मेडिकल लीगल रिपोर्ट समझ में नहीं आने पर हाईकोर्ट ने डाक्टर को तलब किया
लखनऊ 16 दिसम्बर। उच्च न्यायालय ने किसी मामले में आरोपपत्र दाखिल करते समय उसके साथ मेडिको लीगल पेपर भी दाखिल करने का आदेश दिया है। बहुत कोशिश के बाद भी उसे अदालत में कोई नहीं पढ़ नहीं पाया। बाद में अदालत ने रिपोर्ट बनाने वाले डाक्टर को कोर्ट में तलब किया। अदालत ने इस बात पर आपत्ति जताई कि डाक्टरों की हाथ से लिखी रिपोर्ट में ऐसी भाषा और राइटिंग होती है जिसे किसी के लिए पढ़ पाना संभव नहीं होता।
जस्टिस अजय लांबा व जस्टिस दिनेश कुमार सिंह की बेंच ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह यह तय करे कि यदि किसी मामले में मेडिको लीगल, पोस्टमॉर्टम, फरेन्सिक या इंजरी रिपोर्ट तैयार की गई है तो आरोपपत्र दाखिल करते समय विवेचनाधिकारी उनकी मूल कॉपी के साथ-साथ संबंधित अस्पताल के हेड या टाइपकर्ता द्वारा सत्यापित कम्प्यूटराज्ड या टाइप की हुई कॉपी भी दाखिल करे।
कोर्ट ने मेडिकल एवं हेल्थ सेवाओं के डायरेक्टर जनरल की ओर से इस संबंध में आठ नवंबर, 2012 को जारी एक सर्कुलर के पूरी तरह से कार्यान्वयन का भी आदेश दिया है। कोर्ट ने सरकार से कहा है कि एक समय सीमा के भीतर इसके लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने आया कि 2012 में भी ऐसे ही एक मामले में उसने डीजी मेडिकल एवं हेल्थ को तलब किया था। इसके बाद उन्होंने आठ नंवबर, 2012 को एक सर्कुलर जारी कर सभी मुख्य चिकित्साधिकारियों को इस संबंध में निर्देश दिए थे कि रिपोर्ट सरल भाषा में हो।
यह है मामला:
एक मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि उस केस से संबंधित मेडिको लीगल रिपोर्ट को किसी भी तरह समझ पाना कठिन है। वह रिपोर्ट ऐसी अस्पष्ट और जटिल भाषा में तैयार की गई थी कि उसे किसी के लिए पढ़ पाना कठिन था। इस पर कोर्ट ने रिपोर्ट बनाने वाले डॉक्टर को तलब कर लिया और खराब राइटिंग पर जवाब मांगा। डॉक्टर ने कहा कि उनके यहां कम्प्यूटर नहीं है। इसलिए कम्प्यूटराइज्ड कॉपी नहीं बन पाती। हाई कोर्ट ने कहा, डॉक्टरी रिपोर्ट का केस में बहुत महत्व होता है। उससे सच्चाई पता करने में बड़ी मदद मिलती है, लेकिन बहुत बार रिपोर्ट पढ़ने में नहीं आती। यह रिपोर्ट ऐसी भाषा और राइटिंग में होनी चाहिए कि उसे वकील और जज आसानी से पढ़ सकें।







