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    Home»विज्ञान

    बौद्धिक रूप से विकलांग करण को स्टेम सेल थेरेपी से मिला नया जीवन

    By September 13, 2017Updated:September 13, 2017 विज्ञान No Comments11 Mins Read
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    • न्यूरोजेन ब्रेन एण्ड स्पाइन इंस्टीट्यूट स्टेम सेल थेरेपी उपचार, बौद्धिक रूप से विकलांग मरीजों के लिए एक नई आशा और जीवन का उपहार है
    • लखनऊ के बौद्धिक रूप से विकलांग 16 वर्षीय करण न्यूरोजेन ब्रेन एण्ड स्पाइन इंस्टीट्यूट में स्टेम सेल थेरेपी के बाद जीवन में स्वच्छंदता पाने की राह पर

    लखनऊ, 13 सितंबर 2017: हाल-फिलहाल तक यही माना जाता था कि जन्म के दौरान मस्तिष्क को होने वाली क्षति अपरिवर्तनीय होती है। हालांकि अब उभरते अनुसंधान के साथ हम यह जान गए हैं कि सेल थेरेपी का उपयोग कर क्षतिग्रस्त मस्तिष्क के ऊतकों की मरम्मत संभव है। फिर भी भारत में बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्होंने गर्भनाल रक्त (कॉर्ड ब्लड) बैंकों के माध्यम से अपने स्टेम कोशिकाओं को संरक्षित नहीं किया है। उन सभी रोगियों के लिए जिन्होंने न्यूरोलॉजिकल संबंधित विकारों के लिए एक नया इलाज खोजने की सारी उम्मीदें खो दी है, वयस्क स्टेम सेल थेरेपी इस तरह के मरीजों के लिए एक नई आशा प्रदान करता है।

     न्यूरोजेन ब्रेन एंड स्पाइन इंस्टीट्यूट के निदेशक, एलटीएमजी अस्पताल व एलटीएम मेडिकल कॉलेज, सायन के प्रोफेसर व न्यूरोसर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. आलोक शर्मा ने कहा, ‘आटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, मानसिक मंदता, मस्क्युलर डिट्रॉफी, रीढ़ की हड्डी में चोट, लकवा, ब्रेन स्ट्रोक, सेरेब्रेलर एटाक्सिया (अनुमस्तिष्क गतिभंग) और अन्य न्यूरोलॉजिकल (मस्तिष्क संबंधी) विकार जैसी स्थितियों में स्टेम सेल थेरेपी उपचार के नए विकल्प के तौर पर उभर रही है। इस उपचार में आण्विक संरचनात्मक और कार्यात्मक स्तर पर क्षतिग्रस्त तंत्रिका ऊतकों की मरम्मत करने की क्षमता है।’

     बौद्धिक विकलांगता (आईडी) जिसे मानसिक मंदता (एमआर) कहा जा सकता है, को इस रूप में परिभाषित किया जाता है —‘ विकास की स्थितियों (डेवलपमेंटल कंडीशंस) का एक समूह जिसमें अनुकूली व्यवहार और कौशल के मामले में सीखने की विकलांगता और कठिनाई के साथ महत्वपूर्ण संज्ञानात्मक हानि शामिल है।’ गंभीरता के आधार पर इसे हल्के, मध्यम, गंभीर और गहरे रूप में वर्गीकृत किया जाता है। रोगी और उसके परिवार के व्यापक इतिहास और आई क्यू टेस्ट (बुद्धिमत्ता परीक्षण) के आधार पर बौद्धिक स्तर के मूल्यांकन के जरिए मुख्य रूप से इसका निदान किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, मानसिक मंदता वाले व्यक्ति का आईक्यू 70 के बराबर या उससे कम होता है।

