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    Home»इंडिया»Crime News

    खूँखार होते नाबालिग और दम तोड़ता बचपन : आखिर दोषी कौन?

    ShagunBy ShagunMarch 31, 2026 Crime News No Comments8 Mins Read
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    Minors turning violent, and childhood losing its innocence: Who, ultimately, is to blame?
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    बच्चों के साथ बढ़ते रेप और मर्डर की दुखद घटनाओं पर समाज का मौन, नर पिशाचों का बढ़ा रहा है मनोबल

    राहुल कुमार गुप्ता

    यह मात्र आलेख नहीं, भय और आंसूओं के साथ वर्तमान और भविष्य पर समाज के नाम खुला शोक संदेश और चेतावनी है। जब हम सभ्य होने का दंभ भरते हैं, तो असल में हम अपनी आत्मा के उस हिस्से को दफन कर रहे होते हैं जो हमें इंसान बनाता है।

    आज के दौर में प्रतिदिन अखबार के पन्नों में और इलेक्ट्रॉनिक/सोशल मीडिया के दृश्य और श्रव्य संदेशों में मासूमों के साथ निर्दयता भरी घटनाएं भरी पड़ी मिलती हैं। क्या आपने कभी गौर किया है कि उन सुर्ख़ियों के पीछे की चीखें कितनी डरावनी हैं? वे चीखें किसी पराए की नहीं, उस भविष्य की हैं जिसे हम गढ़ने का दावा करते हैं। एनसीआरबी की हालिया रिपोर्ट महज कागजी आंकड़े नहीं, बल्कि हमारे नैतिक पतन का एक ऐसा एक्सरे है जो बताता है कि हमारा समाज अंदर से कितना सड़ चुका है।

    Minors turning violent, and childhood losing its innocence: Who, ultimately, is to blame?
    खूँखार होते नाबालिग और दम तोड़ता बचपन : आखिर दोषी कौन?

    डरावनी बात यह नहीं है कि अपराध हो रहे हैं, डरावनी बात यह है कि इन जघन्य अपराधों के पीछे अब केवल मंझे हुए अपराधी नहीं, बल्कि वे किशोर भी खड़े हैं जिनकी उम्र खिलौनों से खेलने या स्कूल की दहलीज पर सपने बुनने की है। जब एक 14-15 साल का लड़का किसी नन्हीं बच्ची के साथ दरिंदगी करता है और फिर उसकी जान ले लेता है, तो समझिए कि हमने एक पीढ़ी को मानसिक नरपिशाच बनने के लिए खुला छोड़ दिया है। कठुआ से लेकर हाथरस तक, और हालिया वर्षों में देश के कोने-कोने से आती छोटी बच्चियों के साथ हुई वे वीभत्स घटनाएं रूह को कंपा देने वाली हैं। उन घटनाओं का विवरण देना भी मानवता का अपमान है, जहाँ पांच साल की बच्ची को बिस्किट का लालच देकर एकांत में ले जाया जाता है और फिर जो होता है, वह किसी भी सभ्य समाज के माथे पर ऐसा कलंक है जिसे न गंगाजल से न आब-ए-ज़मज़म से न ही संसार के किसी भी मंत्रोच्चारित जल से धोया या साफ किया जा सकता है।

    संसद में जब इन विषयों पर सवाल उठते हैं, तो जवाबों में छिपी विवशता और बढ़ते ग्राफ की भयावहता यह बताती है कि कानून का डंडा शायद उस मानसिक कुंठा तक नहीं पहुँच पा रहा है जो घरों के भीतर पनप रही है। आखिर एक बच्चा अपराधी कैसे बन रहा है? क्या हमने कभी सोचा है कि उसके हाथ में पकड़ा गया वह स्मार्टफोन, जिसमें इंटरनेट की असीमित और अनियंत्रित गंदगी भरी है, उसके कोमल मस्तिष्क को किस हद तक विकृत कर रहा है? आज का डिजिटल युग अगर पोर्नोग्राफी और हिंसा का सबसे बड़ा बाजार बन गया है, तो इसके जिम्मेदार हम हैं। वह बच्चा जो कल तक तितलियों के पीछे भागता था, आज इंटरनेट की गलियों में नग्नता और विकृति की तलाश कर रहा है। उसे सिखाने वाला कोई नहीं है कि सम्मान क्या होता है, उसे बताने वाला कोई नहीं है कि शरीर की गरिमा क्या होती है। हमने उसे गैजेट्स तो दे दिए, लेकिन संस्कार और नैतिक बोध की वह ढाल छीन ली जो उसे इंसान बनाए रखती थी। परिवारों में संवाद खत्म हो चुका है; हम एक ही छत के नीचे रहते हुए भी अजनबी हैं। माता-पिता अपनी व्यस्तताओं में इतने मशगूल हैं कि उन्हें पता ही नहीं कि उनके बच्चे के भीतर किस तरह का राक्षस आकार ले रहा है।

