दिनेश जुयाल
पुण्य प्रसून वाजपेई को इस बार एवीपी से निकाले जाने के साथ खांडेकर अभिसार आदि को मिली सजा पर सबसे पहले भाई प्रभात डबराल की झकझोरने वाली और गुस्से भरी पोस्ट पढ़ी, वरिष्ठ पत्रकार भाई जावेद का लाइव वीडियो देखने से पहले रवीश जी, बहुगुणा जी नक़वी जी समेत दर्जन भर पत्रकारों का गुस्सा पढ़ा।
गैर पत्रकार लोगों की टिप्पणियां भी पढ़ी। इधर कुछ सुधीर चौधरी और अरनव जैसों के अनुयाई रवीश, पुण्य प्रसून को गरियाने उतर आए हैं। भाई जखमोला जैसे कुछ लोग जो किसी मीडिया हाउस से गलत तरीके से हटाए जाने के खिलाफ लड़ रहे हैं उनकी पीड़ा तो समझी जा सकती है लेकिन जिनका धंधा हर राज में विपक्ष के विपक्ष में खड़े होकर सत्ताधीशों के तलवे चाटना है वे अलग किस्म का स्यापा कर रहे हैं। कुछ पुण्य जैसे लोगो की तुलना अपने साथ इन्हीं के अंदाज में पत्रकारिता सीख रहे लोगो का हवाला देकर कह रहें हैं कि उन्हें पुण्य रवीश से क्या लेना देना उनके लिए तो यही असली पत्रकार हैं। वे फेसबुक पर व्यंग लिखना सीख रहे हैं और इस मामले को खतरे की घंटी बताने वाले वरिष्ठ पत्रकारों का मजाक उड़ा रहे हैं। लखनऊ के एक पत्रकार मित्र ने तो झूठ और नफरत की फैक्ट्री में बनने वाला एक रेडी मेड गालीनामा सुबह सुबह चेप दिया।
देश के बड़े पत्रकारों से गोदी सेना की तुलना नहीं बनती लेकिन जिस तरह सुनियोजित तरीके से ये बानर सेना इस गुस्से के माहौल को डाइल्यूट करने उतरी है उसमें पीछे वाले हाथ साफ दिख रहे हैं।
इन डरे हुए, अधमरे, बिकाऊ प्रजाति के शिखंडियों का संदेश यही है कि पत्रकारिता करनी है तो डरे रहिए इसी में भलाई है। वरना इसी तरह नौकरी जाएगी और बचाने कोई नहीं आएगा।
मुझे करन थापर द्वारा 2007 में लिया गया वो इंटरव्यू याद अा रहा है जब इंटरव्यू देने वाले नरेंद्र मोदी का तीन चार सवालों में गला सूख गया। उन्होंने पानी मांगा, पिया और यह कह कर माइक उतारने लगे कि मैं चाहता हूं दोस्ती बनी रहे। हाल में द वायर के इंटरव्यू में करन थापर ने पूरा किस्सा सुनाया। अपनी पुस्तक में तफसील से लिखा है । यह भी कि उस दिन दिल्ली में साथ भोजन करने की बात कहने वाले मोदी आज तक उनसे मिलने को राजी नहीं। लगता तो यही है कि हमारे मोदी जी को सच्ची और खरी बात पसंद नहीं। अपनी शर्तों पर दोस्ती पसंद है। सवाल करने वाले और सवाल उठाने वाले अच्छे नहीं लगते इसलिए प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते।
पुण्य प्रसून ने एक बार सरकार के नाक के बाल बाबा रामदेव से उनकी आय और टैक्स पर सवाल किया तो उन्हें आजतक से बाहर करवा दिया गया। इस बार तो उन्होंने रिपोर्टर भेज कर ये सच सबूत समेत सामने ला दिया कि अपनी छवि चमकाने के लिए सरकार सचे गरीबों से भी झूठ बुलवाती भी हैं। एक महिला सरकारी अफसरों के कहने पर मोदी जी को कैमरे के सामने झूठ बोल देती है कि उसकी आय सरकार की कृपा से दोगुनी हो गई। इस तरह सीधे मोदी जी की किरकिरी करने पर तो पुण्य के साथ ही पूरी टीम पर गाज गिरनी ही थी।इन्होंने अपने करियर में कभी कोई गलती नहीं की और हमेशा सत्य के योद्धा बने रहे ये सर्टिफिकेट कोई भी कैसे दे सकता है लेकिन ताज़ा घटनाक्रम उसकी पृष्ठभूमि और मीडिया की आज की दशा ऐसी नहीं है कि पुण्य प्रसून को हटाने पर ठहाके लगाएं। या यहां की, वहां की, इतिहास -भूगोल की जोड़ कर इसे मामूली बात मान कर इन पैदल किए जा रहे पत्रकारों को ही गरियाने लगें।
मेन स्ट्रीम मीडिया पहले से सेल्फ सेंसरशिप की मुद्रा में है। पत्रकारिता की आजादी के मामले में हम 138वें नंबर पर जा चुके। अपने पड़ोसियों से भी बदतर। एक दो चैनल में दो चार जनता के मुद्दे उठाने वाले पत्रकार दिखते हैं उन्हें भी पैदल किया जा रहा है। बाकी को चुप होने को कहा जा रहा है। किसी को कहा जा रहा है कि वह साबित करे कि वामपंथी नहीं है और वह नौकरी बचाने के लिए गए गा गा के खुद को राम भक्त बता रहा है। ये सब अघोषित आपातकाल नहीं तो और क्या है।
अपने सच से डरे हुए लोग जब ये कारनामे कर रहे हैं तो बात संसद में भी उठ रही है और सड़क पर भी। उठनी चाहिए। जो लोग इस बड़ी घटना का मजाक बना रहे हैं उन्हें मोदी जी की राय मानकर कलम छोड़ पकोड़े तलने का धंधा शुरू कर देना चाहिए। हां इस बहाने रिटेनरों की चिंता करना वाजिब है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर जो घट रहा है वो मजाक नहीं आज के वक़्त का बड़ा मुद्दा है भाई।
इतना भी ना डर जाओ कि घुटनों के बल सरकार के आगे दुम हिलाने के चक्कर में कुकुर गति को प्राप्त हो जाओ।







