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    खामेनेई की हत्या: भारत की खामोशी और दुनिया की नैतिकता पर सवाल?

    ShagunBy ShagunMarch 3, 2026 Current Issues No Comments3 Mins Read
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    Khamenei's assassination: India's silence and the world's morality questioned
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    क्या ताकत के आगे झुकना ही एकमात्र रास्ता बचा है, या नियम-आधारित दुनिया अब भी संभव है?

    (Aalok Bajpai is a senior journalist, columnist and multidisciplinary cultural commentator. He is a research scholar in economics and writes on democracy, political economy, development and environmental issues. His writings have appeared in national and regional publications. The views expressed are personal.)सीधी बात : आलोक बाजपेयी (लेखक एक इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट और इकोनॉमिक्स में रिसर्च स्कॉलर हैं)

    28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल के भारी हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए। उनके साथ उनकी छोटी पोती, करीबी रिश्तेदार और कई बड़े अधिकारी भी नहीं बचे। ईरान ने उन्हें शहीद घोषित किया और 40 दिनों का राष्ट्रीय शोक मनाया। दुनिया भर में प्रतिक्रियाएँ बँटी हुई हैं और कुछ ने निंदा की, कुछ चुप रहे, और कुछ खुश हुए।

    लेकिन भारत में कुछ जगहों पर मातम से ज्यादा जश्न मनाया गया। सवाल उठता है कि क्या किसी दूसरे देश के नेता की मौत पर तालियाँ बजाना हमारी नैतिकता की जीत है या हार? क्या यह खुशी सिर्फ इसलिए है क्योंकि वे मुस्लिम देश के धार्मिक नेता थे, या पुरानी असहमति और दुश्मनी की वजह से?

    खामेनेई का असली ‘गुनाह’ क्या था? क्या किसी अंतरराष्ट्रीय अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया था? क्या संयुक्त राष्ट्र ने हमले की इजाज़त दी थी? नहीं। बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के किसी संप्रभु देश के मुखिया को मारना अंतरराष्ट्रीय कानून का घोर उल्लंघन है। अगर महाशक्तियाँ तय करेंगी कि कौन जिएगा और कौन मरेगा, तो दुनिया नियमों पर नहीं, ताकत पर चलेगी। क्या उनका सिर्फ इतना जुर्म था कि वे अमेरिका के सामने नहीं झुके?That darling of Barabanki is gone!

    भारत की चुप्पी क्यों? हम खुद को शांति और अहिंसा का झंडाबरदार कहते हैं। पीएम मोदी कई बार बोल चुके हैं कि “यह युद्ध का दौर नहीं है।” फिर जब किसी स्वतंत्र देश का सबसे बड़ा नेता बमों से मारा जाए, तो हम शांति की अपील भी नहीं करते? पहले ईरान के राष्ट्रपति की मौत पर शोक और राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया था, लेकिन अब एक शब्द नहीं। क्या हमारी विदेश नीति अब सिर्फ स्ट्रैटेजिक फायदे पर टिकी है, नैतिकता पर नहीं?

    भारत-ईरान की दोस्ती सदियों पुरानी है। खामेनेई के समय में रिश्ते सबसे मजबूत थे। चाबहार पोर्ट, रुपये में व्यापार, ऊर्जा सप्लाई में छूट दी, ईरान ने कई बार भारत का साथ दिया, पाकिस्तान के खिलाफ भी। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने हमें नहीं छोड़ा। आज उस दोस्ती का क्या?Middle East War: Iran retaliates after US-Israeli attacks, emergency situation in the region

    और सबसे बड़ा डर- आज वे, कल हम? इतिहास बताता है कि रिजीम चेंज की राजनीति ने इराक, लीबिया जैसे देशों को तबाह किया। अगर महाशक्तियाँ तय करेंगी कि कौन सही सरकार है, तो अराजकता फैलेगी। ट्रंप ने खुद मोदी को कई बार नीचा दिखाया है जैसे टैरिफ की धमकी, राफेल वाली बातें। दोस्ती कभी स्थायी नहीं होती, फायदे पर टिकी होती है।

    असहमति जायज है : ईरान की नीतियों की आलोचना हो सकती है। लेकिन असहमति और हत्या में फर्क है। बिना ट्रायल के सजा देना खुद को ‘विश्व पुलिस’ मानना है। अगर न्यूक्लियर रोकना है, तो सवाल उठता है कि अमेरिका ने अपने हथियार क्यों नहीं घटाए?

    देखिए अब भारतीय समाज को आत्ममंथन करना होगा। क्या हमारी संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की इतनी छोटी हो गई कि मौत को सांप्रदायिक चश्मे से देखें? किसी की मौत पर जश्न मनाना हमें कमजोर बनाता है।

    अंत में अब सवाल खामेनेई का नहीं, बल्कि हमारा है: क्या हम ताकत के साथ खड़े होंगे या नियम-आधारित दुनिया के साथ? भारत को शांति, संप्रभुता और संवाद के पक्ष में मजबूती से बोलना चाहिए। नैतिक साहस दोस्ती से ज्यादा जरूरी है। हत्या का जश्न हमें अंदर से खोखला कर देता है। असहमति रखो, आलोचना करो, लेकिन इंसानी जिंदगी की कद्र खोना सभ्यता की हार है।

    Shagun

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