    धर्म और संस्कार की बातें अब केवल उत्सवों और दिखावे तक सीमित रह गई हैं। जिस देश में कन्या को देवी माना जाता है, उसी देश की गलियों में आज लड़कियां असुरक्षित हैं। क्या यह विडंबना नहीं है कि हम मंदिरों और मस्जिदों के लिए तो लड़ सकते हैं, लेकिन उन दरिंदों को रोकने के लिए एकजुट नहीं हो पाते जो समाज को सड़ा रहे हैं? धर्म का अर्थ केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि आचरण है, जिसे हमने पूरी तरह भुला दिया है। हम विकास की अंधी दौड़ में इतने अंधे हो गए हैं कि हमें बगल के घर से आती सिसकियां सुनाई नहीं देतीं। हम चलते-फिरते उन मुर्दों की तरह हैं जो सड़क पर पड़े घायल को देखकर अपना रास्ता बदल लेते हैं, जो अखबार में मासूम की हत्या की खबर पढ़कर सिर्फ चाय का घूँट भरते हुए कहते हैं कि बड़ा बुरा हुआ और फिर शेयर बाजार, राजनीति की खबरों या क्रिकेट के स्कोर में खो जाते हैं। यह संवेदनहीनता ही वह खाद है जिस पर अपराध की फसल लहलहा रही है। अगर हम आज भी नहीं विचलित हो रहे, तो समझ लीजिए कि हमारी इंसानियत मर चुकी है और हम महज हाड़-मांस के पुतले हैं जो अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

    जंगल की अपनी मर्यादा होती है, वहां शेर भी भूख मिटाने के लिए शिकार करता है, वासना या क्रूरता के प्रदर्शन के लिए नहीं। लेकिन इंसान? इंसान ने तो उन तमाम सीमाओं को लांघ दिया है। आज जो वातावरण बना है, वह किसी नरक से कम नहीं है। भय का आलम यह है कि एक मां अपने बच्चे को घर के बाहर भेजने से पहले दस बार सोचती है। क्या यही वह विकसित समाज है जिसका सपना हमने देखा था? जहाँ मासूमियत का कत्ल हर मिनट हो रहा हो, जहाँ रक्षक ही भक्षक बनने की राह पर हों, वहां ईंट-पत्थर की इमारतों को विकास कहना खुद को धोखा देना है। इन घटनाओं के पीछे के कारकों को देखें तो पाएंगे कि हमारी न्याय प्रणाली की सुस्ती भी अपराधियों को संजीवनी देती है। जब अपराधी को पता होता है कि मामला सालों तक चलेगा, साक्ष्य मिटा दिए जाएंगे और वह रसूख के दम पर बाहर आ जाएगा, तो कानून का डर खत्म हो जाता है। भयमुक्त समाज के लिए न्याय का त्वरित और कठोर होना अनिवार्य है। बहुत से लोगों को कानून का ज्ञान ही नहीं कि गलत करने पर पकड़े जाएंगे तो क्या सजा मिलेगी? ऐसे में भी उन्हें डर का पता ही नहीं होता। लेकिन सिर्फ कानून के भरोसे बैठना भी हमारी कायरता है।

