सेना

आद्य पत्रकार देवर्षि नारद का जन्म/ अवतरण ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को हुआ था उन्हें ब्रम्हा जी के मानस पुत्र के रूप में जाना जाता है। सभी पुराणों में महर्षि नारद एक प्रमुख भूमिका में दिखाई देते है उन्हें देवर्षि की संज्ञा दी गयी उनकी मित्र, सलाहकार देव दानवो के बीच अलग पहचान है इसी कारण पुराणों में नारद जी को भागवत संवाददाता के रुप मे प्रस्तुत किया गया है तो वही हमारी संस्कृति में नारद जी का एक विशिष्ट चरित्र एवं स्थान है। हमारी ऋषि परम्परा और लोक परम्परा दोनों परंपराओं के इतिहास में उनकी समान लोक प्रियता है।

देवर्षि नारद सूचना के सम्प्रेषण अथवा प्रसारक होने के साथ साथ नारद पुराण, नारद स्मृति, नारदीय ज्योतिष आदि ग्रंथों के रचयिता थे । वीणा नामक वाद्ययंत्र का उन्होंने आविष्कार किया । नारद जी संगीत शास्त्र के श्रेष्ठ ज्ञाता थे वे सूचनाओं के संवाहक,धर्मशास्त्रों के सृजन करता,देव दैत्य सभी के मित्र,सर्वलोक हितकारी तथा इंद्र लोक के स्वतंत्र पत्रकार है । कुछ लोगो के मन मे यह प्रश्न अवश्य उठ सकता है कि नारद आद्य पत्रकार कैसे ? इस प्रकार के प्रश्नकर्ता के मन मे समाचार पत्र, पत्रिका,रेडियो एवं टेलीविजन की सूचना से जुड़ा पत्रकार समाया है ।

इस कारण उनके मन मे प्रश्न स्वाभाविक है लेकिन जब पत्रकारिता के व्यवहार पक्ष पर विचार करेंगे तो उनका भ्रम स्वतः समाप्त होगा । देवर्षि नारद वास्तव में आद्य पत्रकार थे क्यो की वे पत्रकार का काम करते थे । पत्रकारिता वास्तव में पत्रकार के व्यवहार से जुडा कार्य है। वर्तमान में पत्रकारिता के अंतर्गत पत्रकार- सूचना के संग्रह सूचना के सम्पादन एवं सूचना को भेजने का कार्य करते है । आद्य पत्रकार नारद जी भी तीनो लोको की सूचना के संग्रह,सम्पादन, एवं सूचना को भेजने का कार्य करते थे इस कारण वे पत्रकार ही थे उनकी पत्रकारिता सज्जन रक्षक, एवं दुष्ट विनाश की थी समुद्र मंथन में विष निकलने की सूचना सर्व प्रथम आद्य पत्रकार नारद जी ने मंथन में लगे पक्षो को दिया,परन्तु सूचना पर ध्यान न देने से विष फैला।

आद्य पत्रकार नारद जी ने सती द्वारा दक्ष के यज्ञ कुंड में शरीर त्यागने की सूचना सर्वप्रथम भगवान शिव को दी नारद जी ने एक पत्रकार के रुप मे जगन्नाथ की रथ यात्रा को प्रारम्भ कराया महाभारत युद्ध समाप्ति की सूचना बलराम जी को दी इतना ही नही पत्रकार के रुप मे काशी,प्रयाग,मथुरा, गया,बद्रिकाश्रम,केदारनाथ,रामेश्वरम सहित सभी तीर्थों की सीमा के महत्व का वर्णन किया है। पुराण समीक्षा आज भी पुस्तक समीक्षा का श्रेष्ठ उदाहरण है नारद जी ने समीक्षा के दौरान सही उत्तर देने वालो पर पुरस्कार देने की परंपरा प्रारम्भ की इसी कारण नारद जयंती पर पत्रकारों को सम्मानित करने का काम संघ के प्रचार बिभाग ने प्रारम्भ किया है ।

आद्य पत्रकार नारद जी ने वर्तमान के पत्रकारों के लिए जो मानक रखे है उनका भी विवेचन आवश्यक है उन्होंने माया के ज्ञान के लिए एक बार स्त्री रुप धारण किया यह उनकी अनुभवात्मक पत्रकारिता का श्रेष्ठ उदाहरण है । उन्होंने मृत्यु का भी जीवन व्रत लिखा है जो दुनिया मे अन्यत्र नही है । कलियुग में धर्म की रक्षा एवं सदाचरण के लिए सत्यनरायण कथा को प्रकट किया तथा लोक विस्तार दिया । महर्षि बाल्मीकि को रामायण लेखन की प्रेरणा दी महर्षि वेद व्यास को भगवान श्री कृष्ण के चरित्र का गुणगान करने के लिये भगवत गीता को लिखने को प्रेरित किया साथ ही इंद्रप्रस्थ,एवं कुरुक्षेत्र के नाम करण के इतिहास का भी वर्णन है । आद्य पत्रकार नारद की पत्रकारिता आध्यात्म पर आधारित थी उन्होंने स्वार्थ, लोभ एवं माया के स्थान पर हमेशा परमार्थ को श्रेष्ठ माना है।

