- सोशल मीडिया से संसद तक पंहुची बहस सिर्फ दो नजरिए पेश कर रही है
- पुण्य प्रसून वाजपेयी सच दिखाने की जुर्रत और हिम्मत कर रहे थे। इसलिए सरकार ने दबाव बनाया और एबीपी न्यूज चैनल ने अपनी जान बचाने के लिए पुण्य प्रसून वाजपेयी को निकाल दिया
दूसरे बिन्दु पर मेरे दो सवाल हैं:
पत्रकारिता कोई छुट्टा सांड नहीं जो किसी के भी सींग घुसेड़ दे। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया को इतनी भी आजादी नहीं मिली है कि वो जो मर्जी आये करे। पत्रकारिता तमाम नियम कानूनों और सिद्धांतों से भी बंधी है। यदि मेरे बारे में कोई गलत खबर चलाता है तो मैं खबर के गलत होने के साक्ष्य पेश कर दूं तो प्रेस एक्ट के अनुसार अखबार या चैनल को मेरा खंडन छापना या दिखाना पड़ेगा। साथ ही गलत खबर प्रस्तुत करने वाला दर्शकों/पाठकों के समक्ष गलत खबर पेश करने की माफी मांगेगा।
जैसे कि यदि कोई चोरी होने की बात कहे और पुलिस में सूचना ना दे या रिपोर्ट ना लिखाये तो वो खुद संदिग्ध या झूठा माना जाता है। ऐसे ही मीडिया संस्थान में संबधित पार्टी या व्यक्ति द्वारा लिखित खंडन नहीं भेजा जाता तो खबर को झूठा कहना का अधिकार किसी को नहीं।
यदि पुण्य प्रसून वाजपेयी सरकार के खिलाफ झूठी खबरे चला रहे थे। बार-बार प्रधानमंत्री मोदी को कटघरे में खड़ा कर रहे थे तो संबंधित विभाग या पीएमओ से प्रसून की खबरों का खंडन क्यों नहीं किया गया। खंडन नहीं किया गया इसका मतलब सरकार के खिलाफ गंभीर तथ्य पेश करने वाली खबरों को सरकार ने सच माना है।
तो फिर प्रसून की खबरों को फेक कैसे कहा जा सकता है ?
2- एजेंडा चला रहे थे। प्रसून विरोधी सोशल मीडिया में ये वाक्य निगेटिव वे में ले रहे है। जबकि पत्रकारिता एक एजेंडा ही है। सच बताने का एजेंडा। सम्पादकीय टीम में सबको अलग-अलग काम निर्धारित किये जाते हैं। कोई किसी राजनीतिक दल की रिपोर्टिंग करता है तो कोई दूसरे दल की। कोई पीएमओ की खबरों पर काम करता है कोई पर्यटन तो कोई रेलवे बीट देखता है। इसी तरह चप्पे चप्पे पर पत्रकारों की निगाहें रहती हैं। हर पत्रकार अपने एरिया की रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी निभाता है।
एक सबसे अहम बात और है – पत्रकारिता में उस खबर पर ज्यादा लपका जाता है जो दूसरा नहीं दिखा पा रहा हो।
प्रसून पत्रकारिता का हर धर्म और हर कर्म निभा रहे थे। उनके हिस्से में वो सब सच्ची पर आलोचनात्मक खबरें थी जिसे किसी भी कारणवश कोई भी नहीं दिखा पा रहा था। ये सब खबरे स्पेशल यानी एक्सक्लूसिव थीं। इत्तेफाक से ये सब खबरें निगेटिव थीं। सरकार विरोधी थीं और पोल खोलने वाली थीं।
हर रिपोर्टर की स्पेशलाइजेशन होती है। सरकार की कमियों और खामियों को ढूंढ-ढ़ूंढ कर दिखाना प्रसून की स्पेशलाइजेशन भी है और ऐसे सच को दिखाना इनका एजेंडा हमेशा से रहा है। कांग्रेस सरकारों के लिये भी प्रसून की रिपोर्टिंग कहर बनती थी। यहां तक कि कांग्रेसी भक्त उनपर संघ का एजेंट होने के बेतुके आरोप लगाते थे। आज पुण्य प्रसून पत्रकारिता का धर्म निभा रहे हैं। और आज भी उनपर फेक खबर चलाने या एजेंडा चलाने के बेतुके आरोप लग रहे हैं। अच्छी बात है। ऐसा ही होता है। देश की रक्षा के लिए जो सिपाही जितना लड़ता है उतना ही घायल होकर जख्म मोल लेता है। इन जख्मों में पेशे के धर्म के खुदा का अक्स नजर आता है।
-नवेद शिकोह







