पूनम नेगी

नववर्ष का आगमन कालचक्र की शाश्वत गति का प्रमाण है। समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहता है। 365 दिन की अपनी परिधि में तमाम तरह के खट्टे-मीठे अनुभवों की सौगात देकर बीता वर्ष विदा हो जाता है और नयी आशाओं-उमंगों और खुशियों के साथ नया साल सामने आ जाता है। तेजी से घूम रहा काल चक्र हर रोज अनगिन परिस्थितियों, घटनाचक्रों प्रक्रियाओं एवं उपक्रमों को जन्म दे रहा है। सब कुछ इतना तीव्र और आश्चर्य कारक है कि विश्लेषक चकित हैं और विशेषज्ञ भौचक। उपनिषदों की भाषा में कहें तो ‘न मेधया न बहुनाश्रुतेन’ यानि कि इसे न तो कोरी बुद्धि से समझा जा पा रहा है और न ही बहुत सुनने-गुनने वाले इसे समझने में सक्षम हैं। लेकिन जिनका अन्तःकरण आलोकित है, जिनके पास गहन अंतर्दृष्टि है, वे इन दिनों अनेकों नवीन सम्भावनाओं को जन्मते, पनपते एवं विकसित होते देख रहे हैं।
तेजी से घूम रहा काल चक्र हर रोज अनगिन परिस्थितियों, घटनाचक्रों प्रक्रियाओं एवं उपक्रमों को जन्म दे रहा है। अकेले हम ही नहीं, समूचा विश्व इस सत्य का साक्षी है। सब कुछ इतना तीव्र और आश्चर्यकारक है कि विश्लेषक चकित हैं और विशेषज्ञ भौचक। विशेषज्ञों की मानें तो अगले दिनों कुछ ऐसे घटनाक्रम जन्म लेंगे, कुछ ऐसी परिस्थितियाँ उपजेंगी कि जो असुरता को अपने शिकंजे में बुरी तरह से जकड़ लेगी, मगर साथ ही विश्व मानवता नया इतिहास भी रचेगी। कालचक्र के तीव्रगामी वेग से विश्व मानचित्र में इतिहास में ही नहीं, भूगोल में भी कुछ अचरज भरे फेरबदल होंगे।

उपनिषदों की भाषा में कहें तो ‘न मेधया न बहुनाश्रुतेन’ यानि कि इसे न तो कोरी बुद्धि से समझा जा पा रहा है और न ही बहुत सुनने-गुनने वाले इसे समझने में सक्षम हैं। इन परिवर्तन से होने वाले शुभ व अशुभ का बोध सिर्फ वही कर सकते हैं जिनका अन्तःकरण परमात्म चेतना से आलोकित है, जिनके पास गहन अंतर्दृष्टि है।
सन् 2017 में हमने बहुत कुछ शुभ-अशुभ घटित होते देखा। परिवर्तन की यह प्रक्रिया सुदीर्घ है। अकेले हम ही नहीं समूचा विश्व इस सत्य का साक्षी है कि क्रान्ति यां किस तरह से मालगाड़ी के डिब्बों की तरह एक के बाद एक आयीं और देखते ही देखते सारा पुराना कूड़ा-करकट अपने साथ उड़ा ले गयी।

“इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य” के उद्घोषक व वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रणेता महामनीषी पं.श्रीराम शर्मा आचार्य के शब्दों में, “अगले दिना हमारा वर्तमान जिस भविष्य का सृजन करने में तत्पर है, उसमें भले ही हमारे समक्ष तमाम समस्याओं से जूझने की चुनौती हो, मगर इतिहास साक्षी है कि हमारी भारतभूमि हर अंधेरे को विजित कर सदैव प्रकाशमान रही है। यही शुभ दृष्टि हमें हौसला देती है कि आसुरी शक्तियां कितनी ही प्रबल, प्रचंड एवं विशालकाय क्यों न हों, पर काल चक्र उन्हें धूल में मिलाए बिना न रहेगा। आसुरी शक्तियों के विनाशकारी शिकंजे की छटपटाहट के मध्य ही विश्व मानवता एक नया इतिहास रचेगी। कालचक्र के तीव्रगामी वेग से जन्मने वाली नवीन सम्भावनाएं विश्व मानचित्र में कुछ अचरज भरे फेरबदल भी करेंगी; इतिहास को ही नहीं भूगोल को भी नयापन मिलेगा।
महापरिवर्तन के इस विशेष समय में हम सभी को सतत सजग व सतर्क रहने की जरूरत है तभी हम इस बदलती हुई दुनिया के साथ कदमताल कर पाएंगे।
आज के मशीनी युग की सबसे बड़ी समस्या है-निरर्थक भाग दौड़। मूल्यहीन व्यस्तता और दूसरे से आगे बढ़ने की सर्वनाशी होड़। हर ओर आपाधापी मची हुई है। इस आपाधापी से भरे युग में सफलता कैसे अर्जित हो, आत्मबल कैसे बढ़े? इसके लिए वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रणेता युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य दस नियम सुझाते हैं। मानवीय कर्तव्यों का बोध कराने वाले सबल आत्मशक्ति के ये दस नियम हैं-
- सहजता का नियम (लॉ ऑफ सिम्पिलिसिटी)
- कर्म का नियम (लॉ ऑफ कर्म)
- उम्मीद का नियम (लाफ ऑफ होप्स)
- परवाह का नियम (लॉ ऑफ केअर)
- विश्वास का नियम (लॉ ऑफ ट्रस्ट)
- आदर का नियम (लॉ ऑफ रेस्पेक्ट)
- सक्रियता का नियम (लॉ ऑफ डायनेमिज्य)
- परोपकार का नियम (लॉ ऑफ बेनोवोलेन्स)
- कृतज्ञता का नियम (लॉ ऑफ ग्रैटीच्यूड)
- बलिदान का नियम (लॉ ऑफ सैक्रीफाइस)
नया साल ऐसा खास अवसर होता है जो हम सबके भीतर एक नया आत्मबोध भरता है। हमें पुरानी भूलें सुधारकर नए संकल्पों के साथ जीवन जीने का संदेश देता है। भले ही हमारा बीता साल कैसा भी गुजरा हो; अब नए संकल्प की आवश्यकता है। आने वाले नये साल में आइए हम सब मिलकर एक नयी सकारात्मक ऊर्जा और नये संकल्पों के साथ स्वयं व राष्ट्र जीवन में एक नये शुभत्व का संचार करें हम सब भली भांति जानते हैं कि जीवन की अवधि समिति है, मालूम नहीं कि कब बुलावा आ जाए। तो आइए इस मौके पर हम सब मिलकर खुशहाल व अर्थपूर्ण जीवन के इन नियमों को अपनी जिंदगी में लागू करने का संकल्प लें।







