जानिए क्या है महालया नवरात्री ?

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नवरात्रि विशेष:

महालया अर्थात- संज्ञा स्त्रीलिंग अश्विन कृष्ण अमावस्या जिस दिन पितृविसर्जन होता है। पितृपक्ष की अंतिम तिथि के दिन को महालया कहते है। प्रतिवर्ष की तरह इस बार भी दुर्गापूजा होगी लेकिन इस वर्ष की दुर्गापूजा कुछ मायने में अलग हटकर होगी क्योंकि आम तौर पर महालया के दूसरे दिन यानी पितर तर्पण के बाद से देवी की चंडी पाठ की शुरुआत हो जाया करती थी लेकिन इस वर्ष महालया के ठीक एक महीने के बाद यानिकि 17 अक्टूबर से दुर्गापूजा प्रारम्भ होने जा रही है। इस तरह विजयादशमी यानि दशहरा 25 अक्टूबर को होगी।

सांसारिक सभी लोग 10 दिनों तक मां दुर्गा देवी की पूजा-अर्चना करेंगे। कुछ पंडितों के मतानुसार हिन्दू शास्त्रों में दुर्गापूजा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में किये जाने का विधान है। इस बार वर्ष 2020 में बार दो अश्विन माह होंगे जिनमे से पहला शुद्ध और दूसरा पुरुषोत्तम यानी अधिक मास। 18 सितंबर से 16 अक्टूबर तक अधिक मास होगा। 17 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक शुद्ध आश्विन माह होंगे। इसी समयावधि के दौरान अर्थात 17 अक्टूबर से 26 अक्टूबर तक नवरात अर्थात दुर्गा देवी की पूजा अर्चना करने की परम्परा कायम है।

हिन्दू धर्मालंबियों के मतों के अनुसार कुछ लोग भगवान राम द्वारा रावण को मृत्युं शैया पर सुला कर विजयश्री प्राप्त करने वाले दिन को भी दशहरा के रूप में मनाये जाने का प्रचलन है। पितृपक्ष तीन सितंबर से शुरू होकर 17 सितंबर तक शुद्ध आश्विन मास में चल कर समाप्त हो गया था उसके ठीक 30 दिनों के पश्चात मां दुर्गा की पूजा अर्चना करने की शुरुआत होगी।

इस बार वर्ष 2020 में मनाये जाने वाली दशहरा मनाने में आया अन्तर प्रत्येक तीन वर्षों में एक बार ऐेसा आता है।

हमारे भारतीय ज्योतिष सिद्धांतों के अनुसार अधिक मास चंद्र वर्ष का एक अतिरिक्त भाग है जो 32 माह 16 दिन आठ घंटे के अंतराल से मलमास बनता है। एक सूर्य वर्ष 365 दिनों छह घंटों का होता है वहीं पर एक चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। यही 11 दिनों का अन्तर प्रत्येक तीन वर्षों में एक माह के लिए होता है जो अधिक मास या पुरुषोत्तम मास कहलाता है।

अधिक मास में किसी भी तरह का शुभ कार्य जैसे – यज्ञ, विवाह, मुंडन, गृहप्रवेश आदि नहीं किये जाते हैं। इस माह का कोई भी देवता नहीं होने से और सूर्य की संक्रांति नहीं होने के कारण यह माह मलिन हो जाता है जिसे मलमास भी कहा जाता है।

नवरात लगते ही सुभ दिनों का आगमन हो जाता है अर्थात नवरात से सुभ दिनों आगमन होने दे सुभ कार्यों को सम्पन्न किया जाना प्रारम्भ हो जाता है। -प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती 

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