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    पर उपदेश कुशल बहुतेरे

    By August 25, 2019 Hot issue No Comments4 Mins Read
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    मेरे एक मित्र बहुत परेशान हैं। अपनी ज़िंदगी से दुखी हो गए हैं। कहते हैं कि जीवन में सुख नहीं है।
    मैंने उन्हें बताया कि आपका जीवन बहुत अच्छा है। आप बेवजह परेशान हैं।
    मित्र भड़क गए। कह बैठे, “पर उपदेश कुशल बहुतेरे।”
    अब आप ही बताएं कि मैं किसी भड़के हुए मित्र से क्या कहूं? मैं तो हर हाल में ऐसी परिस्थिति से बचना चाहते हैं। जो भी परेशान मिलता है उससे वो यही कहते हैं कि परेशान होने की कोई वजह नहीं।
    आदमी परेशान कब होता है? क्यों होता है?
    आदमी परेशान तब होता है, जब वो अपनी तुलना दूसरों से करता है।
    जब वो दूसरों को देख कर वैसा होना चाहता है।
    सुनाने की ज़रूरत नहीं क्योंकि आपने उस कौए की कहानी ज़रूर सौ बार सुनी है जो अपने काले रंग और अपनी कांव-कांव की आवाज़ से परेशान होकर एक साधु के पास इस उम्मीद में गया था कि साधु उसे हंस बना देंगे। साधु इस बात के लिए तैयार भी हो गए थे, लेकिन उन्होंने कहा था कि तुम पहले हंस से मिल आओ।
    कौआ हंस के पास गया था। हंस ने कौवे से कहा था कि वो अपने सफेद रंग से परेशान है। दुनिया में इतने सारे रंग हैं, लेकिन उसके हिस्से कोई रंग नहीं आया।
    कहानी लंबी है। आपकी सुनी हुई भी है, इसलिए इसे संक्षेप में सुना कर आगे बढ़ता हूं। कौआ बाद में मोर के पास गया था। मोर तो कौए को देख कर रोने ही लगा था। कहने लगा था कि कौआ भाई, तुम सबसे भाग्यशआली हो। तुम आज़ाद हो। कोई तुम्हें नहीं पकड़ता। कोई तुम्हें नहीं मारता। तुम जब चाहो, जहां चाहो आराम से उड़ सकते हो। तुम्हारा जीवन सचमुच शानदार है।
    कौआ समझदार पक्षी होता है। वो जल्दी समझ गया था कि उसे हंस और मोर ने जो समझाया है, वो ‘उपदेश’ नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई है।
    सभी को अपनी स्थिति से खुश रहना चाहिए। यही सोचना चाहिए कि हम जो हैं, उसके पीछे कोई कारण है।
    लेकिन मैंने अपने मित्र को जैसे ही समझया कि आप बेवजह परेशान हैं तो वो भड़क गए।
    पशु-पक्षी आसानी से समझ जाते हैं। आदमी आसानी से नहीं समझता। मेरे मित्र ने मुझे लंकापति की कहानी सुना दी कि कैसे मेघनाध वध की खबर सुन कर रावण मूर्छित हो गया था। उसका इतना शक्तिशाली पुत्र मारा गया? वो दुख सह नहीं पाया और बेहोश हो गया।
    रावण को बेहोश देख कर उसकी पत्नी मंदोदरी बिलख उठी। रावण को होश आया तो उसने देखा कि उसकी प्यारी पत्नी बिलख रही है। उसने उसे समझाने की कोशिश की कि रोना किसी समस्या का समाधान नहीं।
    इसी पर तुलसी दास जी ने कहा कि ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’। यानी दूसरों को उपदेश देना आसान होता है। खुद उस पर अमल मुश्किल।
    मित्र ने जब कहानी सुना दी तो मैं भारी सोच में डूब गया।
    क्या सचमुच मैं अपनी ज़िंदगी में उन बातों का पालन नहीं करता, जो मैं किसी को समझाता हूं।
    क्या मैं उपदेश देता हूं?
    मैं रोज़-रोज़ एक कहानी आपको सुनाता हूं। कहानी में छिपे संदेश को आप तक पहुंचाने की कोशिश करता हूं। मकसद एकदम साफ है- हर आदमी को खुश देखना।
    मैं जिन लोगों को खुशी का मंत्र बांटता फिरता हूं, उनसे मेरा क्या लेना-देना? बस इतना ही कि वो खुश रहेंगे तो मन के किसी कोने में मुझे भी खुशी रहेगी कि कोई खुश है।
    बात इतनी ही है कि आप अगर ज़िंदगी को तकलीफ वाले चश्मे से देखेंगे तो आपको तकलीफ दिखेगी। अगर आप खुशी वाले चश्मे से ज़िंदगी का अवलोकन करेंगे तो आप खुश रहेंगे।
    लोगों की मदद करने से भी आदमी को खुशी मिलती है।
    आज कुछ और नहीं कहना। कौआ जब अपनी स्थिति से तालमेल बिठा सकता है तो हम और आप क्यों नहीं?
    संजय सिन्हा कहानी नहीं सुना रहे। सच बयां कर रहे हैं।
    दूसरों की सफेदी देखने की आदत छोड़िए। उसकी कमीज़ आपकी कमीज़ से अधिक सफेद हो सकती है। उसके पास आपसे बड़ी गाड़ी भी हो सकती है। वो उसका जीवन है। वो वो है। आप आप हैं। लाख कोशिश करके भी आप वो नहीं हो सकते। नहीं होना चाहिए।
    अगर आपको किसी और की ज़िंदगी अपनी ज़िंदगी से बेहतर लगती है तो उससे मिलिए। उससे उसके संपूर्ण सुख-दुख के बारे में पूछिए। फिर समझ जाएंगे कि कौवा हंस क्यों नहीं बना, जबकि साधु तैयार थे उसे हंस बना देने के लिए।
    – संजय सिन्हा की वॉल से 

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