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    Home»इंडिया

    उ.प्र.संवाददाता समिति हुई यूनाइट, विरोधी हुए डिवाइड

    ShagunBy ShagunJanuary 11, 2021 इंडिया No Comments5 Mins Read
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    नवेद शिकोह

    सिनेमा का एक शो खत्म हुआ तो कुर्सी के नीचे छिप कर बिना टिकट दूसरा शो देखना चाह रहे कल्लू को सिनेमाहॉल के गेट कीपर ने घुमा के ख़ूब तेज़ थप्पड़ मारा। कल्लू गेट कीपर से बोला थैंक्यू। मेरा मुंह टेहड़ा था, तुमने सीधा कर दिया ।

    कल्लू की तरह उ.प्र. राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति फायदे में रही। समिति की नीतियों का विरोध कर रहे आक्रोशित पत्रकारों के हमलों का असर ये रहा कि अध्यक्ष-सचिव के बीच मतभेदों से बिखरी संवाददाता समिति में एकता स्थापित हो गई। पहली बार एकत्र होकर समिति ने लोकभवन के प्रेस रूम में बैठक की। समिति के खिलाफ आम सभा बुलाकर अध्यक्ष-सचिव को लिखे पत्र लिखने वालों का नेतृत्व कर रहे वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार को तल्ख जवाब दिया।

    अध्यक्ष-सचिव और समस्त समिति आपसी मतभेद भुलाकर पहली बार एक साथ दिखाई दी। और शक्तिप्रदर्शन स्वरूप पूरी समिति की यूनिटी की तस्वीर जारी की गई। चिट्ठी में हर सवाल का जवाब देकर अप्रत्यक्ष रूप से ज़ाहिर किया गया कि हम एक हैं, किसी दबाव में नहीं आने वाले। मजमून का आशय ये भी था कि कोविड की अहतियात के मददेनजर चुनाव की जल्दबाजी नही करेंगे। आहिस्ता-आहिस्ता अपने हिसाब से हम चलेंगे। जब तक नई समिति निर्वाचित नहीं होती हमें निवर्तमान नहीं कहा जा सकता। चुनाव कराना, आम सभा बुलाना सिर्फ और सिर्फ समिति का अधिकार है। हम अपने हिसाब से चुनाव कराएंगे। वो भी तब जब सूचना निदेशालय से जुड़े आलाधिकारी परमीशन देंगे। फिलहाल कोरोना की वैक्सीन लगवाइए। साठ की उम्र के ऊपर हैं तो वैक्सीन सबसे पहले लगवाइए। स्वास्थ्य का ध्यान रखिए।

    अध्यक्ष हेमंत तिवारी का कुछ इस इस तरह का मौज़ू चुनाव के लिए उतावले गुट को चिढ़ाने जैसा लग रहा है। इसमें समिति की एकता और सचिव शिवशरण के साथ आने से पैदा हुई ताकत का आत्मविश्वास भी झलक रहा है।

    बताते चलें कि समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी और सचिव शिवशरण शुरू से ही एक नदी की दो धाराएं रहे हैं। कारण ये था कि बहुत पहले आईएफडब्ल्यूजे के दो हो चुके फाड़ मे एक के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हेमंत है और दूसरे फाड़ के लखनऊ अध्यक्ष शिवशरण हैं। यूनियन के इन दोनों गुटों मे हमेशा तलवारें खिची रहीं। और जब संवाददाता समिति में अलग-अलग गुटों के अध्यक्ष और सचिव निर्वाचित हुए तो समिति में दो अलग-अलग गुट बन जाना स्वाभाविक था।

    संवाददाता समिति का कार्यकाल समाप्त होने के फौरन बाद चुनाव कराने की मांग करने वाले पत्रकारों के साथ शिवशरण कंधे से कंधा मिला कर चल रहे थे। हेमंत अकेले पड़ रहे थे, क्योंकि समिति की नीतियों और चुनाव में देरी से नाराज हेमंत तिवारी विरोधियों के खेमें में ऐसे प्रतिष्ठित वरिष्ठ भी थे जो कभी हेमंत के चाणक्य कहे जाते थे। प्रमोद गोस्वामी (पीटीआई रिटायर्ड), अजय कुमार, सुरेंद्र दुबे, भास्कर दुबे, दिलीप सिन्हा और विरेंद्र सक्सेना जैसे वरिष्ठ तत्काल चुनाव करवाने के लिए आमसभा कर समिति अध्यक्ष पर दबाव बना रहे थे।