     न्यूरोजेन ब्रेन एण्ड स्पाइन इंस्टीट्यूट की उप निदेशक और चिकित्सीय सेवाओं की प्रमुख डॉ नंदिनी गोकुलचंद्रन ने कहा, ‘‘ मानसिक मंदता प्रबंधन में एक बहुअनुशासनिक उपचार दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, जिसमें व्यवहार संबंधी कुछ समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए कुछ दवाओं के अनुप्रयोग के साथ-साथ बिहैवियर थेरेपी (व्यवहार चिकित्सा), आक्युपेशनल थेरेपी (व्यावसायिक चिकित्सा), विशेष शिक्षा, स्पीच थेरेपी, आर्ट थेरेपी, डांस थेरेपी, प्ले थेरेपी और फिजियोथेरेपी जैसी योजनाबद्ध तरीके से तैयार की गई चिकित्सा पद्धतियों का शुमार है। इन उपचारों से बच्चे के प्रबंधन में कुछ हद तक मदद मिलती है हालांकि, वे मानसिक मंदता वाले बच्चों में अंतर्निहित मस्तिष्क क्षति को ठीक कर पाने में असमर्थ हैं। ऐसे में मानसिक मंदता के लक्षण वाले बच्चों के ठोस उपचार के लिए शोधकर्ता और डॉक्टर स्टेम सेल का इस्तेमाल कर रीजनरेटिव थेरेपी (पुनर्योजी चिकित्सा) की संभावनाओं की ओर देख रहे हैं। स्टेम सेल थेरेपी ऐसी न्यूरोलॉजिकल (स्नायविक) स्थितियों में नुकसान की मरम्मत में मदद करती है।’’

     उपरोक्त कथन को और अधिक स्पष्ट करने के लिए आज हम यहां लखनऊ के एक 16 वर्षीय लड़के करण श्रीवास्तव की केस स्टडी प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसमें बौद्धिक विकलांगता का ज्ञात मामला है। इस मामले में गर्भावस्था के दौरान किसी तरह की जटिलता के संकेत नहीं थे। यह एक पूर्णकालिक, सी-सेक्शन डिलीवरी थी, लेकिन उसमें बर्थ क्राय (जन्म के समय बच्चे का रोना) में एक सप्ताह का विलंब नजर आया। जन्म के समय उसका वजन 2 किलो था। जन्म के उपरांत आईयूजीआर, भ्रूण संकट (मेकोनियम), नवजात पीलिया और बर्थ हाइपोक्सिया सहित पोस्ट की डिलीवरी की जटिलताओं का पता चला था। उसे 17 दिनों के लिए इनक्यूबेटेड किया गया था। जब वह 4 महीने का था, तो उसे हर्निया के आपरेशन से गुजरना पड़ा। दौरे का कोई इतिहास नहीं था। जब वह 3 साल का था, तो उसके क्लेफ्ट पैलेट (तालु) को ठीक करने के लिए एक सर्जरी हुई थी। वह अक्सर बीमार पड़ जाता था और 5 साल की उम्र तक अक्सर निमोनिया की चपेट में आ जाता था। उसे हाइपोथायरायडिज्म की समस्या भी थी। कम उम्र में इतनी जटिलताओं और कठिनाइयों के चलते करण की मोटर और स्पीच माइलस्टोंस क्षमता प्रभावित हुई।

     करण के पिता श्री श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘शुरुआत से ही हमें पता था कि हमारी यात्रा आसान नहीं होगी। हमने खुद को सभी कठिन परिस्थितियों के लिए तैयार किया था और दृढ़ता से आगे बढ़ने का फैसला किया था। किसी भी न्यूरोलॉजिकल या मनोवैज्ञानिक विकार का कोई पारिवारिक इतिहास नहीं है। जब करण 7 महीने का था तो हमने पहले देखा कि वह बैठते समय संतुलन नहीं बना पा रहा है जबकि उसकी उम्र के अन्य बच्चे क्रॉलिंग और खड़े होने लगे थे। तब से हमने बच्चों के कई डॉक्टरों और बाल रोग विशेषज्ञों से सलाह ली। सभी ने यही बताया कि प्रसव के बाद की जटिलताओं के चलते करण का विकास प्रभावित हुआ है और उसकी गति मंद पड़ी है। हालांकि किसी ने यह नहीं कहा कि उसके मस्तिष्क में कोई क्षति हो सकती है या यह एक तंत्रिका संबंधी समस्या है। किसी ने भी करण के इस प्रभावित विकास की समस्या को दूर करने के लिए  किसी भी तरह के उपचार की सिफारिश नहीं की।’’