    हमें अपनी सड़ी-गली मानसिकता की जड़ों को खंगालना होगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि अपराधी आसमान से नहीं टपकते, वे हमारे ही घरों, हमारी ही गलियों और हमारे ही समाज की उपज हैं। वे उस उपेक्षा की उपज हैं जो हमने उन्हें बचपन में दी। वे उस कंटेंट की उपज हैं जो हमने उन्हें परोसा। वे उस पितृसत्तात्मक अहंकार की उपज हैं जो सिखाता है कि ताकतवर का कमजोर पर अधिकार है। सुधार का रास्ता संसद की गलियों से ज्यादा हमारे घरों के ड्राइंग रूम और स्कूलों के कमरों से होकर गुजरता है। हमें एक ऐसी सामाजिक चेतना की मशाल जलानी होगी जो न केवल अपराधी को जलाए, बल्कि उस विचार को भी राख कर दे जो अपराध को जन्म देता है। बच्चों को बचपन से ही लैंगिक संवेदनशीलता सिखानी होगी। उन्हें यह बताना होगा कि नैतिकता का मतलब क्या है और दूसरे के अस्तित्व का सम्मान करना ही सबसे बड़ा धर्म है।

    हमें सरकार से केवल मंदिर, मस्जिद अस्पताल सड़क और पुलों की मांग नहीं करनी चाहिए, बल्कि हमें मांग करनी चाहिए एक ऐसे सुरक्षित वातावरण की जहाँ कोई बच्ची आधी रात को भी निडर होकर घूम सके। हमें इंटरनेट पर परोसी जा रही उस डिजिटल अफीम के खिलाफ आवाज उठानी होगी जो हमारी युवा पीढ़ी के मानसिक तंत्र को नष्ट कर रही है। एकजुट होना ही एकमात्र विकल्प है। बिना किसी जाति, धर्म या राजनीतिक भेदभाव के, जब तक हम इन दरिंदों के खिलाफ एक दीवार बनकर नहीं खड़े होंगे, तब तक यह खौफनाक मंजर बदल नहीं सकता। हमें अपनी सोई हुई चेतना को झकझोरना होगा। हमें मुर्दा होने की इस अवस्था से बाहर निकलकर पुनः जीवित इंसान बनना होगा। वह इंसान जिसके दिल में दूसरे का दर्द महसूस हो, जिसकी आंखों में अन्याय देखकर खून उतरे और जिसके हाथ किसी की रक्षा के लिए उठें।

    यदि आज भी हम चुप रहे, यदि आज भी हमने इसे किसी और की समस्या मानकर पल्ला झाड़ लिया, तो याद रखिएगा कि अगली खबर आपके अपनों की भी हो सकती है। समाज एक इकाई है, और जब इसके एक हिस्से में सड़ांध पैदा होती है, तो वह धीरे-धीरे पूरे जिस्म को खत्म कर देती है। हमें अपने भीतर की उस इंसानियत को फिर से जगाना होगा जो हमें निस्वार्थ भाव से दूसरों की रक्षा के लिए प्रेरित करती है। चेतना का जागृत होना ही वह पहला कदम है जो हमें इस घृणित दलदल से बाहर निकाल सकता है। घर और विद्यालयों में बच्चों को धर्म, संस्कार, नैतिकता की जानकारी और उनके महत्व को समझाने के साथ-साथ कानून के ज्ञान और उसके भय को भी दिखाना होगा। ये बताना होगा अपराधी कभी बचता नहीं या तो तुरंत या थोड़े समय बाद वो पकड़ा ही जाता है। फिर उसका हश्र कितना बुरा होता है ये सीख भी देनी होगी।

    जीवन-मरण के इस चक्र में, अगर हम एक सुरक्षित और सुंदर समाज नहीं बना सके, तो हमारा जन्म लेना ही व्यर्थ है। अब ये जरूरी हो गया है कि शपथ लेकर हम आगे आएं। हम केवल अपनी नित्य क्रियाओं में ही नहीं लगें रहेंगे, बल्कि एक ऐसे सजग प्रहरी बनेंगे जो बुराई पनपने के कारण को समझेंगे और उन्हें जड़ से उखाड़ने के लिए छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे। यह लड़ाई लंबी है, लेकिन यह लड़ाई हमारी अपनी पहचान बचाने की लड़ाई है। शर्मिंदगी से सिर झुकाने के बजाय, संकल्प के साथ सिर उठाकर इस बुराई का सामना करना ही आज के समय की सबसे बड़ी पुकार है। हम अपने-अपने घर सही करने से शुरुआत कर सकते हैं। जागिए, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए और हमारे पास सिवाय पछतावे के और कुछ न बचे।

    Shagun

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