    इस बीच प्रेस क्लब और समिति के पूर्व अध्यक्ष/सचिव रहे दिग्गज पत्रकार नेता सुरेश बहादुर सिंह और असंतुष्ट गुट मे मतभेद हो गया। पहले तो वो असंतुष्ट पत्रकारों के साथ थे लेकिन वो चाहते थे कि समिति के अध्यक्ष के बयान के मुताबिक समिति को आम सभा बुलाने का बहुत थोड़े दिनों का मौका और दिया जाए। लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई तो वो आम सभा में नहीं आये। समिति विरोधियों की यूनिटी की पहली कड़ी यहां टूटी। अध्यक्ष से दूरी रखने वाले सचिव शिवशरण सिंह और अन्य पदाधिकारी भी जल्द चुनाव करवाने का दबाव बनाने वाली आम सभा से दूर रहे ये भी बड़ा झटका था। तीसरा इससे भी बड़ा झटका ये था कि सत्तर-अस्सी के दशक से पत्रकारिता करने वाले वरिष्ठों में आपस मे ही तनातनी हो गई। वरिष्ठों ने आम सभा के तौर तरीकों पर सवाल उठा डाले।

    दैनिक जागरण से रिटायर्ड शिव शंकर गोस्वामी ने कुछ न्यूज़ ग्रुप्स में लिखा-

    दोनों पक्षों से बिना पंजीकृत संस्था के लिए इतनी मारामारी क्यों। आम सभा की कथित बैठक में में मै भी था। एक साथी को बैठक का अध्यक्ष बनाया गया। उसी ने सारे प्रस्ताव रखे। और बिना प्रस्तावक एवं समर्थन के कह दिया कि सब प्रस्ताव सर्व सम्मति से पास। यह सब हुआ मात्र सौ सवा लोगों की बैठक में। यही है पत्रकारों का लोकतंत्र। हर हर महादेव।

    लगभग चार दशक की पत्रकारिता का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अनुप श्रीवास्तव भी असंतुष्टों कि आमसभा में शरीक थे, पर बैठक के तौर तरीके से वो भी खुश नहीं थे। उनका चिट्ठी बम इस प्रकार है-

    एक फोन से मिले अनुरोध पर मैं भी उस तथाकथित बैठक में गया था और उस विचित्र बैठक से असहमत होकर बीच मे हो चला आया था।

    उक्त बैठक में कराए जा रहे हस्ताक्षरों के अनुसार (जिसमे मेरा हस्ताक्षर भी शामिल था) मात्र 52 पत्रकार ही थे जिससे कोरम पूरा नहीं हुआ। यही नही बैठक में किसी को अध्यक्षता करने का विधिवत न तो प्रस्ताव किया गया और न ही अनुमोदन। सारी कारवाही एकतरफा और पूर्व नियोजित लगी। मैने कुछ मुद्दों को उठाने की खड़े होकर कोशिश की पर उसे नजरंदाज कर दिया गया।

    यही नहीं, मान्यता समिति के पदों को बढ़ाने की भी घोषणा की गई जिसके लिये बैठक के तथाकथित अध्यक्ष अधिकृत नहीं थे। मुझे यह भी लगा कि बैठक में कुछ खास लोग ही हावी दिख रहे थे।

    में अपनी असहमति बताते हुए बैठक से चला आया । बाद में जिस पत्रकार ने मुझे शामिल होने का अनुरोध किया था, उसे लिखकर अपनी असहमति और हस्ताक्षर काट देने का अनुरोध भी किया। जिस पर यही कहा गया कि अब कुछ भी नही हो सकता।

    मान्यता समिति का गठन इस उद्देश्य से की गई थी कि एक समय मे दो पत्रकार वार्ता न होने पाएं। लेकिन हम उससे भटक गए हैं।

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