     करण ने 5 साल की उम्र में मुख्यधारा के स्कूल से अपनी शिक्षा आरंभ की, लेकिन स्कूल में सीखने में दिक्कत महसूस होने के कारण उसे विशेष स्कूल में दाखिला दिलाया गया। अपनी उम्र के अनुरूप संज्ञान और निर्णय की क्षमता के प्रभावित होने के कारण 8 साल की उम्र में  उसे लखनऊ में एक मनोवैज्ञानिक को दिखाया गया, जहां उन्होंने आईक्यू मूल्यांकन किया और यह 45 की श्रेणी में पाया गया और उसमें बौद्धिक विकलांगता का निदान हुआ। 10 साल की उम्र में एक स्थानीय चिकित्सक ने श्री श्रीवास्तव को दिल्ली में एक बालरोग विशेषज्ञ से परामर्श करने की सलाह दी। करण के पिता श्री श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘ दिल्ली में पहली बार डॉक्टर ने हमें स्पष्ट रूप से समझाया कि मेरे बच्चे के मस्तिष्क को थोड़ी क्षति पहुंची है और उसमें बौद्धिक विकलांगता है, जिसके चलते अन्य सामान्य बच्चों के मुकाबले करण का विकास कुछ अलग होगा।  लेकिन डॉक्टर ने कहा कि इसके लिए कोई उपचार उपलब्ध नहीं है और इसलिए हमें करण के विकास के लिए बहुत सारी चिकित्साओं को आजमाना होगा।’’

     करण के माता-पिता ने उसे तुरंत लखनऊ में स्टडी हॉल स्पेशल स्कूल में दाखिला दिलाया, जहां वह 6 साल से पढ़ रहा है। धार्मिक प्रवृत्ति के होने के कारण श्री व श्रीमती श्रीवास्तव ने करण के कल्याण के लिए कई प्रार्थनाएं (हवन / जाप / पूजा) की। उन्होंने एक प्रसिद्ध ज्योतिषी से भी संपर्क किया, जिन्होंने 17 साल की उम्र के बाद करण की हालत में तेजी से सुधार आने की भविष्यवाणी के साथ उनकी हिम्मत बढ़ाई।

     अभिभावकों को जब स्टेम सेल थेरेपी के बारे में पता चला तो उन्होंने तुरंत निर्णय लिया और अप्रैल 2017 में करण को न्यूरोजेन ब्रेन एण्ड स्पाइन में ले आए, जहां उसे न्यूरोहेबिलिटेशन के साथ स्टेम सेल थेरेपी से गुजरना पड़ा।

     परीक्षण करने पर करण में मुख्य शिकायतें यह देखी गर्इं कि वह सहज विचलित हो जाता था। ध्यान और एकाग्रता प्रभावित हो गई थी और उसे ध्यान बनाए रखने में कठिनाई महसूस होती थी। वह 1-2 स्टेप सिंपल कमांड का अनुसरण कर सकता था। अनुभूति, जागरूकता और निर्णय उम्र के अनुरूप नहीं थे। वह किसी भी नाटक / प्रतिस्पर्धी खेल में शामिल नहीं था। उसमें कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा था और वह आमतौर पर असंरचित खेलों में लगा रहता था। भावनात्मक प्रतिक्रियाएं थोडी अतिरंजित थी और स्थिति-अनुचित थी। सामाजिक संचार और सामाजिक नियमों की समझ प्रभावित हुई थी। वह आंख नहीं मिलाता था। छोटे वाक्यों में संवाद स्थापित करता था। स्पष्ट व्याख्या के साथ वर्णनात्मक भाषण प्रभावित हुआ था। आक्रामक व्यवहार मौजूद था, लेकिन केवल परिवार के सदस्यों के साथ। वह जिद्दी था और शीघ्र आपा खो बैठता था। शैक्षणिक रूप से उसकी ग्रहण करने की क्षमता कमजोर थी। वह अपने आप ए से जेड तक नहीं लिख पाता था बल्कि उसे कापी करना पड़ता था। वह 1-100 तक की गिनती जरूर जानता था, लेकिन गणितीय संचालन में सक्षम नहीं था। पैसा, समय, रंग और आकार के निर्धारण की उसकी क्षमता प्रभावित थी।

