बिहार में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां चरम पर हैं, और सियासी रणभूमि में हलचल मची है। सत्ता की जंग में दो बड़े खेमे आमने-सामने हैं। एक तरफ है एनडीए, जिसमें भाजपा ने नीतीश कुमार की जदयू को साथ लिया है, तो दूसरी ओर महागठबंधन, जिसमें लालू प्रसाद यादव का राजद और कांग्रेस कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। दोनों पक्ष मतदाताओं को लुभाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह एनडीए के लिए बिहार में जोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं, तो राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने वोटर अधिकार यात्रा के जरिए मतदाता सूची के पुनरीक्षण को मुद्दा बनाकर माहौल गरमाया है।
गठबंधनों की उलझन: सीटों का गणित और सियासी जोड़-तोड़
चुनावी समर में असली पेंच गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे का है। एनडीए में भाजपा को सबसे बड़ा हिस्सा मिलना तय माना जा रहा है, लेकिन जदयू नीतीश कुमार की लोकप्रियता को अपनी ताकत बताकर ज्यादा सीटों की दावेदारी ठोक रही है। दूसरी ओर, चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) अपनी सियासी जमीन मजबूत करने के लिए 100 सीटों तक की मांग कर दबाव बना रही है। जीतनराम मांझी की हिंदुस्तान अवामी मोर्चा भी नीतीश पर निशाना साधते हुए अधिक सीटों की चाहत रखती है, क्योंकि मांझी पुरानी सियासी खुन्नस निकालने का मौका तलाश रहे हैं। उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा भी सौदेबाजी में पीछे नहीं है और अपनी हिस्सेदारी पक्की करने की जुगत में है।
महागठबंधन में भी हालात कम जटिल नहीं। कांग्रेस को डर है कि कहीं पिछले चुनावों की तरह उसे ज्यादा सीटें तो मिलें, लेकिन जीत कम मिले, जिससे फिर किरकिरी हो। 2020 के चुनाव में कांग्रेस को कई सीटें मिली थीं, लेकिन हार का ठीकरा उसी पर फूटा। राजद के नेता दावा करते हैं कि अगर वे उन सीटों पर लड़े होते, तो सत्ता उनके हाथ में होती। इस बीच, एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी भी अपने पत्ते खोलने की तैयारी में हैं, जो बिहार की सियासत में नया ट्विस्ट ला सकते हैं।
नीतीश का दांव: लोकलुभावन वादों का जादू
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी सियासी जमीन बचाने के लिए एक के बाद एक लोकलुभावन घोषणाएं कर रहे हैं। मुफ्त बिजली, बेरोजगारी भत्ता, और ग्रामीण विकास योजनाओं जैसे वादों से वे मतदाताओं का दिल जीतने की कोशिश में हैं। दूसरी ओर, तेजस्वी यादव युवाओं और किसानों को निशाना बनाकर रोजगार और कर्जमाफी जैसे मुद्दों पर जोर दे रहे हैं।सियासी ड्रामा और जनता की नजरबिहार की जनता इस सियासी ड्रामे को गौर से देख रही है। सवाल यह है कि क्या गठबंधनों की यह जोड़-तोड़ और वादों की बौछार वोटरों को रिझा पाएगी?
नीतीश की साख, भाजपा की रणनीति, राजद का जनाधार, और कांग्रेस की उम्मीदें, सब कुछ दांव पर है। ओवैसी जैसे खिलाड़ी और छोटे दलों की सौदेबाजी इस रण को और रोमांचक बना रही है।आपको क्या लगता है? बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, और कौन सा गठबंधन बाजी मारेगा? सियासत का यह रंगमंच तैयार है, और अब फैसला जनता के हाथ में है!







