जी के चक्रवर्ती
समुद्र तट से 6 हजार 150 फीट की ऊंचाई की पहाड़ पर बसा जोशीमठ उत्तराखण्ड के चमोली जिले में स्थिति है। 7वीं से 11वीं शताब्दी के बीच इस इलाके में कत्यूरी वंश के राजा के अधीन हुआ करता था, लेकिन आज उत्तराखण्ड एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

स्मरण रहे वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा के दौरान यह हिमालयी प्रदेश पूरी दुनिया में चर्चा का केंद्र बना हुआ था। आज 2023 आते आते जोशीमठ नाम का एक छोटे से कस्बेनुमा शहर के रूप मे विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहा है क्यूंकि आज पूरे शहर के अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगा है। लगभग 17 हजार की जनसंख्या वाले इस शहर की इमारतों, सड़कों पर गहरी दरारें पड़ चुकी हैं और पूरा शहर कभी भी जमींदोज हो सकता है।
वैसे तो इस शहर पर मंडरा रहे खतरे के संकेत बहुत पहले से ही मिलने लगे थे। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि आखिर जोशीमठ का यह हश्र क्यों हो रहा ह? इसे समझने से पहले थोड़ा इस कस्बेनुमा शहर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को भी समझना आवश्यक है।
प्रसिद्ध इतिहासकार बद्रीदत्त पाण्डे ने अपनी पुस्तक ‘कुमाऊं का इतिहास’ में लिखा है कि जोशीमठ कत्यूरी वंश की पहली राजधानी हुआ करती थी। कत्यूरी वंश की स्थापना वासुदेव कत्यूरी ने की थी। इन्हीं के नाम पर जोशीमठ में वासुदेव मंदिर स्थापित हुई है। राजा वासुदेव बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। आदि शंकराचार्य के संपर्क में आने के बाद कत्यूरी राज परिवार हिंदू धर्म को मानने लगे। आदि शंकराचार्य ने इसी स्थान पर ज्योर्तिपीठ नाम से एक मठ स्थापित किया। इसी ज्योर्तिपीठ के कारण यह स्थान जोशीमठ कहलाया जाने लगा।
अभी दो वर्ष पहले फरवरी 2021 में यहां की धौलीगंगा नदी में हिमस्खलन के कारण बनी झील के अचानक फूटने से वहां का जलविद्युत संयंत्र बुरी तरह से प्रभावित हुआ था और इस दुर्घटना में लगभग 35 कर्मचारी भी मारे गए थे, इससे जोशीमठ के आसपास के इलाक़ों को भारी नुकसान हुआ था।
वैसे हम देखे तो जोशीमठ बालू और पत्थर के ढेर पर ही बसा हुआ है और इस दृष्टिकोण से यहां की भूमि किसी इंसानी बस्ती के लिए उपयुक्त नहीं है। यहां पर धमाकों और भारी यातायात से पैदा होने वाले कंपन पर प्राकृतिक असंतुलन पैदा करने का काम करती है वैसे कहा जाए तो यहां भारी निर्माण कार्य की अनुमति केवल मिट्टी की भार वहन करने की क्षमता के अनुसार ही दिया जाना चाहिए था, इसके अलावा सड़कों की मरम्मत एवं अन्य प्रकार के निर्माण कार्यों को किसी भी स्थिति में पहाड़ों को खोदकर अथवा विस्फोट कर नहीं किया जाना चाहिए।
भूस्खलन प्रभावित इलाकों में पत्थरों और बड़े शिलाखण्डों को पहाड़ी की तलहटी से नहीं हटाया जाना चाहिए था क्योंकि इससे पहाड़ को मिलने वाली मजबूती प्रभावित होती है। आज से 47वर्ष पूर्व आई इस रिपोर्ट को किसी भी सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया और जिन-जिन गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात इस रिपोर्ट में कही गई थी, उसके विपरित उन्हीं गतिविधि को बढ़-चढ़कर परवान चढ़ाया गया। जिसके परिणामस्वरुप आज एक ऐतिहासिक, धार्मिक और सामरिक महत्व का शहर विध्वंस के मुहाने पर आ खड़ा हुआ है।







