लखनऊ की हवा में घुल गया भक्तिरस और अवधी सुगंध!
लखनऊ, 13 नवम्बर : शाम ढलते ही शहर की फिज़ा में एक अलग ही सुर छा गया। गौरैया संस्कृति संस्थान के वार्षिक महोत्सव की पहली शाम पद्मभूषण साजन मिश्रा और उनके सुपुत्र स्वरांश मिश्रा के नाम रही। पिता-पुत्र की जुगलबंदी ने जैसे राग बागेश्वरी को जिंदा कर दिया। जब स्वरों की लहर पर सवार होकर गूँजा – “ऐ री सखी घर कैसे जाऊँ… जमुना जल कैसे भर लाऊँ…” तो सारा पंडाल एकदम खामोश, फिर तालियों की गड़गड़ाहट! हारमोनियम पर धर्मनाथ मिश्रा, सारंगी पर विनायक और तबले पर राजेश मिश्रा ने ऐसा साथ निभाया कि लगा, स्वर और ताल में कोई प्रेम कहानी चल रही हो।
इससे पहले मंच पर नारी शक्ति का जलवा बिखरा। कथक की जानी-मानी नृत्यांगना आरती शुक्ला, ओलंपियन धाविका सुधा सिंह, साहित्यकार सत्या सिंह, समाजसेवी हेमा पाण्डे और अवधी लोकगायिका संजोली पाण्डेय को “गौरैया नारी शक्ति सम्मान” देकर सबने एक स्वर में कहा – औरतें सिर्फ़ घर नहीं चलातीं, संस्कृति भी संभालती हैं!

फिर शुरू हुई अवधी और भक्ति की बौछार…
सुचिता मनोज पाण्डेय ने जब “अमवा महुवा के झूमे डारी…” और “तुम उठो सिया श्रृंगार करो, धनुष राम ने तोड़ा है…” गाया तो दर्शक देर तक झूमते रहे। शिखा श्रीवास्तव का नृत्य “नीक लागे सीता के साजनवा…” और “नई झुलनी की छइयाँ” पर ऐसा लगा जैसे राम-सीता खुद अवध की गलियों में टहल रहे हों। वंदे मातरम की सामूहिक प्रस्तुति से शुरुआत हुई तो गोया पूरा हॉल माँ भारती के चरणों में नतमस्तक हो गया।
बच्चों-युवाओं ने भी कमाल किया। पूजा श्रीवास्तव का भजन, महिता पांडेय की कजरी, रश्मि सिंह का “बोल राम आए हैं सिया के संग…” और उत्तराखंड के बीआरटी डांस ग्रुप की धमाकेदार प्रस्तुति – हर उम्र के कलाकार ने बता दिया कि संस्कृति कोई पुरानी किताब नहीं, जिंदा धड़कन है।
अध्यक्ष रंजना मिश्रा ने मुस्कुराते हुए बताया, “कल दूसरी शाम और भी रंगीन होगी – माधवी मधुकर झा का संस्कृत गायन, राधा श्रीवास्तव के लोकगीत, यामिनी पांडेय का सुगम संगीत और संगीता आहूजा के दल की नृत्य नाटिका… तैयार रहिए!”मंच पर मौजूद रहे महापौर सुषमा खर्कवाल, एमएलसी पवन सिंह चौहान, राज्य ललित कला अकादमी उपाध्यक्ष गिरीश चंद्र मिश्र, जीएसटी के सुशील श्रीवास्तव समेत कई गणमान्य लोग – सबने एक स्वर में कहा, “ऐसे आयोजन ही लखनऊ की आत्मा हैं।”
तो अगर आप अभी भी घर पर हैं और सोच रहे हैं कि आज शाम क्या करें… तो कल जरूर पहुँचिए। क्योंकि यहाँ सिर्फ़ संगीत-नृत्य नहीं, लखनऊ का पुराना वाला तहज़ीब और अपनापन बरस रहा है!