आद्य पत्रकार नारद जी ने सृष्टि के प्रारम्भ में ही पत्रकारिता के समक्ष जो आदर्श एवं स्वरुप प्रस्तुत किया, उस पर स्वतंत्र अध्ययन आवश्यक है हमे आद्य पत्रकार के रुप मे नारद जी के योगदान को सदा याद रखना होगा महान विपत्ति से मानवता की रक्षा का कार्य किया ।एक समय जब अर्जुन दिव्यास्त्रों का परीक्षण करने जा रहे थे उस समय नारद जी ने अर्जुन को ऐसा करने से रोका और अर्जुन को समझाते हुए कहा कि दिव्यास्त्र परीक्षण व प्रयोग की वस्तु नही है। इनका प्रयोग आसुरी शक्तियों से सृष्टि की रक्षा के लिए किया जाना चाहिए। इस प्रकार नारद जी ने सुचिता के साथ पत्रकारिता के कार्यो का निर्वहन किया इसी कारण देवर्षि नारद का पत्रकार व्यवहार श्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम है।

उनकी पत्रकारिता में आदर्शो की खोज या आदर्श पत्रकार की पहचान ही हमे देवर्षि नारद तक ले जाती है खबर लेने देने या संवाद रचना में जो आदर्श और परम्परा को नारद जी ने स्थापित की वह आज की पत्रकारिता के लिए आदर्श हो सकती है नारद की पत्रकारिता लोक कल्याणकारी थी लेकिन वर्तमान समय मे आज की पत्रकारिता अपने आधुनिक कलेवर में एक व्यवसाय बन कर दिखाई देती है लेकिन फिर भी इसके लिए आदर्शो की तलाश तो करनी ही होगी ।आदर्शो के बिना पत्रकारों के फिसलने का खतरा बना रहेगा । नारदीय परम्परा पत्रकारिता के उन्ही आदर्शो में है जिन्हें देवर्षि नारद ने युगों पहले देवलोक, पृथ्वी लोक, में स्थापित कर चरैवेति चरैवेति यही तो मन्त्र है अपना को साकार कर तीनों लोकों की खबरों को अपने पास रखते थे और भेजते थे।

आज पूरे देश मे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रचार विभाग के आयाम विश्व संवाद केंद्र द्वारा भारी संख्या में नारद जयंती नारद पत्रकारिता सम्मान समारोह एवं नारद जी पर विचार गोष्ठियां हो रही है तो देश के तथाकथित सेकुलर लोग,पत्रकार इस आयोजन को भगवाकरण के रुप मे देखने लगे और नारद जयंती को हँसी का पात्र मानकर विवाद का पर्याय मानते थे लेकिन धीरे धीरे सम्पूर्ण भारत मे बल्कि उत्तर भारत मे ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को नारद जयंती विश्व हिंदी पत्रकारिता दिवस,पत्रकार सम्मान सफलता पूर्वक सम्पन्न होने लगे तो वही सेकुलर जो नारद जयंती को भगवाकरण कहते थे वे स्वयं नारद जयंती कार्यक्रम में आने लगे ।

आप सभी को ज्ञात होना चाहिए कि संघ स्थापना के 99 वर्ष पूर्व कानपुर के निवासी पंडित युगल किशोर तिवारी ने कोलकाता से पहला हिंदी समाचार पत्र उद्दंड मार्तण्ड 30 मई 1826 को को प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने अपनी सम्पादकीय में लिखा है कि यह पत्र आदि पत्रकार नारद जी को समर्पित है आज 30 मई 1826 को ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया तिथि नारद जयंती है । आज की सेकुलर पत्रकार 30 मई को हिंदी दिवस मनाती है लेकिन नारद जयंती मनाने में भगवाकरण दिखाई देता है विश्व संवाद केंद्र लखनऊ में सन 1998 को देवर्षि नारद जयंती का पहला कार्यक्रम उस समय के क्षेत्र प्रचार प्रमुख निवर्तमान अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख रहे स्मृति शेष श्री अधीश कुमार जी के उपस्थित में सम्पन्न हुआ तब से आज तक पूरे देश मे हजारों स्थानों पर ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को नारद जयंती ,नारद सम्मान, विश्व पत्रकारिता दिवस को भारी संख्या प्रसिद्धि मिली है ।

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