     न्यूरोजेन में करण का एक स्वनिर्धारित पुनर्वास कार्यक्रम के साथ स्टेम सेल थेरेपी उपचार शुरू हुआ। पुनर्वास कार्यक्रम का उद्देश्य अनुभूति और समझ विकसित करना, अतिसंवेदनशीलता को कम करना और एकाग्रता, संवेदी एकीकरण, निर्देश पालन और मरीज की समग्र बौद्धिक क्षमता को बढ़ाना था। उसे ऐसे एक्सरसाइज बताए गए जिससे उसकी समझ में सुधार लाने और उसके व्यवहार, संवेदी व प्रेरक पेशियों के संचालन (मोटर- संबंधी) की दक्षता में मदद मिलेगी। अपने-अपने क्षेत्र के सबसे अनुभवी पेशेवरों के मार्गदर्शन में उसे व्यावसायिक चिकित्सा, फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और मनोवैज्ञानिक परामर्श का एक संयोजित कार्यक्रम प्रदान किया गया। इससे उसके समग्र कौशल, योग्यता के उत्थान में मदद मिली, जिसके परिणामस्वरूप समग्र विकास हुआ। इन अभ्यासों को ऐसे सुव्यवस्थित ढंग से कराया गया कि मरीज को बीच-बीच में पर्याप्त आराम मिलता रहे। कुल मिलाकर पुनर्वास कार्यक्रम का उद्देश्य उसके समग्र जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना था।

     स्टेम सेल थेरेपी के बाद करण में हुए सुधारों में यह देखा गया है कि उसके आंखों के संपर्क में सुधार हुआ है, जल्दी प्रतिक्रिया देता है। सामाजिक संपर्क में सुधार हुआ है। सामाजिक व्यवहार ठीक हुआ है। बिना सोचे-समझे जवाब नहीं देता है। अनुभूति में सुधार हुआ है, पहेली हल करने का प्रयास करता है। ध्यान और एकाग्रता सुधार आया है। सीखने में सुधार हुआ है। 1-10 नंबरों को सीख गया है। उसके कमांड में सुधार हुआ है। हठ कम हुआ, सभी आज्ञाओं का पालन करने लगा है। समस्या को सुलझाने में सुधार हुआ है। संकेत मिलने पर आकृतियों के बीच अंतर करने में सक्षम हो गया है। मल्टी-टास्किंग में सुधार हुआ है, कार्य का अनुसरण और करने की क्षमता विकसित हुई है। जागरूकता में सुधार हुआ है। स्वयं के बारे में अधिक जागरूक रहता है। भाषण में सुधार हुआ है। ढंग से और स्पष्ट अंदाज में बात कर सकता है। स्मरण क्षमता (मेमोरी) में सुधार हुआ है। सीखने में सुधार हुआ है। स्वयं 1-10 तक अंकों को लिखना शुरू कर दिया है। भौतिक शिकायतों में सुधार हुआ है। मुद्रा में सुधार हुआ है। शरीर की शक्ति मौजूद है। सभी दैनिक गतिविधियों में सुधार हुआ है। स्नान के दौरान अब कोई पर्यवेक्षण / सहायता की आवश्यकता नहीं रहती है। स्वयं तैयार हो जाता है। अलमारी से कपड़े निकालता है। भारतीय क्रिकेट टीम के सभी सदस्यों को पहचानता है। उसका आईक्यू  44 से बढ़कर 47 हो गया है।

