आगे सरकार के रंग में भी ढल सकते है अखबार कर्मी
अखबारों के नवीनीकरण में डीएवीपी के जानलेवा नियमों को आलाकमान ने शिथिल कर दिया है। साथ ही निर्धारित तारीख से एक महीने पहले अखबारों के रिनीवल की प्रक्रिया शुरू हो गई। नवीनीकरण को जीसटी संबंधी जटिलताओं से मुक्त देखकर प्रकाशकों और अखबार कर्मियों में खुशी की लहर है। इस वर्ष के अंत में लोकसभा चुनाव की तैयारियां शबाब पर होंगी। सरकार की उपलब्धियों को प्रचारित करने के लिए अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर में डीएवीपी को विज्ञापन कैम्पेन तेज करनी है। इसलिए डीएवीपी एक महीने पहले ही अखबारों के नवीनीकरण का काम निपटा लेना चाहता है।
कहावत- देर से आये दुरुस्त आये, के विपरीत अखबारों के नवीनीकरण का फार्म पहले भी आ गया और दुरूस्त भी आया। डर ये था कि फार्म में ऐसी चीजे मांग ली जायेंगी जो पूरा करना संभव नहीं होगा। सब इस ही खौफ के साये में थे।
बताते चलें कि देश की अखबारी दुनिया में नब्बे प्रतिशत अखबार कर्मी बहुत ही छोटी पूंजी के अखबारों में रोज़ी-रोजगार से जुड़े है। इसमें सिर्फ पत्रकार ही नहीं, पब्लिशर, संपादक, कंप्यूटर आपरेटर, मशीन मैंन से लेकर तमाम पेशेवर छोटे-छोटे हुनरों से जुड़े हैं। एक प्रतिशत अपवाद को छोड़ दीजिए तो यहां A से Z तक सब मामूली आमदनी पर निर्भर हैं। मजदूर जितनी कमाई से लेकर सरकारी बाबू की आमदनी से ज्यादा इनकी कमाई नहीं। सबसे बड़ी बात ये है कि इनके पास अखबार के सिवा रोजगार का कोई विकल्प नहीं।

कम आमदनी और कम पूंजी वाले छोटे-छोटे अखबारों की दुनिया प्रसार के तमाम तकनीकी कारणों से अनआर्गनाइज हैं। ये जीएसटी की पारदर्शिता वाला हिसाब नहीं दे सकते। अखबारी कागज पर जीएसटी सुनामी बनकर इन लाखों अखबार कर्मियों के रोजगार को बहा देगा। इस खतरे से ही सांसे अटकी थी कि देशभर के अखबारों की सरकारी विज्ञापन दरों की डीएवीपी मान्यता की मुद्दत खत्म होने का वक्त आ गया। अब नवीनीकरण होना है। खबरे आने लगीं कि रिनीवल करने वाली सरकार की नोडल एजेंसी डीएवीपी उन अखबारों का ही नवीनीकरण करेगी जो जीएसटी के हिसाब का सम्पूर्ण विवरण पेश कर पायेंगे। यानी अखबार प्रोडक्शन की A टू Z रसीदों से लेकर बैंक स्टेटमेंट भी मांगा जायेगा। अनआर्गनाइज प्रकाशक ये सब पेश ही नहीं कर सकते थे। ये तय हो गया कि रिनीवल की प्रकिया के दौरान ही देश के नब्बे प्रतिशत अखबारों में ताला पड़ जायेगा और कई लाख अखबार कर्मी एक झटके में बेरोजगार हो जायेंगे।
पहली सितम्बर को अखबारों की डीएवीपी मान्यता के रिनीवल का फार्म आना था, लेकिन एक महीने पहले ही आज एक अगस्त को ही फार्म डीएवीपी की साइट पर अपलोड हो गया। फार्म देखकर लगा कि अधिकांश खतरे टल गये। देश के लाखों अखबार कर्मियों ने थोड़ी राहत की सांस ली। भय इत्मीनान में बदला। डरावने कयास फेल हुए। रिनीवल में ऐसा कुछ नहीं मांगा गया जो अखबार नहीं दे पायें।
सोर्स बता रहे हैं कि एक करोड़ के अंदर के टर्नओवर यानी 25-30 हजार तक के प्रसार का दावा करने वाले अखबारों पर से जीएसटी भी हटने की संभावना है। इसीलिए डीएवीपी मझोले अखबारों से बैलेंस शीट और प्रोडक्शन की रसीदें नहीं मांग रही हैं।
बताया जाता है कि लाखों गरीब अखबार कर्मियों/पत्रकारों के हित में छोटे अखबारों को बचाने के लिए डीएवीपी के नये डीजी का बड़ा योगदान है।
छोटे अखबारों से बड़ी तादाद में अखबार कर्मी जुड़े हैं। बेरोजगार होने के खतरे से अखबार को लेकर सरकार की नीतियों का जबरदस्त विरोध हो रहा था। हर तरफ रोष था। धरने प्रदर्शन और अपनी अपनी रोजी रोटी को बचाने के लिए हर प्रदेश में सरकार के नुमाइंदों को ज्ञापन पर ज्ञापन दिये जा रहे थे। अखबार कर्मियों के दर्जनों संगठन कानूनी लड़ाई की रणनीतियां तैयार कर रहे थे। न्यूज पोर्टर/वैबसाइट्स/और सोशल मीडिया के चप्पे-चप्पे पर कलमकारों के कलम आग उगल रहे थे। (मेरे ही अकेले इस विषय पर पचास से ज्यादा लेख देशभर में वायरल हुए) बताया जाता है कि ये रिपोर्ट मिनिस्ट्री तक गयी। चुनावी वर्ष में लाखो अखबार कर्मियों की नाराजगी का उबाल शांत करने लिए एक समझदार सरकार का कोई सकारात्मक निर्णय लेना लाजमी था। शायद ऐसा ही हुआ होगा। नवीनीकरण में डीएवीपी के तय सख्त नियम शिथिल कर दिये गये। अब आशा की जा रही है कि कम यानी 25 हजार तक के स्लैब वाले अखबारों पर से जीएसटी हटा लिया जाये। सूत्रों के अनुसार जीएसटी कौंसिल में इस तरह का प्रस्ताव जल्द ही रखा जायेगा। यदि ये प्रस्ताव पास हो गया तो कम संसाधन वाले हजारों अखबार और उनसे जुड़े लाखों अखबार कर्मियों के रोजगार बच जायेंगे।
इन संकेतों के साथ अखबार को लेकर सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले कलमकार आज डीएवीपी डीजी और सरकार के नर्म रूख का शुक्रिया अदा करने में जुट गये। थोड़ी मुसीबत टलने में पिघल गये, पूरी मुश्किल हल हो जाने पर हो सकता है भाजपा सरकार के रंग में छोटे अखबारों के पत्रकार भी ढल जायें। देश के कुल अखबारों के आधे अखबार सिर्फ यूपी मे हैं। भाजपा यूपी की सियासत की चुनौतियों को फतह कर लेती है तो लोकसभा चुनाव का किला फतह समझो।
समझदार को इशारा काफी है !
-नवेद शिकोह







