एन डी टी वी मतलब जहर और नफ़रत की पत्रकारिता

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 दयानंद पांडेय 
एन डी टी वी का एजेंडा अब न्यूज़ नहीं है । एन डी टी वी का एजेंडा अब कभी मुस्लिम , कभी दलित के बहाने समाज में जहर और नफ़रत घोलना है ।
एन डी टी वी की तमाम रिपोर्टें बता रही हैं कि भारत में मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं । भारत के हर किसी हिस्से में चुन-चुन कर मुसलमान मारे जा रहे हैं । ट्रेन में, यूनिवर्सिटी में, कश्मीर में, हरियाणा में, झारखंड में, उत्तर प्रदेश में, राजस्थान में, दिल्ली में। यहां, वहां हर कहीं मुसलमान मारे जा रहे हैं। भीड़ मार रही है ।
यह भीड़ गोरक्षकों की भीड़ है । तीन चार घटनाओं के व्यौरों में लथपथ आधे-आधे घंटों की इन रिपोर्टों में सिर्फ मुसलमानों के मारे जाने की खबर दो , तीन दिन से देख रहा हूं । खास कर रवीश की एक रिपोर्ट तो भयानक तस्वीर पेश करती है । रवीश की इसी रिपोर्ट के व्यौरे बाकी रिपोर्टों में भी हैं । रवीश की रिपोर्ट लेकिन डाक्यूमेंट्री की कलात्मकता से सराबोर है । रिपोर्ट में लगातार ट्रेन चलती रहती है तरह-तरह से । लेकिन मन में डर बोती हुई, भय का भयानक तसवीर प्रस्तुत करती रवीश की रिपोर्ट की मानें तो भारत में मुसलमान अब हरगिज सुरक्षित नहीं हैं ।
हिंदुओं की भीड़ उन्हें मारती जा रही है । गोया यह हिंदुओं की भीड़ नहीं , मुहम्मद गोरी या महमूद गजनवी की खूंखार और आक्रमणकारी सेना हो । हिंदी , अंगरेजी में लिखे कैप्शन , वायस ओवर , नैरेशन और पीड़ित परिवारों के बयान के बीच चलती ट्रेन , ट्रेनों के बदलते ट्रैक की आवाज़ बहुत डराती है । रवीश कुमार खुद भी बहुत डरे दीखते हैं इस रिपोर्ट को पेश करते हुए ।
मिस्टर रवीश कुमार यह कौन सा भारत है, भारत की यह कौन सी पत्रकारिता है , यह कौन सी तसवीर पेश कर रहे हैं आप । यह कौन से मुसलमान और कौन से हिंदू , कौन से गोरक्षक और कौन सी भीड़ है जो पूरे देश में कोहराम मचाए हुए हैं । पत्रकारिता के नाम पर यह कर क्या रहे हैं आप ? जहर और नफ़रत की कौन सी खेती है यह ? देश को गृह युद्ध की तरफ ढकेलने के लिए ऐसी रिपोर्ट पेश करना इतना ज़रुरी है ? शर्म कीजिए रवीश कुमार , शर्म करो एन डी टी वी । अति की भी एक सीमा होती है । भारत के मुसलमान क्या गाजर , मूली हैं , जो इस तरह कटते जा रहे हैं और हिंदू उन्हें काटे जा रहे हैं ।

फिर भी रवीश और एन डी टी वी की रिपोर्टों की आंख से देख कर एक सवाल यह भी बनता है कि अगर देश में मुसलमानों के खिलाफ इतना ख़राब माहौल बना है तो आखिर क्यों ? क्या सिर्फ़ इस लिए कि भाजपा सरकार है । या कुछ और भी है ? सभ्य समाज और देश के लिए यह सोचना बहुत ज़रूरी है । मुसलमानों को भी सोचना चाहिए कि उन के खिलाफ भारत में ही नहीं , दुनिया भर में माहौल क्यों बन गया है । क्या उन को अपने भीतर सुधार की ज़रूरत नहीं है ।

किसी सिद्धांत , किसी विचार के लिए सिस्टम से , सत्ता से लड़ना बहुत ज़रुरी है । लेकिन किसी सिद्धांत या किसी विचार के लिए जनमत से लड़ने के दिन अगर आ जाएं तो ? लड़ने वालों को अपने विवेक को चेक ज़रुर कर लेना चाहिए । उन्हें भीड़ और जनमत का फ़र्क भी ज़रुर समझना चाहिए । भीड़ का कुतर्क रचने से भी बाज आना चाहिए ।

सरोकारनामा से साभार