     वर्तमान में करण स्कूली शिक्षा और पुनर्वास में भाग लेता है। उसके माता-पिता दिन-प्रतिदिन उसे अधिक से अधिक स्वतंत्र बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। वह अपने परिवार के सदस्यों को दैनिक काम में मदद करता है और अपनी जरूरतों के बारे में बेहतर, स्पष्ट और शांत तरीके से  उन्हें समझाने की कोशिश करता है कि वह क्या चाहता है।

     डॉ नंदिनी गोकुलचंद्रन ने कहा, ‘न्यूरोजेन ब्रेन एण्ड स्पाइन इंस्टीट्यूट में की जानेवाली स्टेम सेल थेरेपी (एससीटी) एक बहुत ही सरल और सुरक्षित प्रक्रिया है। एक सुई की मदद से मरीज की अपने ही बोन मैरो (अस्थि मज्जा) से स्टेम सेल लिए जाते हैं और प्रसंस्करण के बाद उनके स्पाइनल फ्लुइड (रीढ़ की हड्डी में तरल पदार्थ) में वापस इंजेक्ट किया जाता है। चूंकि उन्हें मरीज के स्वयं के शरीर से लिया जाता है ऐसे में रिजेक्शन (अस्वीकृति), और साइड इफेक्ट (दुष्प्रभाव) का खतरा नहीं रहता है, जो एससीटी को पूरी तरह एक सुरक्षित प्रक्रिया बनाता है।

     डॉ. आलोक शर्मा ने आगे कहा कि उन लाखों को मरीजों को जिन्हें हमने पहले कहा कि अब चिकित्सकीय रूप से आपकी बीमारी के लिए कुछ नहीं किया जा सकता है, अब उचित विश्वास के साथ कह सकते हैं कि स्टेम सेल थेरेपी व न्यूरोरिहैबिलेशन की युग्मित चिकित्सा की उपलब्धता के साथ अच्छे दिन आने वाले हैं!

    नवी मुंबई के नेरुल में स्थित न्यूरोजेन ब्रेन एण्ड स्पाइन इंस्टीट्यूट भारत का पहला और एकमात्र संस्थान है जो स्टेम सेल थेरेपी प्रदान करने के साथ ही व्यापक पुनर्वास उपलब्ध कराता है। इस 11 मंजिला सुपर स्पेशलिएटी अस्पताल में 51 बेड और विशेष न्यूरो-रीहैबिलेशन थेरेपी सेंटर हैं। न्यूरोजेन ब्रेन एण्ड स्पाइन इंस्टीट्यूट की स्थापना सुरक्षित और प्रभावी तरीके से स्टेम सेल थेरेपी के जरिए लाइलाज न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से पीड़ित मरीजों की मदद के लिए, उनके लक्षण और शारीरिक विकलांगता से राहत प्रदान करने के लिए की गई है।  न्यूरोजेन ब्रेन एण्ड स्पाइन इंस्टीट्यूट न्यूरोलॉजिकल विकार मसलन, आॅटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, मानसिक मंदता, ब्रेन स्ट्रोक , मस्क्युलर डिस्ट्रॉफी , स्पाइनल कॉर्ड इंजुरी , सिर में चोट, सेरेबेलर एटाक्सिया , डिमेंशिया , मोटर न्यूरॉन रोग, मल्टीपल स्केलेरॉसिस और न्यूरोसाइकिएट्रिक विकार के लिए स्टेम सेल थेरेपी और समग्र पुनर्वास प्रदान करता है। अब तक इस संस्थान ने 50 से अधिक देशों के 5000 मरीजों का सफलतापूर्वक उपचार किया है।

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